सुभाषित: कृतघ्नता वृक्षों के प्रति

मेरे पास सुभाषितमाला नाम की एक पुस्तक है, श्री अरविंद आश्रम, पुदुच्चेरी (पूर्व में पांडिचेरी) से प्रकाशित । इसमें एक स्थल पर वृक्षों को केंद्र में रखते हुए एक सुभाषित वचन दिया गया हैः

छायां ददाति शशिचन्दनशीतलां यः सौगन्धवन्ति सुमनांसि मनोहराणि ।
स्वादूनि सुन्दरफलानि च पादपं तं छिन्दन्ति जाङ्गलजना अकृतज्ञता हा ।।

इस वचन का अर्थ कुछ इस प्रकार दिया जा सकता हैः
जो वृक्ष चंद्रकिरणों तथा चंदन के समान शीतल छाया प्रदान करता है, सुन्दर एवं मन को मोहित करने वाले पुष्पों से वातावरण सुगंधमय बना देता है, आकर्षक तथा स्वादिष्ट फलों को मानवजाति पर न्यौछावर करता है, उस वृक्ष को जंगली असभ्य लोग काट डालते हैं । अहो मनुष्य की यह कैसी कृतघ्नता (अकृतज्ञता) है ।

कविगण चंद्रमा की किरणों को शीतल बताते हैं । चंदन के लेप से शीतलता की अनुभूति होती है । पेड़ की छाया की इनसे तुलना की गयी है । विविध पेड़-पौधे आकर्षक तथा सुगंधित फूलों के लिए जाने जाते हैं, कुछ अन्य सुस्वादु फल हमें देते हैं । विडंबना यह है कि मनुष्य का विभिन्न प्रकार से उपकार करने वाले ये वृक्ष स्वयं उसकी बेरहमी का शिकार बनने हैं ।

उक्त वचन आज के युग में, जब ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की बात की जा रही हो, अत्यंत सार्थक है । – योगेन्द्र

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. sanjeev sharma
    अक्टूबर 16, 2008 @ 12:30:04

    अच्छा उद्धरण हैं। जंगल में वे ही पेड़ काटे जाते हैं जो सीधे होते हैं। टेढ़े मेढ़े की उपयोगिता नहीं होती। इसी प्रकार सज्जन दूसरों पर उपकार करने की प्रवृत्ति के कारण दुर्जनों से पीड़ा पाते हैं।

    प्रतिक्रिया

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