ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः … – तैत्तिरीय उपनिषद् की प्रार्थना

तैत्तिरीय उपनिषद् 11 प्रमुख उपनिषदों (ईश, ऐतरेय, कठ, केन, छान्दोग्य, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक, माण्डूक्य, मुण्डक, प्रश्न, श्वेताश्वर) में से एक है । यों उपनिषदों की कुल संख्या इससे कहीं अधिक बताई जाती है । गीता प्रेस, गोरखपुर, के एक उपनिषद् विशेषांक में 54 उपनिषदों का उल्लेख है । किंतु पूर्वोक्त उपनिषदों को छोड़ अन्य चर्चा में कम ही सुनाई देते हैं । हर उपनिषद् का आरंभ ‘शान्तिपाठ’ से होता है, जो वस्तुतः एक प्रकार की प्रार्थना है । ये प्रार्थनाएं उन दैवी शक्तियों को संबोधित रहती हैं जिन्हें आस्थावान् लोग सृष्टि के विविध घटकों से जोड़कर देखते आए हैं । वैदिक मान्यता है कि निर्जीव-सी दिखने वाली हर वस्तु के पीछे एक अधिष्ठाता देवता रहता है । उस देवता से कल्याण की प्रार्थना शान्तिपाठ में निहित रहती है ।

तैत्तिरीय उपनिषद् तीन अध्यायों में बंटा है जिनको ‘वल्ली’नाम दिया गया है; ये हैं शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली, एवं भृगुवल्ली । प्रत्येक वल्ली में दिये गये वचन ‘अनुवाक’कहे जाते हैं । इस उपनिषद् का अध्ययन जिस शान्तिपाठ अथवा प्रार्थना से होता है वह अपेक्षया अचर्चित कौषितकीब्राह्मणोपनिषद् तथा मुद्गलोपनिषद् में भी शामिल है । यह प्रार्थना निम्नलिखित है:

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं बह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् ।

ॐ शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः ।   

 (ॐ शं नः मित्रः शं वरुणः । शं नः भवतु अर्यमा । शं नः इन्द्रः बृहस्पतिः । शं नः विष्णुः उरुक्रमः । नमः ब्रह्मणे । नमः ते वायो । त्वम् एव प्रत्यक्षं बह्म असि । त्वाम् एव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तत् माम् अवतु । तत् वक्तारम् अवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः ।)  

अर्थ - देवता ‘मित्र’ हमारे लिए कल्याणकारी हों, वरुण कल्याणकारी हों । ‘अर्यमा’हमारा कल्याण करें । हमारे लिए इन्द्र एवं बृहस्पति कल्याणप्रद हों । ‘उरुक्रम’ (विशाल डगों वाले) विष्णु हमारे प्रति कल्याणप्रद हों । ब्रह्म को नमन है । वायुदेव तुम्हें नमस्कार है । तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो । अतः तुम्हें ही प्रत्यक्ष तौर पर ब्रह्म कहूंगा । ऋत बोलूंगा । सत्य बोलूंगा । वह ब्रह्म मेरी रक्षा करें । वह वक्ता आचार्य की रक्षा करें । रक्षा करें मेरी । रक्षा करें वक्ता आचार्य की । त्रिविध ताप की शांति हो ।

मैं इस प्रार्थना में प्रयुक्त कई संबोधनों/शब्दों के अर्थ समझ नहीं पाया हूं । जैसा पहले कहा गया है, प्रकृति के विविध घटकों और प्राणियों की जैविक प्रक्रियाओं के साथ देवताओं को अधिष्ठाता के तौर पर जोड़ा गया है । ‘मित्र प्राणवायु एवं दिन का अधिष्ठाता देवता है, जब कि वरुण रात्रि एवं अपानवायु का अधिष्ठाता है । सामान्यतः मित्र  के अर्थ सूर्य से लिया जाता है और वरुण को समुद्र तथा जल से जोड़ा जाता है । अर्यमा सूर्यमंडल का देवता है । शब्दकोष में सूर्य को अर्यमा भी कहा गया है । इंद्र वर्षा एवं बृहस्पति बुद्धि के देवता माने गये हैं । (संस्कत में ‘मित्र’शब्द पृल्लिंग में सूर्य, और नपुंसकलिंग में यार-दोस्त-सुहृद् को व्यक्त करता है ।)

विष्णु को पैरों का देवता, अर्थतः गति का देवता, माना गया है । उरुक्रम का शाब्दिक अर्थ है विशाल डगों वाला । कदाचित् इसका संबंध पौराणिक कथाओं में वर्णित वामनावतार में विष्णु द्वारा तीन लोकों को तीन चरणों में नापे जाने से है ।

वैदिक चिंतक शरीर में उपस्थित पांच वायुओं की बात करते हैं । ये हैं: प्राण, अपान, समान, व्यान एवं उदान प्राणवायु का स्थान फेफड़े हैं । शरीर में इसका आवागमन मुख/नासिका के माध्यम से होता है तथा यह जीवन का आधार है । इसके विपरीत अपान मलद्वार से निष्कासित होने वाली वायु है । नाभिक्षेत्र में स्थित पाचन क्रिया में सम्मिलित प्राणशक्ति को समान कहा जाता है । व्यान वह प्राणशक्ति है जो समस्त शरीर में व्याप्त रहती है । इसे कदाचित् रक्त द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचने वाले पोषक तत्वों के प्रवाह से जोड़ा जा सकता है । और अंत में उदान मस्तिष्क की क्रियाओं को संचालित करने वाली प्राणशक्ति है । वास्तव में ये प्राणशक्तियां क्या हैं मैं समझ नहीं सका हूं ।

इस प्रार्थना में यह तथ्य निहित है कि वह परम ब्रह्म स्वयं को अलग-अलग स्वरूपों में प्रस्तुत करता है । उस ब्रह्म को प्रणाम किया जा रहा है । वायु प्रत्यक्ष और सर्वप्रथम अनुभव की जाने वाली वस्तु है । अतः वायु को ब्रह्म का प्रत्यक्षतः अनुभव में आने वाला देवता कहकर उसी को ब्रह्म कहने की बात कही गयी है ।

ऋत सत्य का ही पर्याय है । यहां पर ऋत वचन उचित एवं निष्ठापरक कथन को व्यक्त करता है । वस्तुनिष्ठ स्तर पर कोई चीज जैसी हो वैसी कहना सत्य कहा गया है ।

इस शान्तिपाठ में शिष्य ब्रह्म से अपनी एवं अपने आचार्य यानी उपदेष्टा वक्ता की रक्षा की प्रार्थना करता है ।

और अंत में तीन बार ‘शान्तिः’ का उच्चारण त्रिविध तापों का कष्टों के शमन हेतु किया गया है । ये ताप हैं: आधिभौतिक, आधिदैविक, एवं आध्यात्मिक – (क्रमशः सांसारिक वस्तुओं/जीवों से प्राप्त कष्ट, दैवी शक्तियों द्वारा दिया गया या पूर्व में स्वयं के किए गये कर्मों से प्राप्त कष्ट, और अध्यात्मिक अज्ञानजनित कष्ट ।) – योगेन्द्र जोशी

महाभारत महाकाव्यः वृक्षरोपण एवं जलाशय विषयक नीतिवचन (1)

महर्षि व्यासविरचित महाकाव्य महाभारत में एक प्रकरण है, जिसमें भीष्म पितामह महाराज युधिष्ठिर को प्रजा के हित में शासन चलाने के बारे में उपदेश देते हैं । यह प्रकरण कौरव-पांडव समाप्ति के बाद युधिष्ठिर द्वारा राजकाज संभालने के समय का है । इसी के अंतर्गत एक स्थल पर मृत्युशय्या पर आसीन भीष्म जलाशयों के निर्माण एवं वृक्षरोपण की आवश्यकता स्पष्ट करते हैं । ये बातें महाकाव्य के अनुशासन पर्व के अठावनवें अध्याय में वर्णित हैं । ३३ श्लोकों के उक्त अध्याय में बहुत-सी बातें कही गई हैं । मैं अध्याय के अंतिम ८ श्लोकों को इस ब्लॉग में उद्धृत कर रहा हूं:

