पञ्चतन्त्र नीतिवचन: आसन्नमेव नृपतिर्भजते …

पञ्चतन्त्र की कथाएं सुविख्यात हैं । इसकी अधिकतर कथाओं में कथाकार विष्णुदत्त शर्मा ने पशुपात्रों को शामिल किया है और उन्हीं के मुख से नीति-विषयक बहुत-सी बातें कहलवायी हैं, जो वस्तुतः मानव समाज के लिए ही अर्थपूर्ण हैं । इन कथाओं में एक स्थल पर इस श्लोक का उल्लेख हैः

आसन्नमेव नृपतिर्भजते मनुष्यं विद्याविहीनमकुलीनमसंस्कृतं वा ।
प्रायेण भूमिपतयः प्रमदा लताश्च यत्पार्श्वतो भवति तत्परिवेष्टयन्ति ।।

(पञ्चतन्त्र, प्रथम तन्त्र, 36)

इस श्लोक के अर्थ कुछ यूं दिये जा सकते है: राजा अपने निकटस्थ मनुष्य को ही महत्त्व देता है, भले ही वह विद्याविहीन हो, कुलीन न हो, अथवा सुसंस्कृत न हो । प्रायः होता यह है कि राजा, स्त्री एवं लता अपने निकट जो होता है उसी का परिवेष्टन करते हैं (यानी उसी से लिपटते या उसका आश्रय लेते हैं) ।

कुलीन का शाब्दिक अर्थ होता है अच्छे कुल में उत्पन्न हुआ व्यक्ति । पर व्यापक अर्थ में उस व्यक्ति को कुलीन कहा जायेगा जिसमें श्रेष्ठ गुण हों, अच्छे संस्कार पड़े हों । सुसंस्कृत वह व्यक्ति है जो शिष्ट व्यवहार करे, जो अपने मतभेद को भी रोषपूर्ण शब्दों में व्यक्त न करे और दूसरों के प्रति आदरभाव रखे ।

आज के युग में राजा का मतलब उस व्यक्ति से है जो किसी व्यवस्था के शीर्ष पर हो । ऐसा व्यक्ति जिन लोगों से घिरा रहता है उन्हीं की सुनता है, उनकी योग्यता का समुचित मूल्यांकन किये बिना । ये लोग आम तौर पर चाटुकार होते हैं । अगर आप राजा तक पहुंच बना लें तो वह आपकी सुनेगा न कि औरों की । यह बात व्यवहार में हम सभी देखते आ रहे हैं ।

यह भी सत्य है कि वानस्पतिक लता अपने निकट के पेड़ से लिपटकर ही आगे चढ़ती है । परन्तु स्त्रियों के लिए श्लोक में कही गयी बात कितनी सटीक है कहना मुश्किल है । स्त्री को प्रमदा कहा गया है, विशेषतः तरुणी को । कदाचित् हर स्त्री के लिए प्रमदा संबोधन ठीक नहीं होगा । इस शब्द का संबंध मद से है और संभव है कि प्रमदा वह स्त्री हो जो अपने मदमाते व्यवहार से पुरुषों को अपनी ओर खींचे और तत्पश्चात् उन्हीं का आश्रय ले या उन पर निर्भर हो जाये । यूं यह भी कुछ हद तक सही है कि जिस पुरूष के संपर्क में वे आती हैं उसका स्थायी आश्रय पाने का प्रयास वे प्रायः करती हैं । – योगेन्द

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