मैं

मेरी उम्र लगभग उतनी ही है जितनी अपने देश इंडिया, दैट इज़ भारत, की स्वतन्त्रता की । देश के हिमालयीय राज्य उत्तराखंड के सूदूर क्षेत्र में मेरा जन्म उस काल में हुआ जब वहां दूर-दूर तक कोई मोटर मार्ग नहीं था । बिजली, टेलीफ़ोन और रेडिओ जैसी चीजों का नाम भर बड़ों के मुख से बच्चे सुना करते थे | रेलगाड़ी देखना किसी बिरले के ही नसीब में तब हुआ करता था । अपने छोटे-से गांव से प्राथमिक शिक्षा की शुरुआत के साथ जीवन की जो उबड़-खाबड़ यात्रा आरम्भ हुयी सो वाराणसी में गंगा किनारे अवस्थित देश के अग्रणी विश्वविद्यलय (काशी हिंदू विश्वविद्यालय, बी.एच.यू) पर आ पहुंची, तीन दशक से भी अधिक के एक लम्बे ठहराव के लिये । अब यहां से कब और कहां की यात्रा होगी अभी स्पष्ट नहीं है । मैं विश्वविद्यालय में भौतिकी (फ़िजिक्स) के अध्यापक के तौर पर कार्यरत रहा और अपने व्यावसायिक दायित्यों के अनुरूप देश-विदेश के अनुभव लेने का अवसर मुझे मिलता रहा । किन्तु अपनी षष्ठिपूर्ति के निकट पहुंचते-पहुंचते अपने व्यावसायिक जीवन से मन भर गया, या यूं कहिये कि मन उचट गया, और मैं समय पूर्व सेवानिवृत्ति लेकर स्वयं के छोटे-से संसार में सिमट गया, प्रायः सबसे विलग होकर । और उसी के साथ छूट गया मेरा भौतिकी तथा गणित जैसे कभी अपने प्रिय रह चुके विषयों से चार दशकों का संबंध । पर अपने इन विषयों के अध्ययन-अध्यापन के समय के तार्किक चिन्तन-पद्धति से खुद को अभी तक मुक्त नहीं कर पाया हूं । मेरा आज का समग्र चिन्तन आदि बहुत कुछ या सब कुछ उसी तार्किक विधि के अनुरूप है । तर्कपरक अपनी सोच ने मुझे मानवीय कार्यव्यापार में व्याप्त विसंगतियों के प्रति संवेदनशील बना दिया । यहां तथा अन्यत्र प्रस्तुत मेरे लेखन में उस तर्क की छाप न्यूनाधिक अवश्य रहेगी । आज मेरे परिचित एवं मित्र पूछते हैं कि मैं अब क्या करता हूं । उत्तर है कुछ भी नहीं, और बहुत कुछ भी । बता पाना कठिन है । बहरहाल अपनी दुनिया तक सिमट कर समय-यापन करने का चैन मुझे जरूर है । – योगेन्द्र जोशी

26 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. bharateeya
    नवम्बर 08, 2009 @ 00:12:37

    I came across your blog only today. I like it very much. I will visit again.
    This blog has a unique identity.

    Thanks for your hard work. I am sure you must be enjoying sharing your knowledge with others.

    shankara
    hinduebooks.blogspot.com

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  2. दिनेशराय द्विवेदी
    जनवरी 12, 2010 @ 17:47:30

    योगेन्द्र जी आप का हिंदी ब्लागजगत में स्वागत है। आप जैसे मनीषियों की यहाँ बहुत आवश्यकता है। मैं बरसों से कहता हूँ कि हमारे विश्वविद्यालयों में सब से बड़ा खोट यह है कि यहाँ दर्शन और भोतिकी साथ साथ नहीं पढ़ी जा सकती। आप का ब्लाग पर आना शायद इस कमी को पूरा कर सके।

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  3. aniruddha pande
    फरवरी 20, 2010 @ 16:32:41

    yogendra ji aap aise hi likhte rahe

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  4. mukesh
    फरवरी 23, 2010 @ 12:44:50

    Aap ko mera pranam. aap ke hindi blog padkar mujhe bahut prasannata hui hai. aaap ke baaare me aur janne aur milne ki iccha hai.

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  5. अजय कुलश्रेष्ठ
    सितम्बर 28, 2010 @ 23:23:58

    मैं आपके भाषा-ज्ञान से प्रभावित हूँ. कृपया मेरे जाल-स्थल को भी देखें. हमारे कुछ चिन्त्य विषयों में भारी समानता है. धन्यवाद.