अतीतानागते चोभे पितृवंशं च भारत ।
तारयेद् वृक्षरोपी च तस्मात् वृक्षांश्च रोपयेत् ॥
(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय ५८, श्लोक २६)
(भारत! वृक्ष-रोपी अतीत-अनागते च उभे पितृ-वंशं च तारयेद्, तस्मात् च वृक्षान् च रोपयेत् ।)
अर्थ - हे युधिष्ठिर! वृक्षों का रोपण करने वाला मनुष्य अतीत में जन्मे पूर्वजों, भविष्य में जन्मने वाली संतानों एवं अपने पितृवंश का तारण करता है । इसलिए उसे चाहिए कि पेड़-पौंधे लगाये ।

तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपा नात्र संशयः ।
परलोगतः स्वर्गं लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् ॥
(पूर्वोक्त, श्लोक २७)
(एते पादपाः तस्य पुत्राः भवन्ति अत्र संशयः न; परलोक-गतः सः स्वर्गं अव्ययान् लोकान् च आप्नोति ।)
अर्थ - मनुष्य द्वारा लगाए गये वृक्ष वास्तव में उसके पुत्र होते हैं इस बात में कोई शंका नहीं है । जब उस व्यक्ति का देहावसान होता है तो उसे स्वर्ग एवं अन्य अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ।

अधिकतर हिंदू पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं । प्रायः सभी मानते हैं कि आत्मा अमर होती है और उसके जन्म का अर्थ है भौतिक शरीर धारण करना और मृत्यु उस देह का त्यागा जाना । मृत्यु पश्चात् वह इस मर्त्यलोक से अन्य लोकों में विचरण करती है जो उसके कर्मों पर निर्भर करता है और जहां उसे सुख अथवा दुःख भोगने होते हैं ।

मान्यता यह भी है कि देहमुक्त आत्मा का तारण या कष्टों से मुक्ति में पुत्र का योगदान रहता है । संस्कृत में पुत्र शब्द की व्युत्पत्ति इसी रूप में की गयी है । (पुंनाम्नो नरकाद्यस्मात्त्रायते पितरं सुतः । तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा ॥ अर्थात् ‘पुं’ नाम के नरक से जिस कारण सुत पिता का त्रारण करता है उसी कारण से वह पुत्र कहलाता है ऐसा स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा कहा गया है । – मनुस्मृति, अध्याय 9, श्लोक 138 ।) मेरा मानना है कि पुत्र शब्द व्यापक अर्थ में प्रयुक्त किया गया है, अर्थात् यह पुत्र एवं पुत्री दोनों को व्यक्त करता है, कारण कि पुत्री – स्त्रीलिंग – की व्युत्पत्ति भी वस्तुतः वही है । कई शब्द पुल्लिंग में इस्तेमाल होते हैं, किंतु उनसे पुरुष या स्त्री दोनों की अभिव्यक्ति होती है, जैसे मानव या मनुष्य अकेले मर्द को ही नहीं दर्शाता बल्कि मर्द-औरत सभी उसमें शामिल रहते हैं । आदमी या इंसान स्त्री-पुरुष सभी के लिए प्रयोग में लिया जाता है । मैं समझता हूं कि प्राचीन काल में पुत्र सभी संतानों के लिए चयनित शब्द रहा होगा। कालांतर में वह रूढ़ अर्थ में प्रयुक्त होने लगा होगा।

उपर्युक्त श्लोकों के भावार्थ यह लिए जा सकते हैं कि वृक्षों का लगाना संतानोत्पत्ति के समान है । वे मनुष्य की संतान के समान हैं, इसलिए वे मनुष्य के पूर्वजों/वंशजों के उद्धार करने में समर्थ होते हैं । वृक्ष की तुलना संतान से की गयी है।

स्वर्ग/नरक की बातें विश्वसनीय हों या न हों, वृक्षों की महत्ता संदेह से परे है । आज के युग में जब मानवजाति परिवेश-पर्यावरण की समस्याओं को वैश्विक स्तर पर झेल रही है, वृक्षों की उपादेयता सहज रूप से अनुभव होने लगी है ।

इस शृंखला के शेष श्लोकों का उल्लेख आगामी आलेखों में – योगेन्द्र जोशी

‘मधु वाता ऋतायते …’ – ऋग्वेद में मधुमय जीवन की प्रार्थना

ऋग्वेद के प्रथम मंडल में कुछ ऋचाएं हैं जिनमें मधु शब्द का वारंवार प्रयोग हुआ है । आम जन मधु शब्द को सामान्यतः शहद के लिए प्रयोग में लेते हैं । किंतु इन ऋचाओं में उसे व्यापक अर्थ में लिया गया है । मधु का अर्थ है जो मिठास लिए हो, जिससे सुखानुभूति हो, जो आनंदप्रद हो, अथवा जो श्रेयस्कर हो । मैं आगे के अनुच्छेदों में ऐसी तीन ऋचाओं का उल्लेख कर रहा हूं । यहां पर व्यक्त मेरे विचार सायणाचार्यकृत भाष्य पर आधारित हैं ।

ये ऋचाएं ऋग्वेद, मंडल 1, सूक्त 91 से क्रमशः ली गयीं हैं ।

मधु वाता ऋतायते मधुं क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥6॥
(मधु वाताः ऋत-अयते, मधुं क्षरन्ति सिन्धवः, माध्वीः नः सन्तु ओषधीः ।)
भावार्थ – यज्ञकर्म में लगे हुए, अर्थात् यजमान, को वायुदेव मधु प्रदान करते हैं; तरंगमय जलप्रवाह जिनमें होता है उन नदियों से मधु चूता है; संसार में उपलब्ध विविध ओषधियां हमारे लिए मधुमय हों ।

प्रसंग के अनुसार, तथा जैसा आगे की ऋचाओं से स्पष्ट है, यहां कहे गये ‘प्रदान करते हैं’, ‘चूता है’, का अर्थ प्रदान करें की प्रार्थना से लिया जाना चाहिए । यों तो रूढ़ि अर्थ में यज्ञ का अर्थ है प्रज्वलित अग्नि में हविः की आहुति देना, किंतु अधिक व्यापक अर्थ में यज्ञ का अर्थ है सार्थक कर्म से अपने को जोड़ना, उस कर्म में लगना । जैसा ऊपर कहा गया है, मधु के उपयुक्त अर्थ लिए जाने चाहिए ।

मधु नक्तुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता ॥7॥
(मधु नक्तम् उत उषसः, मधु-मत् पार्थिवम् रजः, मधु द्यौः अस्तु नः पिता ।)
भावार्थ – रात्रि हमारे लिए मधुप्रदाता होवे; और उसी प्रकार उषाकाल, अर्थात् सूर्योदय के पहले का दिवसारंभ का समय, भी मधुप्रद हो; पृथ्वी धारण किया गया यह लोक मधुमय हो; जलवृष्टि द्वारा हमारा पालन करने वाला (पिता) द्युलोक (आकाश) माधुर्य लिए होवे ।

मंतव्य कदाचित् यह है कि रात्रि शांतिप्रदा होवे, हमारे दिन का आरंभ प्रसन्नता के साथ होवे, संसार हमारे लिए आनंदप्रद हो, आकाश जल वर्षा द्वारा सुखद भविष्य की आशा जगाए ।

मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमान् अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥8॥
(मधुमान् नः वनस्पतिः, मधुमान् अस्तु सूर्यः, माध्वीः गावः भवन्तु नः ।)
भावार्थ – वनों के स्वामी (अधिष्ठाता देवता) मधुर फल देने वाले हों; आकाश में विचरण करने वाले सूर्य मधुरता प्रदान करें; हमारी गौवें मधुमय दूध देने वाली हों । (वनस्पति माने वनों का पति या पालनकर्ता; सामान्य बोलचाल में वनस्पति पेड़-पौधों आदि के लिए प्रयोग में लिया जाता है ।)

वनों के स्वामी फल दें अर्थात् वनस्पतियां ऐसी हों कि उन पर मीठे फल लगें । सूर्य आकाश में सरण (सरकना) करता है जिससे उसे यह नाम मिला है । वह अपने द्वारा नियंत्रित ऋतुओं के माध्यम से हमें समुचित फल प्रदान करे यह भाव व्यक्त है । गायें सुस्वादु एवं प्रचुर मात्रा में दूध प्रदान करें ।

दैवी शक्तियों को संबोधित ऐसे वैदिक मंत्र क्या वास्तव में प्रभावी हो सकते हैं । मेरे पास कोई उत्तर नहीं है । इतना अवश्य है जैसे हम परस्पर शुभकामनाएं व्यक्त करते हैं उसी प्रकार इन ऋचाओं में सुखद एवं सफल जीवन की कामना या कल्पना का भाव निहित है । इसके अतिरिक्त प्रकृति के विभिन्न घटकों अथवा अंगों के प्रति सम्मान भाव भी इनमें दिखाई देता है । यह भावना आधुनिक समय में अधिक प्रासंगिक हो चला है । – योगेन्द्र जोशी

