‘सर्वो दण्डजितो लोको …’ – मनुस्मृति में वर्णित शासकीय दण्ड की महत्ता
14 मई 2011 1 टिप्पणी
in धर्म, नीति, प्राचीन भारत, मनुस्मृति, राजनीति, शासन, Government, Manusmriti, Morals, religion Tags: त्रिवर्ग, दण्डात्मक कार्यवाही, न्यायिक व्यवस्था, मनुस्मृति, शासन, सजा का कार्यान्वयन, Government, implementment of punichment, judicial system, Manusmriti, punitive action, Trivarga
मनुस्मृति हिंदू समाज का एक प्राचीन ग्रंथ है, जिसमें मनुष्य के कर्तव्यों का विवरण प्रस्तुत किया गया है । बहुत-से लोगों की दृष्टि में यह एक विवादास्पद ग्रंथ है, क्योंकि यह वर्ण-व्यवस्था का पक्षधर है और स्त्री को पुरुष के एकदम बराबर का दर्जा नहीं देता है, यद्यपि स्त्री को सम्मान का हकदार बताता है । समाज के प्रति मनुष्य के कर्तव्यों, शासकीय प्रबंधन और न्यायिक व्यवस्था के बाबत इस ग्रंथ में जो बातें लिखी गयी हैं वे तर्कसंगत एवं शाश्वत रूप से प्रासंगिक हैं । उक्त स्मृति की कुछ बातें भले ही लोगों के गले न उतरें, किंतु अधिकांश बातों का विरोध नहीं किया जा सकता है । उन्हें न स्वीकारना मेरे मत में दुराग्रह माना जाना चाहिए । अस्तु, अपराध को नियंत्रण में रखने के समुचित दण्ड का प्रयोग अत्यावश्यक है इस बात पर इस ग्रंथ में जोर दिया गया है । न्याय संबंधी बहुत सी बातें ग्रंथ के अध्याय 7 में पढ़ने को मिलती हैं । दण्ड की महत्ता को प्रतिपादित करने वाले चुने हुए 5 श्लोकों का मैं इस स्थल पर उल्लेख कर रहा हूं:
(सभी श्लोक मनुस्मृति, अध्याय ७ से उद्धृत)
यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः ॥२०॥
(यदि न प्रणयेत् राजा दण्डम् दण्ड्येषु अतन्द्रितः शूले मत्स्यान् इव अपक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तराः ।)
भावार्थः यदि राजा दण्डित किए जाने योग्य दुर्जनों के ऊपर दण्ड का प्रयोग नहीं करता है, तो बलशाली व्यक्ति दुर्बल लोगों को वैसे ही पकाऐंगे जैसे शूल अथवा सींक की मदद से मछली पकाई जाती है ।
कहने का तात्पर्य है कि समुचित सजा का कार्यान्वयन न होने पर बलहीन लोगों पर बलशाली जन अत्याचार करेंगे । ध्यान रहे कि अत्याचार करने वाले शक्तिशाली होते हैं; वे धनबल, बाहुबल, शासकीय पहुंच आदि के सहारे अपनी मर्जी से चलने वाले होते हैं, और निर्बलों को कच्चा चबा जाने की नीयत रखते हैं । आज के सामाजिक माहौल में ऐसा सब हो रहा है यह हम सभी देख रहे हैं । दण्डित होने का भय दुर्जनों को रोकता है । नीति कहती है कि राजा का कर्तव्य है कि अपराधी को दण्ड देने में उसे रियायत तथा विलंब नहीं करना चाहिए । दुर्भाग्य से अपने देश में दण्ड देने की प्रक्रिया कमोबेश निष्प्रभावी है, कम के कम रसूखदार लोग तो दण्डित हो ही नहीं रहे है, और उनका मनोबल चरम पर है ।
आज के लोकतांत्रिक युग में पारंपरिक अर्थ में राजा नहीं रहे । उनका स्थान शासकवर्ग न ले लिया है । एक से अधिक व्यक्तियों का समूह राजा का स्थान ले चुका है । सिद्धांततः राजा के अधिकार उन्हें मिल चुके हैं, और राजा के कर्तव्यों का निर्वाह भी उन्हीं के जिम्मे है । अधिकारों के मामले में तो वे काफी आगे हैं, किंतु दायित्वों के क्षेत्र में उनका कार्य चिंताजनक है । उन्होंने दण्ड की प्रक्रिया को पेचीदा, समयासाध्य, अपराधी के प्रति नरमी वाला बना डाला है, इसलिए दिन प्रतिदिन अपराध बढ़ रहे हैं ।
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।
दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥२२॥
(सर्वः दण्डजितः लोकः दुर्लभः हि शुचिः नरः दण्डस्य हि भयात् सर्वम् जगद् भोगाय कल्पते ।)
भावार्थः यह संसार दण्ड के द्वारा ही जीते जाने योग्य है, अर्थात् दण्ड के द्वारा ही इसे नियंत्रण में रखा जा सकता है । ऐसा व्यक्ति दुर्लभ है जो स्वभाव से ही साफ-सुथरा एवं सच्चरित्र हो, न कि दण्ड के भय से । दण्ड के भय से ही वह व्यवस्था बन पाती है जिसमें लोग अपनी संपदा का भोग कर पाते हैं ।