    अजय कुलश्रेष्ठ

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  6. Anand G.Sharma
    नवम्बर 11, 2010 @ 10:10:47

    आपका ब्लॉग “विचार संकलन” आपकी तर्कसंगत सोच एवं उत्कृष्ट अभिव्यक्ति का दर्पण है |
    विचार साम्यता के कारण मन बारम्बार साधुवाद के लिए प्रेरित कर रहा है – पुनः मेरा प्रणाम स्वीकार करें |
    मेरा विश्वास है कि जब तक भारत का जन मानस मिथ्या एवं कपोल कल्पित अवधारणाओं एवं अंधविश्वासों की स्वनिर्मित श्रृंखलाओं से बंधनमुक्त नहीं होगा – एवं तद्पश्चात तर्क संगत एवं व्यावहारिक ज्ञान की दिशा में अग्रसर नहीं होगा – तब तक विदेशी आक्रान्ताओं एवं उनके स्थानीय – चरणचुम्बी – चरणोदक सेवी – चाटुकार भृत्यों से – सेवकों से – तथाकथित हुक्मरानों से कभी भी मुक्त नहीं हो सकेगा |
    मानसिक मुक्ति हुए बिना वाह्य मुक्ति असंभव है |
    “कोऊ नृप होऊ हमें का हानि” की विकृत एवं स्वघाती मानसिकता की सघन एवं सुदृढ़ जड़ें भारतीय जन मानस में व्याप्त हैं – जिनका चाणक्य के द्वारा निर्देशित – समूल नाश के उदाहरण द्वारा – विद्वान् पाठकों के सतत प्रयास से ही सम्भव है |
    आशा है कि आपके इस विचार यज्ञ को विद्वान् पाठक गण सुगंध की भांति चतुर्दिक प्रचारित एवं प्रसारित करने का सत्य प्रयास करेंगे |
    मैंने भी एक दशक पहले “यदा यदा धर्मस्य …….” पर अपनी शंका प्रकट करते हुए अंग्रेजी भाषा में लघु लेख लिखा था |
    यदि आपकी आज्ञा हो तो त्रुटी निवारण एवं अपने विचारों के परिमार्जन हेतु आपको ईमेल द्वारा प्रेषित करूँ |
    मेरे ईमेल : anandgsharma@gmail.com है – जिस पर आप अपनी आज्ञा ईमेल द्वारा प्रेषित कर सकते हैं |

    प्रतिक्रिया

  7. RAKESH MEHRA JYOTISH MAHARAT
    जून 30, 2011 @ 16:35:16

    DEAR YOGINDER JOSHI JI [APP BE EK STAR HA. ]
    APP KE SAMMAN MAY
    HUM SITRO KE DUNIYA MAY RAHTEY HA.
    SITARAY HAMAREY SATHI HA.
    RUTH JATHEY HA. JAB KABI YHA SATHI HUM SE .
    HUM DUNIYA MAY AKELAY RAH JATEY HA.
    ROSHNI SITARO SE PA KAR JO CHAMAK JATEY HA.
    WO HI ES DUNIYA MAY YOGINDER JOSHI JASEY STAR KEHLATEY HA.
    FROM: RAKESH MEHRA JYOTISH MAHARAT
    www. rakeshmehrajyotishmaharat.co.cc
    9213817117

    प्रतिक्रिया

  8. RAKESH MEHRA JYOTISH MAHARAT
    जुलाई 02, 2011 @ 09:04:00

    YOGINDER JI NAMSKAR: AYO HUM SAB GYAN KE GANGA BAHA KAR SANSAR SE JHOOT KO SAMAPAT KARNAY KE KOSIS KARE. AJJ YHA SANSAR JHOOT KA GODOWN BANTA JA RAHA HA……. JHOOT… JHOOT.. EK SLOGAN .[ CHORD GYA HA.WO DHAKO YHA SANSAR ANSHU WO NAHI ANSHU TUM SAB BHATEY HO. KHUSH HA SAYAD WO YHA SE JA KAR KYOKI US KA JHOOT SE PICHA CHUT GYA. JAB-JAB YHA INSHAN JAL HI JIVAN HA.KE GAGAR BARNAY KAY BHAJAYE JHOOT KE GAGAR BARTHA REHTA HA. PAPO KO APNAY US GAGAR MAY BHAR KAY KAI GHOL WO GHOLTHA HA. PATHA NA CHLAY KISI KO ESLIYE GAGAR MAY CHUP KAR WO APNAY JHOOTAY KARRMO KE MATI KO DHOTHA. HA. SUKH KO YHA EKTHA KARTEY- KARTEY DUKHO KAY DAYR PER SOTHA HA.]
    FROM: RAKESH MEHRA JYOTISH MAHARAT [ SPALLING MISTAKE VA VERB MISTAKE KAY LIYE SHAMA KARYE

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  9. Gopi Krishan Garhwal
    मार्च 12, 2012 @ 04:03:10

    आपके लेखन और तार्किक शक्ति ने बहुत प्रभावित किया, मै निरंतर आपके इस चिट्ठे को पढने का प्रयास करूँगा, आपकी बातें तर्क सम्मत है और आपकी लेखन शैली आकर्षक है और आपका दर्शन अद्भुत है.

    प्रतिक्रिया

  10. anuj jain
    सितम्बर 06, 2012 @ 14:05:32

    yogendra ji aape bahut acha likha h. m aape lekh se pravabit hua hu. or m aap se judna chahata hu. mere ko v likhne ka bahut sokh h magar mene public m nhi diya h ab apse prarit hokar kuch karne ki himmat jagi h. muje bahut kushi h is india m aap jase log h.

    प्रतिक्रिया

  11. p.umesh badola
    दिसम्बर 28, 2012 @ 18:40:49

    ayogendra ji atee sundar aapne likha he.or yh jankar atee khusi hue ki aap dev-bhumi uttrakhand se ho

    प्रतिक्रिया

  12. Mukesh Mittal
    फरवरी 24, 2013 @ 23:39:04

    kuchh naya hai

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  13. swamishishuvidehananda sarswti tiwarimaharaj karanjalad datt.maharashtra.
    मई 19, 2013 @ 06:27:15

    AKDAM..SHI KAHA APNE…”VAN_SANRAKSHN.”KA KARY..”SARKAR..”NHI”HAM..AAM..JANTA..HI KAR SKTI HAI….

    प्रतिक्रिया

  14. Anupam
    जून 23, 2013 @ 00:17:37

    आपके ब्लॉग से आज ही परिचय हुआ। दरअसल मैं गूगल पर ययाति, शर्मिष्ठा और देवयानी नक्षत्रों के विषय में खोज रहा था और आपका ब्लॉग मिला। आपके बारे में पढ़ा तो और भी प्रेरित हुआ। विभिन्न विषयों पर आपका लेखन सरहनीय है। एक बात और नोट किया करता हूँ की भारत में लगभग सभी भौतिक विज्ञानों के वैज्ञानिक शिक्षक आदि अंततः आध्यात्म की ओर मुड़ जाते हैं। शायद कारण वही ययाति की शिक्षाएँ हैं।

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  15. lmtiwari29
    अगस्त 05, 2013 @ 10:16:54

    जोशीजी, क्रिपया मैदान में आ जाइए। आज भारत में अच्छाई और बुराई के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है।
    आपका ग्यान और आपका दर्शन देश के अत्यन्त काम का है।

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  16. दिलीप कुमार मौर्य, बरेली
    अगस्त 13, 2013 @ 12:29:17

    आध्यात्म की अतृप्त प्यास से भटकते हुए कल 12 अगस्त, 2013 को “विचार संकलन” पर पहुंचा, उम्मीद है तृप्त‍ि मिलेगी, क्योकि अभी ठहराव मिल रहा है, दर्शन मिल रहा हैा
    सादर,

    . दिलीप कुमार मौर्य, राजभाषा विभाग,NERly, इज्जतनगर, बरेली-243122.

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  17. vijay kumar pandey
    दिसम्बर 14, 2013 @ 10:12:06

    aap ko pranam, vidya dadati shalok khojate, aap ke blog par pahuch gaya. just i feel i have got every thougth and best way of life.
    dhanyavad

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  18. Jeevanlal Patel
    मार्च 01, 2014 @ 16:25:03

    जोशी साहब की बातो में जोर है. ज्ञान और शिक्षा की बात तो वो साधार कहते ही है., मनोरंजन भी होता है. मै कुछ दंड के बारे में ढूढ रहा था , यहाँ आ पहुँचा. परमात्मा से मेरी प्रार्थना है की ऐसे इ-ऋषियों ( e- ऋषि) दीर्घायु प्रदान करे. समाज का भला हो

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  19. Arun Kurhe
    जुलाई 04, 2014 @ 13:23:50

    Namaskar Joshi ji
    Apka dharma gyan ke bare mei prayash ati sundar hai
    bhahut shubh kamna

    Arun kurhe

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  20. अनुराग दीप, भारतीय विधि संस्थान, नई दिल्ली
    नवम्बर 26, 2014 @ 20:05:47

    मृत्यु दंड पर एक आलेख लिखने के क्रम में ‘दंड शास्ति प्रजा’ का स्रोत जानने की इच्छा हुई और आपका ब्लॉग मिला, आपने बहुत मेह्नत की है। मैं विधि का विद्यार्थी हूँ और विघिक स्रोतों को लैटिन, फ्रेंच आदि में ही ढूंढा जाता है, संस्कृत या अन्य स्रोत आसानी से उपलब्ध नहीं हैं. आप यह कमी पूरी कर रहे हैं, अनेक साधुवाद

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  21. bimla
    दिसम्बर 18, 2014 @ 08:47:36

    ऋग्वेद में रोग की औषधि के बारे में देखते हुए आपका ब्लॉग सामने आया अर्थों के साथ ऋचाओं को पढ़ बड़ा अच्छा लगा

    प्रतिक्रिया

  22. Sandeep Katharia
    फरवरी 21, 2015 @ 13:37:52

    i like your blog.

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  23. कप्तान सिंह
    जून 04, 2016 @ 16:44:09

    आपके द्वारा मूल पाठ, पदच्छेद, अन्वय और भाषा टीका देख कर सुखद आश्चर्य हुआ । सामान्य हिन्दी और संस्कृत जानने वाले भी सुगमता से समझ सकते हैं। इससे संस्कृत के मूल पाठ का मनमाना अर्थ / अनर्थ करने की प्रवृत्ति भी दूर होगी। आपके इस भागीरथ प्रतत्न को सादर नमन।

    प्रतिक्रिया

  24. kvananthanarayanan
    सितम्बर 16, 2016 @ 21:02:40

    a great blog… really great..

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