‘दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति …’ – महाभारत, शांतिपर्व, में शासकीय दण्ड की नीति

महाभारत महाकाव्य के आरंभिक पर्व – आदिपर्व – में अपराधी को देय दण्ड की महत्ता का उल्लेख है । उसका जिक्र मैंने पहले की एक पोस्ट में किया था । मुझे महाभारत युद्ध के बाद की स्थिति से संबंधित पर्व – शान्तिपर्व – में भी दण्ड की बातें पढ़ने को मिली हैं । मैं कुछ चुने हुए श्लोकों का उल्लेख आगे कर रहा हूं । (संदर्भः महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय 15)

दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ।

दण्डः सुप्तेषु जागर्र्ति दण्डं धर्म विदुर्बुधाः ॥2॥

(दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः दण्ड एव अभिरक्षति दण्डः सुप्तेषु जागर्र्ति दण्डं धर्मः विदुः बुधाः ।)

भावार्थः (अपराधियों को नियंत्रण में रखने के लिए दण्ड की व्यवस्था हर प्रभावी एवं सफल शासकीय तंत्र का आवश्यक अंग होती है ।) यही दण्ड है जो प्रजा को शासित-अनुशासित रखता है और यही उन सबकी रक्षा करता है । यही दण्ड रात्रिकाल में जगा रहता है और इसी को विद्वज्जन धर्म के तौर पर देखते हैं ।

शासन का कर्तव्य है कि वह हर क्षण अपराधों को रोकने के लिए सजग रहे। रात हो या दिन, उसके राजकर्मी घटित हो रहे अपराधों पर नजर रखें और अपराधी को दंडित करें । यदि ऐसा न हो तो लोग सुरक्षित नहीं रहेंगे । दण्ड ही शासकीय तंत्र का प्रमुख धर्म है ।

दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विनश्येयुरिमाः प्रजाः ।

जले मत्स्यानिवाभक्षन् दुर्बलान् बलवत्तराः ॥30॥

(दण्डः चेत् न भवेत् लोके विनश्येयुः इमाः प्रजाः जले मत्स्यान् इव अभक्षन् दुर्बलान् बलवत्-तराः ।)

भावार्थः यदि दण्ड न रहे, अर्थात् दण्ड की प्रभावी व्यवस्था न हो, तो प्रजा का विनाश निश्चित है । जिस प्रकार पानी में पलने वाली छोटी मछली का भक्षण बड़ी मछली कर डालती है उसी प्रकार अपेक्षया अधिक बलवान् व्यक्ति दुर्बलों का ‘भक्षण’ कर डालेंगे ।

प्रभावी दण्ड के अभाव का अर्थ है अराजकता । अधिकांश जन दण्ड के भय से अपराधों से बचे रहते हैं । अगर दण्ड न रहे तो लूटपाट-छीनाझपटी आम बात हो जाएंगी । ताकतवर लोग अपनी दबंगई के बल पर कमजोरों को नचाना आरंभ कर देंगे, उन्हें भांति-भांति प्रकार से प्रताड़ित करने लगेंगे । मनुस्मृति में भी यह बात कही गयी है, जिसकी चर्चा मैंने अन्यत्र कही है । वहां दिये गये श्लोक के शब्द थोड़े भिन्न हैं:

यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः । शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः ॥

सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्जनः ।

दण्डस्य हि भयात् भीतो भोगायैव प्रवर्तते ॥34॥

(सर्वः दण्डजितः लोकः दुर्लभः हि शुचिः जनः दण्डस्य हि भयात् भीतः भोगाय एव प्रवर्तते ।)

भावार्थः यह संसार दण्ड से ही जीता जा सकता है, अर्थात् यहां पर लोग दण्ड के प्रयोग से ही नियंत्रित रहते हैं । अन्यथा स्वभाव से सच्चरित्र लोग यहां विरले ही होते हैं । यह दण्ड का ही भय है कि लोग भोगादि की मर्यायाओं का उल्लंघन नहीं करते हैं ।

मनुस्मृति में यह श्लोक दो-चार शब्दों के अंतर के साथ यों दिया गया हैः

सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः । दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥

दण्डे स्थिताः प्रजाः सर्वा भयं दण्डे विदुर्बुधाः ।

दण्डे स्वर्गो मनुष्याणां लोको९यं सुप्रतिष्ठितः ॥43॥

(दण्डे स्थिताः प्रजाः सर्वाः भयं दण्डे विदुः बुधाः दण्डे स्वर्गः मनुष्याणां लोकः अयं सुप्रतिष्ठितः ।)

भावार्थः संपूर्ण प्रजा दण्ड में स्थित रहती है । अर्थात् दण्ड की व्यवस्था के अंतर्गत लोग अनुशासित रहते हैं और अपने कर्तव्यों की अवहेलना नहीं करते हैं । मनुष्य के परलोक एवं इहलोक, दोनों ही, दण्ड पर टिके हैं ।

दण्ड का भय उसे पापकर्मों से बचाता है, अतः उसके कृत्य उसके अपने लिए एवं समाज के लिए अहितकर नहीं होते हैं । उस स्थिति में परलोक भी – यदि इसके अस्तित्व में आस्था रखी जाए तो – दुःखमुक्त होगा ऐसी अपेक्षा की जाती है ।

न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वापि दृष्यते ।

यत्र दण्डः सुविहितश्चरत्यरिविनाशनः ॥44॥

(न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वा अपि दृष्यते यत्र दण्डः सुविहितः चरति अरि-विनाशनः ।)

भावार्थः जहां शत्रुनाशक दण्ड का संचालन सुचारु तौर पर चल रहा हो वहां छल-कपट, पाप या ठगी जैसी बातें देखने को नहीं मिलती हैं ।

शत्रु से मतलब है वह जो अपने भ्रष्ट आचरण से समाज का अहित करने पर तुला हो । दण्ड उनको नियंत्रण में रखता है, अतः उसे शत्रुनाशक कहा गया है । उसी के समुचित प्रयोग किए जाने पर समाज में लोगों का व्यवहार असामाजिक नहीं हो पाता है । मैंने मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, एवं महाभारत आदि जैसे प्राचीन ग्रंथों में दण्ड की बात पढ़ी है । न्याय की बात उनमें कम ही की गयी है । उनमें अपराधियों को दण्डित करने की बातों पर बल दिया गया है । मुझे लगता है कि तत्कालीन नीतिकार भली भांति समझते थे कि अपराधी को दण्डित तो कर सकते हैं, किंतु भुक्तभोगी को न्याय दे सकें यह शायद नहीं हो सकता है । जो हो चुका उसको उलटा ही नहीं जा सकता है । जो मर चुका उसे वापस नहीं ला सकते । दूसरे के कुकृत्य का दंश झेलने वाले की पीड़ा समाप्त नहीं हो सकती । जिसका मूल्यवान् समय छीना जा चुका हो उसे वापस नहीं पाया जा सकता है । इसलिए न्याय की अवधारणा भ्रामक है । केवल दण्ड की ही बात सार्थक है और उसके कार्यान्वयन में न्याय भी निहित हो यह मानना मूर्खता है ।

यह अपने देश का दुर्भाग्य है कि यहां दण्ड व्यवस्था निष्प्रभावी-सी हो चुकी है, खासकर रसूखदार लोगों के मामले में । - योगेन्द्र जोशी

“न स सखा यो न ददाति सख्ये… ” – ऋग्वेद में दानशीलता की नीतिगत बातें

हिंदुओं के लिए वेदों का सैद्धांतिक महत्त्व आज भी है । सैद्धांतिक शब्द का प्रयोग मैं इसलिए कर रहा हूं कि व्यवहार में अब वेदों का अध्ययन करने वाले प्रायः नहीं के बराबर रह गये हैं, और उनके अनुसार जीवन यापन करने वाला तो शायद ही कोई रह गया होगा । वेद कितने स्वीकार्य हैं, इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि उनकी कई बातें प्रासंगिक और व्यावहारिक उपयोगिता की हैं । 