मतलब यह है कि अधिकतर लोग दण्डित होने के भय से ही अपराध या अनुचित कार्यों से विरत रहते हैं । अगर दण्डित होने का भय समाज में न हो तो चारों ओर दुर्व्यवस्था फैल जाए, लूटपाट मचने लगेगी, और अपनी ही संपदा का भोग लोग नहीं कर पायेंगे; दूसरे उस पर कब्जा कर लेंगे ।
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा ।
प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधु पश्यति ॥२५॥
(यत्र श्यामः लोहिताक्षः दण्डः चरति पापहा प्रजाः तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत् साधु पश्यति ।)
भावार्थः जहां श्याम वर्ण एवं लाल नेत्रों वाला और पापों (पापियों?) का नाश करने वाला ‘दण्ड’ विचरण करता है, और जहां शासन का निर्वाह करने वाला उचितानुचित का विचार कर दण्ड देता है वहां प्रजा उद्विग्न या व्याकुल नहीं होती ।
दण्ड कोई मूर्तिमन्त वस्तु नहीं है, यह तो एक भाव है, अमूर्त अवधारणा है । किंतु शास्त्रों में उसका वर्णन काले (डरावने) और लाल-लाल आंखों वाली भौतिक जीवंत सत्ता के तौर पर किया गया है । यह दण्ड के भयकारक स्वरूप को प्रस्तुत करने का तरीका है, जिसे शब्दशः ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है । कहने का प्रयोजन मात्र यह है कि दण्ड वैसा ही भयजनक है जैसे कोई मतिमान् डरावना पशु आपके समक्ष खड़ा हो जाए । यानी दण्ड का विचार व्यक्ति को भयभीत कर सके, इसलिए ऐसा वर्णन प्रस्तुत है । जहां नेता अपराधी को ऐसे दण्ड का भय दिखाए वहां शेष प्रजा निडर रह सकती है ।
तस्याहुः सम्प्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम् ।
समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम् ॥२६॥
(तस्य आहुः सम्प्रणेतारम् राजानम् सत्य-वादिनम् समीक्ष्य-कारिणम् प्राज्ञम् धर्म-काम-अर्थ-कोविदम् ।)
भावार्थः दुर्जनों पर ऐसे दण्ड का प्रयोग करने वाले राजा को सत्यवादी, सोच-विचारकर कार्य करने वाला, बुद्धिमान्, और धर्म, काम एवं अर्थ की समझ रखने वाला कहा गया है ।
धर्म, काम एवं अर्थ को शास्त्रों में ‘त्रिवर्ग’ की संज्ञा दी गयी है । सांसारिक जीवन इन तीनों के चारों ओर केंद्रित रहता है । ‘अर्थ’ से तात्पर्य है धनसंपदा जिसके बल पर ‘काम’ अर्थात् भौतिक कामनाओं एवं सुखसुविधाओं का भोग व्यक्ति द्वारा किया जाता है, और जिससे दान, पुण्य, जनसेवा आदि जैसे ‘धर्म’ के कार्य संपन्न किए जाते है । इन तीनों में संतुलन बनाए रखकर जीवन यापन करना सामान्य व्यक्ति का कर्तव्य माना गया है । उक्त श्लोक के अनुसार न्यायप्रिय राजा त्रिवर्ग को ठीक-से समझने वाला कहा जाएगा ।
तं राजा प्रणयन्सम्यक् त्रिवर्गेणाभिवर्धते ।
कामात्मा विषमः क्षुद्रो दण्डेनैव निहन्यते ॥२७॥
(तम् राजा प्रणयन् सम्यक् त्रिवर्गेण अभिवर्धते काम-आत्मा विषमः क्षुद्रः दण्डेन एव निहन्यते ।)
भावार्थः उस दण्ड का समुचित प्रयोग करने वाला राजा त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ एवं काम) की दृष्टि से समृद्ध होता है । अर्थात् न्याय के मार्ग पर चलने वाले राजा को आर्थिक संपन्नता के साथ सुखभोग और धर्म-संपादन में सफलता मिलती है । इसके विपरीत जो राजा भोगविलास या सत्तासुख में डूबा रहता है, जो लोगों के प्रति असमान या गैरबराबरी (अन्यायपूर्ण) का बरताव करता हो, और जो नीच स्वभाव का हो, वह उसी दण्ड के द्वारा मारा जाता है ।
कहने का तात्पर्य यह है कि जो राजा दण्ड के योग्य व्यक्तियों को दण्डित नहीं करता है वह कालांतर में उन्हीं दुर्जनों के कारण सत्ताच्युति का भागीदार बनता है । वर्तमान परिप्रेक्ष में राजा के माने हैं शासकीय व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे लोग जो राजकाज चलाते हैं । उनका आचरण ही न्याय की दिशा निर्धारित करता है ।
यह अपने देश का दुर्भाग्य है कि इसकी न्यायिक व्यवस्था प्रायः विफल हो चुकी है । लोगों के मन से दण्डित होन का भय समाप्त होता जा रहा है । वे आश्वस्त होते जा रहे हैं कि अपराध करने के बावजूद वे दण्ड से बचे रहेंगे । – योगेन्द्र जोशी




मई 14, 2011 @ 21:02:48
समाज को दण्ड व्यवस्था से स्थिरता मिलती है, अभी स्थगित है।