मानुषों के चार प्रकार – सत्पुरुष …
30 सित 2008 Leave a Comment
in दर्शन, नीति, नीतिशतक, लोकव्यवहार, संस्कृत-साहित्य Tags: नीतिशतकम्, भर्तृहरि, वैराग्यशतकम्, शृंगारशतकम्, सादवाद, Bhartrihari, Nitishatakam, Sadism, Shringarashatakam, Vairagyashatakam
भर्तृहरि-विरचित नीतिशतकम् का लोकव्यवहार से जुड़ा एक गंभीर श्लोक यह हैः
एके सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थं परितज्य ये
सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाऽविरोधेन ये ।
तेऽमी मानुषराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये
ये तु घ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे ।। (नीतिशतकम् – 75)
कवि कहता है कि वह तीन प्रकार के लोगों का वर्ग-नामकरण सरलता से कर लेता है । एक तो वे ‘सत्पुरुष’ हैं जो दूसरों के हित के लिए स्वार्थ का ही त्याग कर जाते हैं । ऐसे जन वास्तव में बिरले ही होते हैं ।
दूसरे वर्ग में ‘सामान्य’ जन आते हैं, जो इस बात का ध्यान रखते हैं कि अपनी स्वार्थसिद्धि से दूसरों का अहित तो नहीं हो रहा है । अर्थात् वे स्वार्थ तथा परार्थ क बीच तालमेल बिठाकर चलते हैं । अधिसंख्य जन इसी प्रकार के होते हैं ।
तीसरे वे हैं जो इस बात की परवाह नहीं करते हैं कि क्या उनकी स्वार्थपूर्ति अन्य लोगों के हित की कीमत पर तो नहीं हो रही है । यानी दूसरे का नुकसान हो भी रहा हो तो कोई बात नहीं अपना तो फायदा है । ऐसे लोगों की संख्या कम ही रहती है पर वे समाज में होते अवश्य हैं । और आज के भोगयुग में इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है । कवि इनको ‘मानुषराक्षस’ की संज्ञा देता है ।
और अंत में कवि कहता है कि उन लोगों को वह किस नाम से पुकारे जिनकी प्रवृत्ति परहित के विरुद्ध कार्य करने की रहती है भले ही इससे उनका कोई स्वार्थ सिद्ध न हो रहा हो । दुर्भाग्य से यह धरा ऐसे लोगों से मुक्त नहीं है ।
अगर ध्यान से देखा जाये तो यही पता चलेगा कि इस अंतिम वर्ग के लोगों का भी एक स्वार्थ सिद्ध होता है । वह यह कि दूसरों को कष्ट में डालकर उन्हें एक पैशाचिक आनंद मिलता है । कहा जाता है कि रोम के ‘नीरो’ नाम का एक बादशाह किसी-किसी आदमी को भूखे शेर से लड़ने अखाड़े में छोड़ देता था और उस लड़ाई का आनंद उठाता था । इस प्रवृत्ति को सादवाद (सैडिज्म्) कहा जा सकता है । मैंने इससे जुड़ा अपना एक अनुभव लघुकथा के रूप में अन्यत्र लिखा है ।
भर्तृहरि एक राजा थे और साथ में एक कवि भी । उनके काल के बारे में सुनिश्चित राय इतिहासकारों के बीच नहीं बनी है । माना जाता है कि उनका समय डेड़ या दो हजार वर्ष पूर्व रहा होगा । यह भी कहा जाता है कि कतिपय अनुभवों के पश्चात् उनके मन में वैराग्यभाव जाग गया और उन्होंने राजपाठ अपने छोटे भाई (कदाचित् विक्रमादित्य) को सोंपकर संन्यास ग्रहण कर लिया । उनकी रचनाओं में से एक, शतकत्रयम्, काफी चर्चित रही है, जिसके तीन खंड हैं: नीतिशतकम्, शृंगारशतकम् एवं वैराग्यशतकम् । प्रत्येक में सौ से कुछ अधिक श्लोक सम्मिलित हैं । – योगेन्द्र