पुरातन ऋग्वेद ग्रंथ में मुझे तीन प्रकार की बातें पढ़ने को मिली हैं । एक ओर तो इसमें कर्मकांड और यज्ञयाज्ञादि के अनुष्ठान की वातें हैं, तो दूसरी ओर अध्यात्म और दर्शन के विचार हैं । इनके अतिरिक्त व्यावहारिक जीवन के कर्तव्यों और नीतियों का भी उल्लेख इसमें है । गंथ के मंडल 10 में मुझे दान देने और जरूरतमंदों की मदद करने संबंधी उपदेश पढ़ने को मिले हैं । मैं यहां पर चुनी हुई तीन ऋचाएं (मंत्र) प्रस्तुत कर रहा हूं ।

(ऋग्वेद, मंडल 10, सूक्त 117, ऋचाएं क्रमशः 2, 4, एवं 5)

य आध्राय चकमानाय पित्वो९न्नवान्सन्रफितायोपजग्मुषे । स्थिरं मनः कृणुते सेवते पुरोतो चित्स मर्डितारं न विन्दते ॥ 
(य आध्राय चकमानाय पित्वः अन्नवान् सन् रफिताय उपजग्मुषे स्थिरं मनः कृणुते सेवते पुरा उतो चित् सः मर्डितारं न विन्दते ।) 
जो व्यक्ति अन्नवान् होते हुए निर्धनता से दुर्बल हुए पास आए याचक को अन्नदान नहीं करता, बल्कि मन कठोर रखते हुए उसके समक्ष अन्न का उपभोग अकेले करता है वह स्वयं भी कहीं सुख नहीं पा सकता । 

मेरे मतानुसार इस मंत्र में अन्न का अर्थ जीवनाधार अन्न-संपदाएं यानी भोग्य वस्तुएं होना चाहिए । संपन्न व्यक्ति के मन में भूखे-प्यासे के प्रति कुछ करुणा भाव तो जगना ही चाहिए । ‘कहीं सुख नहीं पा सकता’ के अर्थ पारलौकिक सुख से तो नहीं है ? वैदिक चिंतक इहलोक-परलोक के सतत चलने वाले चक्र में विश्वास करते थे, और मानते थे कि इहलोक के कर्मों पर परलोक निर्भर करता है । 

न स सखा यो न ददाति सख्ये सचाभुवे सचमानाय पित्वः । अपास्मात्प्रेयान्न तदोको अस्ति पृणन्तमन्यमरणं चिदिच्छेत् ॥ 
(न स सखा यः न ददाति सख्ये सचाभुवे सचमानाय पित्वः अप अस्मात् प्रेयात् न तत् ओको अस्ति पृणन्तम् अन्यं अरणं चित् इच्छेत् ।) 
जो व्यक्ति अपने साथ रहने वाले सहायक सहचर सखा को अन्नादि नहीं देता वह सुहृद् कहलाने के योग्य नहीं है । इस व्यक्ति का घर अपने योग्य नहीं है इस विचार के साथ सखा को उस व्यक्ति साथ छोड़कर अन्नादि की याचना करते हुए अन्यत्र अपना आश्रय तलाशना चाहिए ।  

सखा और मित्र शब्दों में भेद है । मोटे तौर पर दोनों समानार्थी मान लिए जाते हैं । मित्र व्यक्ति सदैव पास रहता हो आवश्यक नहीं; यह भावनात्मक अधिक है । इसके विपरीत सखा साथ में रहकर सहचर/परिचर की भूमिका में रहता है; अर्थात् साथ में रहने वाला सखा होता है । 

पृणीयादिन्नाधमानाय तव्यान्द्राघीयांसमनु पश्येत पन्थाम् । ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्रान्यमन्यमुपतिष्ठन्त रायः ॥ 
(पृणीयात् इत् न अधमानाय तव्यान् द्राघीयांसम् अनुपश्येत पन्थाम् ओ हि वर्तन्ते रथ्या इव चक्रा अन्यम् अन्यम् उपतिष्ठन्त रायः ।) 
धनसंपदाओं से सुसमृद्ध व्यक्ति को चाहिए कि वह याचक की मांग को पूरी करते हुए पुण्यमार्ग का अनुसरण करे । संपदाओं का क्या है, वे तो कहीं भी सदैव के लिए नहीं टिकतीं । जैसे रथ के पहिए के अर (आरा) एक-दूसरे का स्थान लेती हुई अपना स्थान बदलती हैं वैसे ही संपदा भी अपना स्थान बदलती रहती हैं । 

यह मंत्र मनुष्य को धनसंपदा की नश्वरता का ध्यान दिलाती है । मंत्र कहता है कि कल तुम भी निर्धन हो सकते हो या कालांतर में तुम्हारी संपदा का नाश हो सकता है । निश्चय की धन की अनश्वरता संदेहास्पद है । यदि आप इतिहास पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि आज के सुसंपन्न लोगों की पूर्ववर्ती चौथी-पांचवीं पीढ़ियां सामान्य ही रही हैं, और जो लोग तीन-चार पीढ़ी पहले तक संपन्न रहे हैं उनके वंशजों की सुसंपन्नता की बातें नहीं होती हैं । असल में धन की तीन नियतियों का उल्लेख नीतिशास्त्रों में मिलता हैः भोग, दान एवं नाश । मनुष्य एक सीमा से अधिक भोग कर ही नहीं सकता है । ऐसे में उसे धन का एक अंश दान में खर्च करना ही चाहिए । यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो उस धन का अन्य तरीके से नाश ही अंतिम परिणति रह जाती है । अयोग्य उत्तराधिकारियों के हाथ में पहुंचकर उस धन की बरबादी अवश्यंभावी है । 

यह दुर्भाग्य की बात है कि स्वयं को धर्मनिष्ठ कहने वाले भारतीय समाज के लोगों के मन में जरूरतमंदों की आर्थिक मदद का विचार आता ही नहीं है । सीमित भोग के पश्चात् अपने धन को वे ‘और अधिक धन’ बटोरने में निवेश करते हैं । धन बढ़ता जाता है, लेकिन निरंतर बढ़ते हुए उस धन का उपभोग होगा कैसे यह प्रश्न उनके लिए महत्त्व नहीं रखता है । - योगेन्द्र जोशी

‘अराजके जनपदे दोषा जायन्ते …’ – महाभारत में शासकीय दण्ड की आवश्यकता का उल्लेख

किसी भी शासकीय व्यवस्था में दण्ड की व्यवस्था आवश्यक है । मनुस्मृति में तत्संबंधित कुछएक श्लोकों का उल्लेख मैंने इसी ब्लाग के 14 मई की पोस्ट में किया था ।

उसी आशय के नीतिवचन मुझे महाभारत के आदिपर्व के ‘आस्तीक’ प्रकरण में पढ़ने को मिले हैं । उक्त प्रकरण अर्जुन के प्रपौत्र, अभिमन्यु के पौत्र, एवं परीक्षित् के पुत्र राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ को ऋषि आस्तीक द्वारा निष्प्रभावी किये जाने से संबद्ध है । मैं संबंधित कथा का उल्लेख नहीं कर रहा हूं । केवल इतना बता दूं कि एक बार जंगल में वन्य जन्तुओं का शिकार करते हुए थके-हारे राजा परीक्षित् ने मौनव्रत के साथ तप में तल्लीन ऋषि शमीक के कंधों पर उनसे प्रत्युत्तर न पा सकने से क्रुद्ध होकर मृत सर्प डाल दिया था । घटना से क्षुब्ध ऋषिपुत्र शृंगी ने राजा परीक्षित् को शाप दे डाला था कि तक्षक नाग के डसने से उसकी मृत्यु होवे । बाद में ऋषि शमीक ने पुत्र शृंगी को समझाते हुए परीक्षित् की बतौर राजा के प्रशंसा की और शासन के लिए राजा के होने और उसके दण्ड के अधिकार से सज्जित रहने की महत्ता की बात की । उसी संदर्भ में कहे गए वचनों में से मैंने अधोलिखित तीन श्लोक चुने हैं (महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 41):

अराजके जनपदे दोषा जायन्ते वै सदा ।
उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति वै ॥२७॥

(अराजके जनपदे सदा वै दोषाः जायन्ते, राजा सततम् उद्वृत्तम् लोकम् दण्डेन वै शास्ति ।)
जिस प्रदेश में समुचित राजकीय व्यवस्था का अभाव हो वहां प्रजा में दोष या अपराध की प्रवृत्ति घर कर जाती है । उच्छृंखल या उद्धत जनसमूह को राजा ही दण्ड के प्रयोग द्वारा निरंतर अनुशासित रखता है ।

