‘पश्येम शरदः शतम् …’ – शुक्लयजुर्वेद की प्रार्थना, निरामय जीवन हेतु

शुक्लयजुर्वेदसंहिता में पूर्ण आरोग्य के साथ सौ वर्षों या उससे भी अधिक के दीर्घायुष्य की कामना करते हुए सूर्य देवता को संबोधित अधोलिखित प्रार्थना है:

तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं श्रुणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ॥

(शुक्लयजुर्वेदसंहिता, अध्याय 36, मंत्र 24)
(तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् = तत् चक्षुः देवहितं पुरस्तात् शुक्रम् उच्चरत्)

इस प्रार्थना में निहित भाव कुछ यों हैं: वे देवताओं के हित में स्थापित हैं (देवहितम्); इस जगत् के चक्षु हैं (तत् चक्षुः); शुभ्र, स्वच्छ, निष्पाप हैं (शुक्रम् = शुक्लम्); और वे सामने पूर्व दिशा में उदित होते हैं (पुरस्तात् उच्चरत्)। हम उन सूर्य देवता की प्रार्थना करते हैं । हे सूर्यदेव, हम सौ शरदों (वर्षों) तक देखें, हमारी नेत्रज्योति तीव्र बनी रहे (पश्येम शरदः शतम्); हमारा जीवन सौ वर्षों तक चलता रहे (जीवेम शरदः शतम्); सौ वर्षों तक हम सुन सकें, हमारी कर्णेन्द्रियां स्वस्थ रहें (श्रुणुयाम शरदः शतम्); हम सौ वर्षों तक बोलने में समर्थ रहें, हमारी वागेन्द्रिय स्पष्ट वचन निकाल सके (प्रब्रवाम शरदः शतम्); हम सौ वर्षों तक दीन अवस्था से बचे रहें, दूसरों पर निर्भर न होना पड़े, हमारी सभी इंन्द्रियां – कर्मेन्द्रियां तथा ज्ञानेन्द्रियां, दोनों – शिथिल न होने पावें (अदीनाः स्याम शरदः शतम्); ओर यह सब सौ वर्षों बाद भी होवे, हम सौ वर्ष ही नहीं उसके आगे भी नीरोग रहते हुए जीवन धारण कर सकें (भूयः च शरदः शतात्)
(शरद् का अर्थ है शरद् ऋतु; एक शरद् एक वर्ष का पर्याय है ।)

मुझे लगता है कि वैदिक चिंतक प्रकृति को चेतन मानते थे । प्रकृति के उन सभी घटकों, जो प्राणियों के जीवन को प्रभावित करते रहे हैं, में चैतन्य की कल्पना करते थे । स्थूल भौतिक तत्वों के नियंता स्वरूप देवताओं की कल्पना उनके विचार में दिखाई देती है । सूर्य इन्हीं में से एक है । अग्नि, वायु, जल, आदि से संबद्ध अघिष्ठात्री देवताओं की बात वैदिक चिंतन में लक्षित होती हैं । सूर्य, जिसे कहीं-कहीं सविता नाम से भी पुकारा गया है, को जीवन का आधार माना गया है, वह जीवनदाता है । उसी सूर्य से प्रार्थना की गयी है कि उसकी कृपा से हम शतायु बनें और हमारा पूरा जीवनकाल रोगमुक्त बीते ।

प्रकृति के विविध प्रतीकों में चेतनामय दैवी शक्तियों की कल्पना करना क्या विज्ञानसम्मत कहा जा सकता है इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं है । वस्तुनिष्टता की दृष्टि से ऐसा करना कदाचित् निरर्थक लगेगा । फिर भी इन शक्तियों को पूजने और उनके प्रति प्रार्थना-भाव व्यक्त करने में एक उद्येश्य की पूर्ति अवश्य होती है ऐसा मुझे लगता है; और वह है प्रकृति के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता की अभिव्यक्ति । इस प्रकार की प्रार्थना में प्रकृति के साथ अंतरंग तथा मधुर संबंध बनाये रखने की लालसा झलकती है । प्रकृति को मात्र शोषण की वस्तु मानकर चलने के बजाय उसे एक संरक्षक के रूप में देखना मानव हित में है । इस युग में इस प्रकार की सोच की अतीव आवश्यकता है ऐसा मेरा मत है

यजुर्वेद की उपर्युक्त प्रार्थना के समान एक प्रार्थना अथर्ववेद में भी उपलब्ध है । उसके शब्द कुछ भिन्न हैं, किंतु उनके भाव प्रायः वही हैं । प्रार्थना हैः
पश्येम शरदः शतम् । जीवेम शरदः शतम् । बुध्येम शरदः शतम् । रोहेम शरदः शतम् । पूषेम शरदः शतम् । भवेम शरदः शतम् । भूयेम शरदः शतम् । भूयसीः शरदः शतात् ।

अथर्ववेद के इस मंत्रसमुच्चय के बारे में मैंन बीते मार्च की एक पोस्ट में लिखा है (देखें पोस्ट तिथि 2 मार्च 2010) – योगेन्द्र जोशी

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