स्फटिक धारण करना बनाम ‘मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना …’

संस्कृत साहित्य में नीतिवचनों की भरमार है । उन्हीं में से एक हैः
मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना तुण्डे तुण्डे सरस्वती ।

मुझे इसका मूल स्रोत नहीं मालूम है । कदाचित् यह चाणक्य नीतिशास्त्र संग्रह में उपलब्ध है । मैंने छात्रजीवन में कभी पढ़ा-सुना था, वही मुझे याद है । इस वचन के अर्थ हैं:
‘खोपड़ी-खोपड़ी में अलग-अलग प्रकार की मति होती है, (और उसी तरह) जिह्वा-जिह्वा पर भी अलग-अलग प्रकार की वाणी रहती है । अर्थात् लोगों की सोच में बहुत विविधता होती है, और सभी लोग एक जैसा भी नहीं बोलते हैं । कुछ लोग अपने विचारों में बहुत तार्किक होते हैं, अन्य अपने विश्वासों के प्रतिपक्ष में कोई भी तर्क नहीं सुनते हैं । उदाहरणार्थ कोई ईश्वरवादी होता है, तो कोई अन्य अनीश्वरवादी । ईश्वरवादियों में भी कोई एकेश्वरमत का पक्षधर होता है, तो अन्य व्यक्ति अनेकेश्वरमत का मानने वाला । इसी प्रकार वाणी में भी अंतर रहता है । कोई व्यक्ति मृदुभाषी होता है, तो दूसरा कर्कश वचन बोलने वाला । मिथ्याभाषण में कुछ लोग हिचकते हैं, तो औरों के लिए यह जिंदगी का आम हिस्सा बन जाता है । सच में मनुष्यों की सोच तथा मुख से निसृत वाणी में अद्भुत विविधता देखने को मिलती है ।

मैं उपरिलिखित नीतिवाक्य का उल्लेख एक विशेष प्रयोजन से कर रहा हूं । व्यावसायिक जीवन (अध्यापन एवं शोधकार्य) में मेरा विषय भौतिकी (फिजिक्स) रहा है, जिसके अध्ययन में गणितीय तर्कशास्त्र (मैथमैटिकल लॉजिक) की अहम भूमिका रहती है । अतः जनसामान्य में प्रचलित कई मान्यताओं के संदर्भ में व्याप्त तार्किक विसंगतियां समझने में मुझे अधिक कठिनाई नहीं होती है ।

यह ठीक है कि सृष्टि के समस्त रहस्यों को विज्ञान नहीं खोज पाया है और बहुत कुछ उसके समझ से आज भी परे है । किंतु प्रकृति के नियमों के बारे में विज्ञान अभी तक जितना कुछ जान पाया है और जिस पर वर्तमान युग की तकनीकी प्रगति आधारित है उसे असुविधा न होने पर तो स्वीकार लेना परंतु असुविधाजनक पाने पर नकार देना उचित नहीं कहा जा सकता है । जनसामान्य में व्याप्त आस्थाओं और विश्वासों के संदर्भ में अक्सर यह रवैया देखने को मिलता है । और कुछ लोग ऐसे भी मिल जाते हैं जो उनको अपुष्ट वैज्ञानिक आधार प्रदान करके उनकी मान्यता का औचित्य ठहराते हैं । इस प्रकार की सोच मैंने स्फटिक (क्वार्ट‌‌ज क्रिस्टल) धारण करने की सलाह में हाल में देखी । मैंने अपने अखबार में एक दिन एक संक्षिप्त लेख देखा जिसमें कंप्यूटर पर कार्य करने वालों को सलाह दी गयी थी कि वे स्फटिक धारण करें या अपने निकट रखें । तर्क दिया गया था कि स्फटिक कंप्यूटर से निकलने वाले ‘बुरे’ रेडिएशन (यानी हानिकारक विकिरण) को अपनी ओर खींचकर सोख लेती है ।

अखबार में छपी स्फटिक संबंधी लेख की प्रति

अखबार में छपी स्फटिक संबंधी लेख की प्रति

लेख पढ़कर मेरा माथा ठनका । वे भला कौन से विकिरण हैं जो कंप्यूटर से निकलते हैं । मैं इतना जानता हूं कि रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रानिक उपकरणों से (चालू किये जाने पर) विद्युत्-चुम्बकीय विकिरण (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक या ईएम रेडिएशन) निकल सकते है, अन्य प्रकार के नहीं (जैसे नाभिकीय या न्यूक्लियर विकिरण) । इस ईएम विकिरण का वर्णक्रम या स्पेक्ट्रम बहुत व्यापक होता है । जहां एक सिरे पर ‘गामा किरणें’ होती हैं तो दूसरे सिरे पर ‘रेडियो वेव’ (तरंगदैर्य के आधार पर) । बीच में ‘एक्स-रेज’, ‘पराबैगनी या अल्ट्रावायलेट’, ‘सामान्य प्रकाश किरणें’, ‘अवरक्त या इंफ्रारेड’, तथा ‘माइक्रोवेव’ का स्थान क्रमशः नियत है । इन सभी की यह खासियत है कि ये सब सामान्यतः सीधी रेखा में चलती हैं । विशेष परिस्थितियों में ये थोड़ा-सा वक्रीय मार्ग पर चल सकती हैं, जो मुख्यतः उस माध्यम पर निर्भर करता है जिसमें ये चल रही हों, जैसे वायुमंडलीय हवा । किंतु सीधी रेखा से ऐसी भिन्नता भी इतनी कम होती है कि कई-कई मीटर तक विकिरण का मार्ग सीधा ही लगता है । और सबसे महत्त्व की बात यह है कि प्रकृति में ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जो इन किरणों को अपनी ओर खींचकर उनका मार्ग बदल दे । अर्थात् कंप्यूटर से निकले ऐसा विकिरण जिस दिशा में जा रहा हो उसी दिशा में चलता रहेगा । भले ही आसपास कोई भी पदार्थ रखा हो । अधिक से अधिक यह हो सकता है कि उन किरणों के मार्ग में जो पदार्थ आ जाये वह उसे सोख ले । किंतु यह हरगिज नहीं हो सकता है कि वह निसृत विकिरण का मार्ग मोड़कर अपनी ओर खींचे और सोख ले । तथ्य तो यह है कि क्वार्ट‌‌ज अधिकतर विकिरणों को सोखता भी नहीं !

तब प्रश्न उठता है कि वैज्ञानिकों की जानकारी से परे क्या ऐसी किरणें हैं जिनका ज्ञान स्फटिक के गुणधर्मों को जानने वालों को है और जो अनुसंधान का एक विषय बन सकते हैं ? अगर अनुभव के आधार पर यह दावा किया जाये कि स्फटिक प्रभावी तो होता है, परंतु ऐसा क्यों है यह पता नहीं तो अधिक समस्या न होती । लेकिन सतही तौर पर विज्ञानसम्मत लगने वाले तर्क देना उचित नहीं कहा जा सकता है ।

अब आप सोचिये कि जो दावा स्फटिक के प्रभाव के बारे में किया गया है वह कैसे सही हो सकता है ? फिर सोचें और बतायें, ताकि मैं भी अपना ज्ञानवर्धन कर सकूं । – योगेन्द्र

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