आज के युग में राजा की जगह चुने गये शासकों ने ले ली है । किंतु अपराध रोकने और अपराधियों को दण्डित करने का उनका कर्तव्य यथावत् है । दुर्भाग्य से आज हमारे देश में अपराधी को सजा देने का कार्य त्वरित एवं निर्णायक तरीके से नहीं हो रहा है ।

दण्डात् प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते तदा ।
नोद्विग्नश्चरते धर्मं नोद्विग्नश्चरते क्रियाम् ॥२८॥

(दण्डात् भूयः प्रतिभयम्, तदा शान्तिः उत्पद्यते, उद्विग्नः धर्मम् न चरते, उद्विग्नः क्रियाम् न चरते ।)
दण्ड यानी सजा की व्यवस्था अधिकांशतः भय पैदा करता है और तब शान्ति स्थापित होती है । उद्विग्न या बेचैन व्यक्ति धर्माचरण नहीं करता है, और न ही ऐसा व्यक्ति अपने कर्तव्य का निर्वाह कर पाता है ।

जब दण्डित होने का भय समाज में रहता है तब लोगों में अपराध करने का साहस सामान्यतः नहीं होता है । समाज में सुरक्षा और निश्चिंतता की भावना व्याप्त रहती है । लोग उचित-अनुचित के विवेक के साथ अपने कर्तव्य का निर्वाह कर पाते हैं ।

राज्ञा प्रतिष्ठितो धर्मो धर्मात् स्वर्गः प्रतिष्ठितः ।
राज्ञो यज्ञक्रियाः सर्वा यज्ञात् देवाः प्रतिष्ठिताः ॥२९॥

(राज्ञा धर्मः प्रतिष्ठितः, धर्मात् स्वर्गः प्रतिष्ठितः, राज्ञः सर्वाः यज्ञक्रियाः, यज्ञात् देवाः प्रतिष्ठिताः ।)
राजा के द्वारा धर्म प्रतिष्ठित होता हैं और धर्म के माध्यम से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । राजा के द्वारा ही सभी यज्ञकर्म संपन्न होते हैं और यज्ञों से ही देवतागण प्रतिष्ठित होते हैं ।

प्रथम दो श्लोकों की बातें इसी भौतिक संसार के संदर्भ में महत्त्व रखती हैं । तीसरे श्लोक में दण्ड के समुचित प्रयोग की महत्ता परलोक एवं दैवी शक्तियों के संदर्भ में कही गयी है । भारतीय दर्शन के अनुसार स्वर्ग एवं नरक जैसे परलोकों का अस्तित्व है और मनुष्य के ऐहिक कर्म ही उसके परलोक का निर्धारण करते हैं । अमूर्त दैवी शक्तियों के अस्तित्व का भी भारतीय दर्शन में स्थान है । मनुष्य के कर्म उनके प्रसाद या रोष का आधार होते हैं । चूंकि राजा लोगों को दण्ड के माध्यम से सत्कर्म में लगाए रहता है, अतः स्वर्गलोक के लिए वही परोक्षतः सहायक बनता है । सामान्यतः यज्ञ का अर्थ देवताओं को प्रसन्न करने के लिए प्रज्वलित अग्नि में डाली जाने वाली घृतादि की आहुति के कर्मकाण्ड से लिया जाता है । किंतु यज्ञ का अर्थ अधिक व्यापक भी माना जाता है । विविध प्रयोजनों के लिए किए जाने वाले कर्मों को भी यज्ञ में ही शामिल किया जाता है ।

उक्त बातों का तात्पर्य यह है कि समाज पर शासन करने का दायित्व जिन पर हो उनका कर्तव्य है कि वे अनुचित कार्यों में लिप्त लोगों को दण्डित करें और ऐसा करके आम जन को सुरक्षा का भरोसा दें । – योगेन्द्र जोशी

‘सर्वो दण्डजितो लोको …’ – मनुस्मृति में वर्णित शासकीय दण्ड की महत्ता

मनुस्मृति हिंदू समाज का एक प्राचीन ग्रंथ है, जिसमें मनुष्य के कर्तव्यों का विवरण प्रस्तुत किया गया है । बहुत-से लोगों की दृष्टि में यह एक विवादास्पद ग्रंथ है, क्योंकि यह वर्ण-व्यवस्था का पक्षधर है और स्त्री को पुरुष के एकदम बराबर का दर्जा नहीं देता है, यद्यपि स्त्री को सम्मान का हकदार बताता है । समाज के प्रति मनुष्य के कर्तव्यों, शासकीय प्रबंधन और न्यायिक व्यवस्था के बाबत इस ग्रंथ में जो बातें लिखी गयी हैं वे तर्कसंगत एवं शाश्वत रूप से प्रासंगिक हैं । उक्त स्मृति की कुछ बातें भले ही लोगों के गले न उतरें, किंतु अधिकांश बातों का विरोध नहीं किया जा सकता है । उन्हें न स्वीकारना मेरे मत में दुराग्रह माना जाना चाहिए । अस्तु, अपराध को नियंत्रण में रखने के समुचित दण्ड का प्रयोग अत्यावश्यक है इस बात पर इस ग्रंथ में जोर दिया गया है । न्याय संबंधी बहुत सी बातें ग्रंथ के अध्याय 7 में पढ़ने को मिलती हैं । दण्ड की महत्ता को प्रतिपादित करने वाले चुने हुए 5 श्लोकों का मैं इस स्थल पर उल्लेख कर रहा हूं:

(सभी श्लोक मनुस्मृति, अध्याय ७ से उद्धृत)

यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः ॥२०॥
(यदि न प्रणयेत् राजा दण्डम् दण्ड्येषु अतन्द्रितः शूले मत्स्यान् इव अपक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तराः ।)
भावार्थः यदि राजा दण्डित किए जाने योग्य दुर्जनों के ऊपर दण्ड का प्रयोग नहीं करता है, तो बलशाली व्यक्ति दुर्बल लोगों को वैसे ही पकाऐंगे जैसे शूल अथवा सींक की मदद से मछली पकाई जाती है ।

कहने का तात्पर्य है कि समुचित सजा का कार्यान्वयन न होने पर  बलहीन लोगों पर बलशाली जन अत्याचार करेंगे । ध्यान रहे कि अत्याचार करने वाले शक्तिशाली होते हैं; वे धनबल, बाहुबल, शासकीय पहुंच आदि के सहारे अपनी मर्जी से चलने वाले होते हैं, और निर्बलों को कच्चा चबा जाने की नीयत रखते हैं । आज के सामाजिक माहौल में ऐसा सब हो रहा है यह हम सभी देख रहे हैं । दण्डित होने का भय दुर्जनों को रोकता है । नीति कहती है कि राजा का कर्तव्य है कि अपराधी को दण्ड देने में उसे रियायत तथा विलंब नहीं करना चाहिए । दुर्भाग्य से अपने देश में दण्ड देने की प्रक्रिया कमोबेश निष्प्रभावी है, कम के कम रसूखदार लोग तो दण्डित हो ही नहीं रहे है, और उनका मनोबल चरम पर है ।

आज के लोकतांत्रिक युग में पारंपरिक अर्थ में राजा नहीं रहे । उनका स्थान शासकवर्ग न ले लिया है । एक से अधिक व्यक्तियों का समूह राजा का स्थान ले चुका है । सिद्धांततः राजा के अधिकार उन्हें मिल चुके हैं, और राजा के कर्तव्यों का निर्वाह भी उन्हीं के जिम्मे है । अधिकारों के मामले में तो वे काफी आगे हैं, किंतु दायित्वों के क्षेत्र में उनका कार्य चिंताजनक है । उन्होंने दण्ड की प्रक्रिया को पेचीदा, समयासाध्य, अपराधी के प्रति नरमी वाला बना डाला है, इसलिए दिन प्रतिदिन अपराध बढ़ रहे हैं ।

सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।
दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥२२॥
(सर्वः दण्डजितः लोकः दुर्लभः हि शुचिः नरः दण्डस्य हि भयात् सर्वम् जगद् भोगाय कल्पते ।)
भावार्थः यह संसार दण्ड के द्वारा ही जीते जाने योग्य है, अर्थात् दण्ड के द्वारा ही इसे नियंत्रण में रखा जा सकता है । ऐसा व्यक्ति दुर्लभ है जो स्वभाव से ही साफ-सुथरा एवं सच्चरित्र हो, न कि दण्ड के भय से । दण्ड के भय से ही वह व्यवस्था बन पाती है जिसमें लोग अपनी संपदा का भोग कर पाते हैं ।

मतलब यह है कि अधिकतर लोग दण्डित होने के भय से ही अपराध या अनुचित कार्यों से विरत रहते हैं । अगर दण्डित होने का भय समाज में न हो तो चारों ओर दुर्व्यवस्था फैल जाए, लूटपाट मचने लगेगी, और अपनी ही संपदा का भोग लोग नहीं कर पायेंगे; दूसरे उस पर कब्जा कर लेंगे ।

यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा ।
प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधु पश्यति ॥२५॥
(यत्र श्यामः लोहिताक्षः दण्डः चरति पापहा प्रजाः तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत् साधु पश्यति ।)
भावार्थः जहां श्याम वर्ण एवं लाल नेत्रों वाला और पापों (पापियों?) का नाश करने वाला ‘दण्ड’ विचरण करता है, और जहां शासन का निर्वाह करने वाला उचितानुचित का विचार कर दण्ड देता है वहां प्रजा उद्विग्न या व्याकुल नहीं होती ।

दण्ड कोई मूर्तिमन्त वस्तु नहीं है, यह तो एक भाव है, अमूर्त अवधारणा है । किंतु शास्त्रों में उसका वर्णन काले (डरावने) और लाल-लाल आंखों वाली भौतिक जीवंत सत्ता के तौर पर किया गया है । यह दण्ड के भयकारक स्वरूप को प्रस्तुत करने का तरीका है, जिसे शब्दशः ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है । कहने का प्रयोजन मात्र यह है कि दण्ड वैसा ही भयजनक है जैसे कोई मतिमान् डरावना पशु आपके समक्ष खड़ा हो जाए । यानी दण्ड का विचार व्यक्ति को भयभीत कर सके, इसलिए ऐसा वर्णन प्रस्तुत है । जहां नेता अपराधी को ऐसे दण्ड का भय दिखाए वहां शेष प्रजा निडर रह सकती है ।

तस्याहुः सम्प्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम् ।
समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम् ॥२६॥
(तस्य आहुः सम्प्रणेतारम् राजानम् सत्य-वादिनम् समीक्ष्य-कारिणम् प्राज्ञम् धर्म-काम-अर्थ-कोविदम् ।)
भावार्थः दुर्जनों पर ऐसे दण्ड का प्रयोग करने वाले राजा को सत्यवादी, सोच-विचारकर कार्य करने वाला, बुद्धिमान्, और धर्म, काम एवं अर्थ की समझ रखने वाला कहा गया है ।

धर्म, काम एवं अर्थ को शास्त्रों में ‘त्रिवर्ग’ की संज्ञा दी गयी है । सांसारिक जीवन इन तीनों के चारों ओर केंद्रित रहता है । ‘अर्थ’ से तात्पर्य है धनसंपदा जिसके बल पर ‘काम’ अर्थात् भौतिक कामनाओं एवं सुखसुविधाओं का भोग व्यक्ति द्वारा किया जाता है, और जिससे दान, पुण्य, जनसेवा आदि जैसे ‘धर्म’ के कार्य संपन्न किए जाते है । इन तीनों में संतुलन बनाए रखकर जीवन यापन करना सामान्य व्यक्ति का कर्तव्य माना गया है । उक्त श्लोक के अनुसार न्यायप्रिय राजा त्रिवर्ग को ठीक-से समझने वाला कहा जाएगा ।

तं राजा प्रणयन्सम्यक् त्रिवर्गेणाभिवर्धते ।
कामात्मा विषमः क्षुद्रो दण्डेनैव निहन्यते ॥२७॥
(तम् राजा प्रणयन् सम्यक् त्रिवर्गेण अभिवर्धते काम-आत्मा विषमः क्षुद्रः दण्डेन एव निहन्यते ।)
भावार्थः उस दण्ड का समुचित प्रयोग करने वाला राजा त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ एवं काम) की दृष्टि से समृद्ध होता है । अर्थात् न्याय के मार्ग पर चलने वाले राजा को आर्थिक संपन्नता के साथ सुखभोग और धर्म-संपादन में सफलता मिलती है । इसके विपरीत जो राजा भोगविलास या सत्तासुख में डूबा रहता है, जो लोगों के प्रति असमान या गैरबराबरी (अन्यायपूर्ण) का बरताव करता हो, और जो नीच स्वभाव का हो, वह उसी दण्ड के द्वारा मारा जाता है ।

कहने का तात्पर्य यह है कि जो राजा दण्ड के योग्य व्यक्तियों को दण्डित नहीं करता है वह कालांतर में उन्हीं दुर्जनों के कारण सत्ताच्युति का भागीदार बनता है । वर्तमान परिप्रेक्ष में राजा के माने हैं शासकीय व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे लोग जो राजकाज चलाते हैं । उनका आचरण ही न्याय की दिशा निर्धारित करता है ।

यह अपने देश का दुर्भाग्य है कि इसकी न्यायिक व्यवस्था प्रायः विफल हो चुकी है । लोगों के मन से दण्डित होन का भय समाप्त होता जा रहा है । वे आश्वस्त होते जा रहे हैं कि अपराध करने के बावजूद वे दण्ड से बचे रहेंगे ।योगेन्द्र जोशी

‘भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम …’ – ऋग्वेद में स्वस्थ इंद्रियों के साथ शतायु जीवन की प्रार्थना

कई वेदमंत्रों में सूर्य, अग्नि, इंद्र, वरुण इत्यादि देवों के प्रति प्रार्थना का उल्लेख देखने को मिलता है । कुछ मंत्रों में देव शब्द के प्रयोग द्वारा उनकी सामूहिक स्तुति भी व्यक्त की गई । ये देव वस्तुतः क्या हैं मैं कभी समझ नहीं पाया । ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक चिंतकों का प्रकृति को नियंत्रित करने वाली अमूर्त दैवी शक्तियों में अटूट विश्वास था । उनकी मान्यता रही होगी कि ये शक्तियां चेतन हैं और उनकी स्तुति से स्वस्थ तथा सफल जीवन की प्राप्ति संभव है । रोगमुक्त शतायु जीवन की कामना के साथ इनकी प्रार्थना संबंधी मंत्र अथर्ववेद एवं यजुर्वेद में मैं पढ़ चुका हूं । दोनों ही वेदों में तत्संबंधी मंत्र ‘पश्येम शरदः शतम्’ से आरंभ होते हैं । इनका जिक्र मैं पहले कभी कर चुका हूं । (देखें क्रमशः 2 मार्च 2010 एवं 19 जून 2010 की ब्लाग-प्रविष्टियां ।)

ऋग्वेद में भी उपर्युक्त आाशय वाली दो ऋचाओं से मेरा साक्षात्कार हाल में हुआ । इस स्थल पर मैं उन्हीं का उल्लेख कर रहा हूं । पहली ऋचा है

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥

(ऋग्वेद मंडल 1, सूक्त 89, मंत्र 8)

(भद्रम् कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रम् पश्येम अक्षभिः यजत्राः स्थिरैः अङ्गैः तुष्टुवांसः तनूभिः वि-अशेम देव-हितम् यत् आयुः ।)

भावार्थ: हे देववृंद, हम अपने कानों से कल्याणमय वचन सुनें । जो याज्ञिक अनुष्ठानों के योग्य हैं (यजत्राः) ऐसे हे देवो, हम अपनी आंखों से मंगलमय घटित होते देखें । नीरोग इंद्रियों एवं स्वस्थ देह के माध्यम से आपकी स्तुति करते हुए (तुष्टुवांसः) हम प्रजापति ब्रह्मा द्वारा हमारे हितार्थ (देवहितं) सौ वर्ष अथवा उससे भी अधिक जो आयु नियत कर रखी है उसे प्राप्त करें (व्यशेम) । तात्पर्य है कि हमारे शरीर के सभी अंग और इंद्रियां स्वस्थ एवं क्रियाशील बने रहें और हम सौ या उससे अधिक लंबी आयु पावें ।

और अनुक्रम में दूसरी ऋचा है

शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्र नश्चक्र जरसं तनूनाम् ।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥

(यथा उपर्युल्लिखित, मंत्र 9)

(शतम् इत् नु शरदः अन्ति देवाः यत्र नः चक्र जरसम् तनूनाम् पुत्रासः यत्र पितरः भवन्ति मा नः मध्या रीरिषत आयुः गन्तोः ।)

