गणेश वंदना (भाग 2) – ‘एकदन्तं महाकायं …’ एवं अन्य छंद
13 फ़र 2011 Leave a Comment
in कर्मकांड, धर्म, लोकव्यवहार, religion, rituals Tags: auspicious moment, गणेश वंदना, शुभ मुहूर्त, श्री गणेश, हिंदू परंपरा, Hindu tradition, Lord Ganesh, Prayer to Ganesh श्री गणेश
पिछली पोस्ट में मैंने इस बात का जिक्र किया था कि अधिकांश हिंदू परिवारों में गणेश वंदना का बड़ा महत्त्व है । प्रत्येक शुभकार्य के आरंभ में प्रायः गणेश देवता की पूजा संपन्न की जाती है । गणेशजी को विघ्नहर्ता माना जाता है, अतः उनकी प्रार्थना की जाती है, ताकि वांछित कार्य बिना वाधाओं के संपन्न होवे । वैवाहिक निमंत्रण-पत्रों पर तो गणेश-स्तुति संबंधी श्लोकों का उल्लेख आम प्रचलन में है । ऐसी परिपाटी मुझे अन्य शुभावसरों पर देखने को शायद ही कभी मिली है । यों जन्मदिन मनाने अथवा गृहप्रवेश करने जैसे अवसरों पर भी गणेश-अर्चना के छंद निमंत्रण-पत्रों पर अंकित किए जा सकते हैं । किंतु लगता है कि यह अभी आम प्रचलन में नहीं आया है । अस्तु, इस स्थल पर मैं गणेश-वंदना के कुछएक और छंदों को उद्धृत कर रहा हूं, जिनका उपयोग ऐसे अवसरों पर किया जा सकता है:
एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम् ।
विघ्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणाम्यहम् ॥
(एक-दन्तम् महा-कायम् लम्ब-उदर-गज-आननम् विघ्न-नाश-करम् देवम् हेरम्बम् प्रणामि अहम् ।)
एक दांत वाले, स्थूलकाय, दीर्घाकार पेट एवं हाथी के समान मुख वाले और विघ्नों का नाश करने वाले हेरम्ब (गणेश जी) को मैं प्रणाम करता हूं । (मान्यता है कि गणेश जी का सिर हाथी के सिर के सदृश है जिसका एक दांत खण्डित है ।)
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
(शुक्ल-अम्बर-धरम् देवम् शशि-वर्णम् चतुः-भुजम् प्रसन्न-वदनम् ध्यायेत सर्व-विघ्न-उपशान्तये ।)
सभी विघ्नों को शान्त करने या रोकने हेतु श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, चंद्रमा-तुल्य कायिक वर्ण वाले, चार भुजाओं वाले, श्री गणेश देव का ध्यान करे, उनकी उपासना करे ।
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यम् आयुःकामार्थसिद्धये ॥
(प्रणम्य शिरसा देवम् गौरी-पुत्रम् विनायकम् भक्त-आवासम् स्मरेन् नित्यम् आयुः-काम-अर्थ-सिद्धये ।)
दीर्घायुष्य-प्राप्ति, इच्छा-पूर्ति एवं धनोपार्जन में साफल्य पाने हेतु भक्तजनों के शरणस्थल, पार्वती-पुत्र, विनायक (विघ्न हरने वाले) देव, श्री गणेश, का नित्यप्रति सिर नवाते हुए स्मरण करे ।
आलम्बे जगदालम्बे हेरम्बचरणाम्बुजे ।
शुष्यन्ति यद्ररजःस्पर्शात्सद्यः प्रत्यूहवार्धयः ॥
(आलम्बे जगत्-आलम्बे हेरम्ब-चरण-अम्बुजे शुष्यन्ति यत्-रजः-स्पर्शात् सद्यः प्रत्यूह-वार्धयः ।)
इस संसार के आलंबन (आधार) स्वरूप श्री हेरम्ब (गणेश) के चरण-कमल का मैं आश्रय लेता हूं (अर्थात् उनकी शरण में जाता हूं), जिस चरण के धूलि के स्पर्श से विघ्नबाधाओं के समुद्र तुरंत सूख जाते हैं ।
तीन-चार छंद अभी और हैं, जिनका मुझे उल्लेख करना है अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी



