तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु – १

वैदिक एवं औपनिषदिक ग्रन्थों में कई मंत्र ऐसे हैं जिनमें आत्मिक उत्थान के गंभीर भाव प्रार्थनाओं के रूप में व्यक्त हैं । ऐसे छः मन्त्र (यजुष्‌) शुक्लयजुर्वेद के ३४वें अध्याय के आरम्भ में दिये गये हैं, जिनसे मैं स्वयं को विशेष तौर पर प्रभावित पाता हूं । इन सभी छः मन्त्रों के अन्तिम चरण में एक ही वाक्यांश, ’तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’, विद्यमान है । इन सभी मन्त्रों में मन के लक्षणों और विशिष्ठताओं का उल्लेख करते हुए प्रार्थना अथवा कामना की गयी है कि ’वह’ मेरा मन शान्तिमय विचारों वाला होवे ।

मैं इस स्तम्भ का आरम्भ इसी सूक्त से आरंभ कर रहा हूं ।  इन मन्त्रों में पहला यह है:-

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति । दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।। (शुक्लयजुर्वेद, ३४, १)

श्रीमदुवटाचार्य एवं श्रीमन्महीधर की टीकाओं के आधार पर इस मन्त्र के जो अर्थ मेरी समझ मैं आया है मैं उसका उल्लेख कर रहा हूं । मन्त्र कहता है कि जो मानव मन व्यक्ति के जाग्रत अवस्था में दूर तक चला जाता है और वही सुप्तावस्था में वैसे ही लौट आता है, जो दूर तक जाने की सामर्थ्य रखता है और सभी ज्योतिर्मयों की भी ज्योति है, वैसा मेरा मन शान्त, शुभ तथा कल्याणप्रद विचारों का होवे ।

स्पष्ट है कि मन के गमनागन की बात भौतिक पदार्थमूलक धरातल पर हो रही है ऐसा मन्त्रदृष्टा ऋषि का मन्तव्य नहीं है । मन का संचरण वैचारिक संसार में होता है और वह उस संसार में क्षण भर में ही कहां से कहां चला जाता है । यहां पर ज्योतिर्मय का अर्थ ज्ञानेन्द्रियों (पांच) से है, जो बाह्य भौतिक जगत् से विशिष्ट ज्ञान (विज्ञान) बटोर के मनुष्य को प्रदान करते हैं । ज्ञान के वाहक होने के कारण इन्हें ज्योति कहा गया है । इनके अभाव में हमें इन्द्रियसंबंधित समुचित ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है, अतः ये उस विशेष अर्थ में वस्तुओं को प्रकाशित करते हैं या उनके अस्तित्व का आभास कराते हैं । लेकिन यह सब तभी संभव और सार्थक है जब मन उनके ऊपर ज्ञानग्राहक के रूप में उपस्थित हो । यह मन उनका भी प्रकाशक है, ज्ञान के संग्रहण को दिशा देता है, आदि । ऐसा यह मन शिवसंकल्पवान् होवे । अन्य पांच मन्त्रों की चर्चा निकट भविष्य में ।

भारतीय संस्कृत साहित्य में यह परंपरा रही है कि काव्य तथा अन्य रचनाओं के आरंभ में गणेश या सरस्वती वन्दना के शब्द लिखे जाते हैं या किसी अन्य रूप में मंलाचरण प्रस्तुत किया जाता है । कुछ उसी अन्दाज में इन मन्त्रों का मैं उल्लेख कर रहा हूं कि ’तन्मे …’ । मेरा उद्येश्य इस जैसे अन्य अनेकों मन्त्रों, जो संस्कृत साहित्य में भरे पडे़ हैं, की चर्चा एवं व्याख्या करना नहीं है । न ही ऐसा कर पाना मेरी सामर्थ्य में है । मेरा तो इरादा भौतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक जीवन के विविध पहलुओं से संबद्ध जो विचार मन में समय-समय पर आते रहते हैं उनको अभिव्यक्ति देना है । और उसी प्रक्रिया मैं कभी-कभार उक्त मन्त्र की भांति अन्य का भी उल्लेख किया जा सकता है । – योगेन्द्र

2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. pradeep manoria
    सितम्बर 29, 2008 @ 22:20:12

    योगेन्द्र जी आप लिखना प्रारंभ करें मैं कोशिश करूंगा उन पर लिखने की
    आपका स्वागत है

    प्रतिक्रिया

  2. Kiran Bhatia
    नवम्बर 10, 2014 @ 21:46:33

    बहुत ही स्तुत्य प्रयास है आपका . साधुवाद .

    प्रतिक्रिया

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