भावार्थ: हे देवो, मनुष्य की आयु की सम्यक् समाप्ति सौ वर्ष (शरदः) की नियत की गयी है, जिसमें वृद्धावस्था (जरसं) की व्यवस्था की है (चक्र) और जिसमें हमारे पुत्र (पुत्रासः) स्वयं पिता बन सकें, अर्थात् हम पौत्रवान् बन जावें । ऐसे उस पूर्ण आयु की अंतकाल (अन्ति) से पहले बीच के काल में ही हमारी हिंसा न करें, यानी हमें क्षति न पहुंचाएं (रीरिषत), हमें क्षीणकाय न बनावें ।

उपर्युक्त भावार्थ मैंने ऋग्वेद के सायणभाष्य के आधार पर प्रस्तुत किया है, जैसा मैं उसे समझ पाया, ग्रहण कर सका । शब्दों का चयन और भावाभिव्यक्ति कदाचित् स्तरीय न हो, किंतु उसे सामान्य भाषा में लिखने का मैंने प्रयास किया है । दूसरी ऋचा के ‘पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति’ का अर्थ विकल्पतः ऐसा भी दिया गया हैः ‘जिस अवस्था में हमारे पुत्र पितर बन जावें’ । पितर (संस्कृत में पिता = पितृ का बहुवचन) का अर्थ होता है पालन करने वाला । चूंकि संतान का पालन सामान्यतः जन्मदाता ही करता है, अतः रुढ़ि अर्थ में उसी को पिता कहा है । प्रचलित सामाजिक व्यवस्था में पुत्र ही वृद्ध जन्मदाताओं का पालन करते हैं, अतः उस अर्थ में वे अपने पिताओं के पितर हो जाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

संस्कृत छंदों के उल्लेख करने में त्रुटियां – एक दृष्टांत: “मंगलम् भगवान …”

हिंदू परिवारों के धार्मिक कर्मकांडों के निमंत्रणपत्रों पर अक्सर देव-वंदना के छंद मुद्रित देखने को मिलते हैं । कम से कम उत्तर भारतीयों में तो यह परंपरा प्रचलित है ही । चूंकि शुभकार्यों का आरंभ गणेश-पूजन से होता है, अतः गणेश-वंदना के छंदों का प्रयोग सर्वाधिक मिलता है । कतिपय छंदों के उल्लेख के साथ इस विषय की चर्चा मैंने अपने हाल के ब्लाग-प्रविष्टियों (क्लिक करें) में की है । मुझे मिलने वाले निमंत्रणपत्रों पर यदाकदा विष्णु-वंदना के श्लोक भी पढ़ने को मिलते हैं । एक श्लोक, जिसका उल्लेख संभवतः सर्वाधिक किया जाता है, को इस लेख के आंरभ में चित्र में दिया गया है, जिसे मैंने किसी निमंत्रणपत्र से ही स्कैन किया है । मैं इसको दुबारा सामान्य पाठ के रूप में यथावत् (प्रस्तुत चित्र में जैसा है) आगे लिख रहा हूं:

मंगलम् भगवान विष्णुः, मंगलम् गरूणध्वजः ।

मंगलम् पुण्डरी काक्षः, मंगलाय तनो हरिः ॥

इस स्थल पर मेरा मुख्य उद्येश्य इस छंद की व्याख्या करना अथवा इसकी उपयोगिता/अर्थवत्ता स्पष्ट करना नहीं है । मैं यह बताना चाहता हूं कि कई बार लोग संस्कृत मंत्रों/छंदों का दोषपूर्ण पाठ लिखते हैं और वैसा ही दोषपूर्ण उच्चारण करते हैं । आगे कुछ कहूं इसके पहले इस श्लोक को लिखने में कौन-कौन-सी त्रुटियां मेरी दृष्टि में आई हैं उन्हें बता दूं । एक त्रुटि तो यह है कि गरुण शब्द के बदले गरुड होना चाहिए । इसे मैं टाइप करने में गलती मान लेता हूं । इसके अतिरिक्त मैं दो प्रकार की त्रुटियां देखता हूं: पहले वे जो गंभीर हैं और अर्थ का अनर्थ कर सकती हैं, या श्लोक को निरर्थक बना देती हैं । दूसरे वे जो संस्कृत के छंदों को लिपिबद्ध करने के नियमों अथवा परंपराओं के अनुसार नहीं हैं ।

पहले प्रकार के दोष स्पष्ट कर दूं । उक्त श्लोक के तीसरे चरण में ‘पुण्डरी काक्षः’ लिख गया है । ऐसा लगता है कि मानो ‘पुण्डरी’ एवं ‘काक्षः’ दो शब्द हैं । क्या अर्थ हैं इन शब्दों के ? सही शब्द (वस्तुतः पदबंध) ‘पुण्डरीकाक्षः’ है, जो दरअसल दो शब्दों के संयोग और संधि (दीर्घसंधि) से बना है:

पुण्डरीकाक्षः = पुण्डरीक+अक्षः

‘पुण्डरीक’ का अर्थ है ‘श्वेत कमल’ और अक्ष का अर्थ है इंद्रिय; यह बहुधा नेत्र के अर्थ में प्रयुक्त होता है । बहुब्रीहि समास के अंतर्गत रचे गये इस संयुक्त शब्द का अर्थ है ‘श्वेत कमल के समान नेत्र वाला’ । संस्कृत साहित्य में उपमा देने के अपने तरीके हैं । कमलनयन या कमलनेत्र जैसे शब्दों का प्रयोग सौंदर्य-वर्णन में आम रहा है । वही यहां पर किया गया है । लेकिन अगर आप ‘पुण्डरी काक्षः’ लिखते हैं, तो ये शब्द अर्थहीन हो जाते हैं ।

दूसरा दोष है ‘मंगलाय तनो’ में । यह शब्द भी वस्तुतः एक सामासिक संयुक्त पदबंध है । वस्तुतः यह ‘मंगलायतनः’ है जिसका ‘नः’ संधि के नियमों के तहत श्लोक में आगे ‘हरिः’ शब्द की मौजूदगी के कारण ‘नो’ लिखा जाता है । अतः ‘नो’ लिखा जाना तो सही है, किंतु इसे दो हिस्सों में तोड़ कर नहीं लिखा जा सकता है । कहने का अर्थ यह है कि ‘मंगलायतनो’ के स्थान पर ‘मंगलाय’ + ‘तनो’ लिखने पर उसका वांछित अर्थ समाप्त हो जाता है । अगर इसे टुकड़ों में लिखा ही जाना हो (जिसकी श्लोक-लेखन में अनुमति नहीं) तब इसे ‘मंगल आयतनो’ लिखा जा सकता था । वास्तव में

मंगलायतनः = मंगल+आयतनः

मंगल का अर्थ है शुभ फल और आयतन का अर्थ है आश्रय, शरणस्थली अथवा रहने का स्थान, आदि । अतः ‘मंगलायतनः’ का तात्पर्य है शुभ फलों का घर, भंडार या प्राप्तिस्थल

अब मैं उक्त श्लोक में विद्यमान उन त्रुटियों की ओर इशारा करता हूं जो श्लोक के अर्थ को प्रभावित तो नहीं करते, परंतु संस्कृत छंदों के लेखन में प्रचलित नियमों के अनुरूप नहीं हैं । संस्कृत के ज्ञाता इस प्रकार की त्रुटियों से बचने का प्रयास अवश्य करते होंगे । मेरी नजर में आई त्रुटियां ये हैं:

1. श्लोक में सर्वत्र ‘मंगल’ के स्थान पर ‘मङ्गल’ लिखा जाना चाहिए । संस्कृत में किसी शब्द के अंतर्गत वर्णमाला के कवर्ग से पवर्ग तक के वर्णों (अर्थात् ‘क’ से ‘म’ तक के वर्ण) के पूर्व अनुस्वार नहीं लिखा जाता है, बल्कि उसके स्थान पर संबंधित वर्ग का पांचवां वर्ण लिखा जाता है, जैसे कङ्कण (कड़ा या चूड़ी), कञ्चन (स्वर्ण), कण्टक (कांटा), कन्दर (गुफा), कम्पन (कांपना), आदि । शब्दों के अंतर्गत अनुस्वार का प्रयोग य से ह तक के वर्णों के पूर्व किया जाता है, यथा कंस, दंश, संयम, आदि ।

