महाभारत के अध्ययन के समय मुझे उद्योगपर्व के अंतर्गत एक रोचक श्लोक पढ़ने को मिला जिसमें वनों तथा बाघों के बीच की परस्पर निर्भरता का संबंध स्पष्ट किया गया है । प्रसंगानुसार महात्मा विदुर महाराज धृतराष्ट्र से कहते हैं-
न स्याद् वनमृते व्याघ्रान् व्याघ्रा न स्युर्ऋते वनम् ।
वनं हि रक्षते व्याघ्रैर्व्याघ्रान् रक्षति काननम् ।।46।। (महाभारत, उद्योगपर्व के अंतर्गत प्रजागरपर्व)
श्लोक में कहा गया है कि बाघों के विना वन का अस्तित्व संभव नहीं, और न हि विना वन के बाघ रह सकते हैं । वन की रक्षा तो बाघ करते हैं और बदले में वन उनकी रक्षा करते हैं ।
आज हम बाघों को बचाने की बात करते हैं ताकि हमारे वन सुरक्षित रह सकें । ठीक यही बात महाभारत में महात्मा विदुर के मुख से कहलवायी गयी है यह जानना मेरे लिए सुखद आश्चर्य था । उस काल में लोग वनों और बाघों के मध्य सह-अस्तित्व का संबंध स्वीकारते थे यह स्वयं में दिलचस्प है । वस्तुतः उक्त बात महात्मा विदुर एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं महाराज को यह समझाने के लिए कि उनको क्यों अपने पुत्रों और पांडवों के मध्य सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करना चाहिए । वे कहते हैं-
धार्तराष्ट्रा वनं राजन् व्याघ्रा पाण्डुसुता मताः ।
मा छिन्दि सव्याघ्रं मा व्याघ्रान् नीनशन् बनात् ।।45।। (महाभारत, उद्योगपर्व के अंतर्गत प्रजागरपर्व)
अर्थात् आपके पुत्र (धार्तराष्ट्र) वन के समान हैं और पाण्डुपुत्र उनके सह-अस्तित्व में रह रहे बाघ हैं । बाघों समेत इन वनों को समाप्त मत करिए अथवा उन बाघों का अलग से विनाश मत करिये । वनों तथा बाघों की भांति दोनों पक्ष एक दूसरे की रक्षा करें इसी में सभी का हित है । – योगेन्द्र




