गणेश वंदना (भाग 1) – ‘वक्रतुण्ड महाकाय …’ तथा अन्य छंद
08 फ़र 2011 2s टिप्पणियाँ
in कर्मकांड, धर्म, लोकव्यवहार, संस्कृत-साहित्य, religion, rituals Tags: auspicious moment, गणेश वंदना, शुभ मुहूर्त, श्री गणेश, हिंदू परंपरा, Hindu tradition, Lord Ganesh, Prayer to Ganesh श्री गणेश
अधिकांश हिंदू परिवारों-समुदायों में किसी भी शुभकार्य का आरंभ प्रायः गणेश वंदना से किया जाता है । इसी परंपरा के अनुरूप कार्यारंभ को बहुधा उसके ‘श्रीगणेश’ से भी पुकारा जाता है । वैवाहिक निमंत्रण-पत्रों पर देवाधिदेव गणेश की आकृति एवं उनकी स्तुति या प्रार्थना के श्लोक का उल्लेख आम प्रचलन में है । आजकल विवाहों का ‘मौसम’ चल रहा है । हिंदुओं में ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर ही पारंपरिक वैवाहिक मुहूर्त तय किए जाते हैं । वर्ष भर में कुछ गिने हुए दिन ही विवाह-योग्य मुहूर्त नियत होते हैं, और वे भी कुछ चुने हुए महीनों में । अतः इन दिनों एक साथ कई परिवारों में विवाह संस्कार संपन्न किए जाते हैं, और फलस्वरूप कई लोगों को मित्रों-परिचितों से अलग-अलग साजसज्जा के ढेरों निमंत्रण एक साथ मिलते हैं । जैसा पहले कह चुका हूं, इनमें गणेश वंदना के छंद प्रायः पढ़ने को मिलते हैं । मुझे प्राप्त होने वाले निमंत्रणों में निम्नांकित श्लोक सबसे अधिक देखने को मिलता है:
वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
हे वक्रतुण्ड, महाकाय, करोड़ों सूर्यों के समान आभा वाले देव (गणेश), मेरे सभी कार्यों में विघ्नो का अभाव करो, अर्थात् वे बिना विघ्नों के संपन्न होवें ।
गणेशजी को वक्रतुण्ड पुकारा गया है । तुण्ड का सामान्य अर्थ मुख या चोंच होता है, किंतु यह हाथी की सूंड़ को भी व्यक्त करता है । गणेश यानी टेढ़ीमेढ़ी सूंड़ वाले । उनका पेट या तोंद फूलकर बढ़ा हुआ, अथवा भारीभरकम है, अतः वे महाकाय – स्थूल देह वाले - हैं । उनकी चमक करोड़ों सूर्यों के समान है । यह कथन अतिशयोक्ति से भरा है । प्रार्थनाकर्ता का तात्पर्य है कि वे अत्यंत तेजवान् हैं । निर्विघ्न शब्द प्रायः विशेषण के तौर पर प्रयुक्त होता है, किंतु यहां यह संज्ञा के रूप में है, जिसका अर्थ है विघ्न-बाधाओं का अभाव । तदनुसार निहितार्थ निकलता है सभी कार्यों में ‘विघ्न-बाधाओं का अभाव’ रहे ऐसी कृपा करो, अर्थात् विघ्न-बाधाएं न हों ।
प्रार्थना का यह श्लोक कइयों के लिए सुपरिचित होगा । मैं इसकी चर्चा विशेष प्रयोजन से कर रहा हूं । मैंने देखा है कि यह छंद लगभग सदा ही त्रुटिपूर्ण तरीके से लिखित रहता है । अक्सर यह निम्न प्रकार से लिपिबद्ध रहता है:
वक्रतुण्ड महाकाय कोटि सूर्य सम प्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥
अथवा मिलती-जुलती त्रुटियों के साथ । इसमें पहली त्रुटि यह है ‘सूर्य कोटि’ न होकर ‘कोटिसूर्य’ होना चाहिए । करोडों सूर्यों के समुच्चय या समूह के लिए सामासिक शब्द है ‘कोटिसूर्य’ = करोड़ों सूरज । दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि संस्कृत के नियम सामासिक शब्दों के घटकों के बीच रिक्ति (स्पेस) की अनुमति नहीं देते हैं । अतः इसे ‘कोटि सूर्य’ नहीं लिख जा सकता है । आगे इस पर भी ध्यान दें:
सूर्यकोटिसमप्रभ
जिसका अर्थ है करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाला है जो वह । यह स्वयं बड़ा-सा सामासिक शब्द है और इसके अवयवों को बिना रिक्तियों के मिलाकर लिखना अनिवार्य है । कहने का तात्पर्य है कि समासजनित शब्दों के अंतर्गत रिक्तियां नहीं होनी चाहिए । मैंने देखा है कि निमंत्रण पत्र जैसे दस्तावेजों में संस्कृत श्लोकों की वर्तनी एवं उसमें उपलब्ध शाब्दिक क्रम कभी-कभी दोषपूर्ण रहते हैं । इसका कारण कदाचित् यह है कि इन श्लोकों को उद्धृत करने वाले अधिकतर लोग संस्कृत के ज्ञाता नहीं होते हैं, अथवा उनका ज्ञान अपर्याप्त होता है । बहुत संभव है कि वे विभिन्न श्लोकों को अन्य निमंत्रण-पत्रों से लेते होंगे, या ऐसे स्रोत से लेते होंगे जहां किन्हीं कारणों से वे दोषपूर्ण मुद्रित हों । एक बार उनका त्रुटिपूर्ण पाठ व्यवहार में आ जाए और वही प्रचारित हो जाए तो उक्त प्रकार की गलती देखने में आने लगेगी ही ।
उपर्युक्त छंद से साम्य रखने वाला एक और छंद मेरे देखने आया है । वह है:
विनायक नमस्तुभ्यं सततं मोदकप्रिय ।
अविघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
सदैव लड्डुओं के प्रेमी हे विनायक, तुम्हें नमस्कार है , हे देव, मेरे सभी कार्यों में विघ्नों का अभाव पैदा करो, अर्थात् वे निर्विघ्न संपादित हों ।
इस श्लोक के ‘मोदकप्रिय’ शब्द में भी समास है और इसे ‘मोदक प्रिय’ नहीं लिखा सकता है ।
अगली पोस्ट में मैं गणेश वंदना के दो-चार अन्य छंदों की उल्लेख करूंगा । - योगेन्द्र जोशी




फ़र 09, 2011 @ 09:14:10
दूसरा श्लोक पहली बार पढ़ा, आभार।
सित 01, 2011 @ 15:44:15
achchhi jankari dee.