2. यद्यपि ‘मङ्गलम्’ स्वयं में सही है और गद्य में इसे लिखा भी जाता है, किंतु संस्कृत व्याकरण के संधि के नियमों के अनुसार उक्त श्लोक में इसे ‘मङ्गलं’ लिखा जाना चाहिए । नियम यह है कि यदि छंदों के किसी पद के अंत में ‘म्’ हो और उसके पश्चात् व्यंजन से आरंभ होने वाला पद हो तो ‘म्’ को अनुस्वार लिख जाना चाहिए । और यदि इसके पश्चात् स्वर वर्ण हो तो ‘म्’ ही लिखा जाना चाहिए । ध्यान दें कि उक्त श्लोक में ‘म्’ के आगे तीनों स्थलों पर क्रमशः ‘भ’, ‘ग’, एवं ‘पु’ (व्यंजन) विद्यमान हैं ।

3. संस्कृत में ‘भगवान्’ (हलंत ‘न’) शब्द है न कि ‘भगवान’ । यह संज्ञाशब्द ‘भगवत्’ का प्रथमा विभक्ति (कर्ता कारक, nominative case) का एकबचन में विभक्ति रूप है । अतः श्लोक में यही लिखा होना चाहिए ।

4. अंत में यह भी बताना भी आवश्यक है कि संस्कृत में विरामचिह्न कॉमा के प्रयोग की परंपरा नहीं है । अब कुछ लोग उसका प्रयोग करने लगे हैं । स्पष्टता के लिए गद्य-लेखन में इसका प्रयोग अब होने लगा है । लेकिन प्राचीन रचनाओं की मौलिकता को यथासंभव बनाए रखा जाना चाहिए । तदनुसार उक्त श्लोक में इसका प्रयोग न करना समीचीन होगा ।

ये चार त्रुटियां गंभीर नहीं हैं, किंतु छंद की शुद्धता के लिए इनसे बचा जाना चाहिए । किंतु पहले जिन त्रुटियों की बात की है, वे निःसंदेह गंभीर एवं अक्षम्य हैं । इन बातों को ध्यान में रखते हुए श्लोक यों लिखा जाना चाहिए:

मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरूडध्वजः ।

मङ्गलं पुण्डरीकाक्षः मंगलायतनो हरिः ॥

(भगवान् विष्णु मंगल हैं, गरुड वाहन वाले मंगल हैं, कमल के समान नेत्र वाले मंगल हैं, हरि मंगल के भंडार हैं । मंगल अर्थात् जो मंगलमय हैं, शुभ हैं, कल्याणप्रद हैं,  जैसे समझ लें ।)

अपनी बात समाप्त करने से पहले एक टिप्पणी करनी है । लोगों का संस्कृत-ज्ञान आम तौर पर शून्य या कम रहता है । ज्ञान न होना कोई अनुचित बात नहीं है । किंतु जब किसी अवसर पर संस्कृत का प्रयोग किया जा रहा हो तो इतना जानने की उत्कंठा तो होनी ही चाहिए कि लिखित पाठ का अर्थ क्या है और वह शुद्ध लिखा जा रहा है कि नहीं । मुझे लगता है कि लोग इस मामले में लापरवाह होते हैं । अधिक चिंताजनक पक्ष यह है कि पुरोहितगण भी इन बातों पर गौर नहीं करते है । मुझे तो इस बात की शंका रहती है कि उन लोगों को संस्कृत का समुचित ज्ञान होता भी है कि नहीं । बहुत संभव है कि उनमें से अधिकतर रट-रटाकर और स्थापित पुरोहितों की नकल करके इस कार्य में जुटते हैं । अवश्य ही सही सीखने में मेहनत तथा वक्त लगते हैं, कोई सीखा-सिखासा पैदा नहीं होता है । फिर भी उस दिशा में आगे बढ़ने का विचार तो मन में उठना ही चाहिए । – योगेन्द्र जोशी

गणेश वंदना (भाग 3) – ‘गजाननं भूतगणाधिसेवितम् …’ तथा अन्य छंद

पिछली दो पोस्टों, दिनांकित 8-2-2011 एवं 13-2-2011, क्रमशः, में मैंने इस बात का उल्लेख किया था कि अनेक हिंदू परिवार कार्यों के शुभारंभ के समय गणेश अर्चना करते हैं । प्रार्थना के तत्संबंधित छंद प्रायः वैवाहिक निमंत्रण-पत्रों तथा अन्य स्थलों पर अंकित देखने को मिलते हैं । मैंने कुछएक छंदों को उक्त पोस्टों में उद्धृत था । उसी प्रसंग में चार अतिरिक्त छंदों का उल्लेख मैं अधोलिखित पाठ में कर रहा हूं:

अभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः ।

सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥

(अभिप्रेत-अर्थ-सिद्धि-अर्थम् पूजितः यः सुर-असुरैः सर्व-विघ्न-च्छिदे तस्मै गण-अधिपतये नमः ।)

मन से विचारित (मनोवांछित) कार्य की सफलता के निमित्त जिन गणेशजी का पूजन सुरों (देवताओं) एवं असुरों (राक्षसों) के द्वारा किया जाता है, सभी विघ्नों के छेदन करने वाले उन विघ्न-विनाशक गणाधिपति (गणेश) देव के प्रति मैं नमन करता हूं । गणेश (= गण+ईश) को भगवान् शिव के गणों (अनुचरों) का अधिपति या स्वामी कहा जाता है ।

स जयति सिन्धुरवदनो देवो यत्पादपङ्कजस्मरणम् ।

वासरमणिरिव तमसां राशीन्नाशयति विघ्नानाम् ॥

(सः जयति सिन्धुर-वदनः देवः यत्-पाद-पङ्कज-स्मरणम् वासर-मणिः-इव तमसाम् राशीन् नाशयति विघ्नानाम् ।)

जिस प्रकार सूर्य अंधकार को दूर भगाता है वैसे ही जिसके चरण-कमलों का स्मरण विघ्नों के समूह का नाश करता है, हाथी के मुख वाले ऐसे देव (गणेश) की जय हो । वासरमणि का अर्थ वस्तुतः क्या है यह मुझे नहीं मालूम, किंतु मैंने इसका अर्थ दिन की मणि अथवा सूर्य माना है । सिंधुर = हाथी, वदन = मुख ।

गजाननं भूतगणाधिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् ।

उमासुतं शोकविनाशकारकम् नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम् ॥

(गज-आननम् भूत-गण-अधिसेवितम् कपित्थ-जम्बू-फल-चारु-भक्षणम् उमा-सुतम् शोक-विनाश-कारकम् नमामि विघ्नेश्वर-पाद-पङ्कजम् ।)

हाथी के मुख वाले, भूत-गणों के द्वारा सेवित, कैथ एवं जामुन का चाव से भक्षण करने वाले, शोक (दुःख या कष्ट) के नाशकर्ता, उमा-पुत्र का मैं नमन करता हूं, विघ्नों के नियंता श्री गणेश के चरण-कमलों के प्रति मेरा प्रणमन । भूतगण = भगवान् शिव के अनुचर । गणेश को मोदकप्रिय (लड्डुओं के शौकीन) तो कहा ही जाता है, इस श्लोक से प्रतीत होता है कि उन्हें कैथ तथा जामुन के फल भी प्रिय हैं ।

यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोः यतः सम्पदो भक्तसन्तोषिकाः स्युः ।

यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

(यतः बुद्धिः-अज्ञान-नाशः मुमुक्षोः यतः सम्पदः भक्त-सन्तोषिकाः स्युः यतः विघ्न-नाशः यतः कार्य-सिद्धिः सदा तम् गणेशम् नमामः भजामः ।)

जिनकी कृपा से मोक्ष की इच्छा रखने वालों की अज्ञानमय बुद्धि का नाश होता है, जिनसे भक्तों को संतोष पहुंचाने वाली संपदाएं प्राप्त होती हैं, जिनसे विघ्न-बाधाएं दूर हो जाती हैं और कार्य में सफलता मिलती है, ऐसे गणेश जी का हम सदैव नमन करते हैं, उनका भजन करते हैं ।

गणेश-स्तुति के अनेकों छंद धार्मिक पुस्तकों में उपलब्ध हैं, किंतु मैंने उनमें से आठ-दस का चयन कर इस तथा इसके पूर्ववर्ती दो आलेखों में प्रस्तुत किये हैं । ये मुझे समझने में अपेक्षया सुबोध लगे । ये छंद कदाचित् अधिक प्रचलित भी हैं । – योगेन्द्र जोशी

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