नीतिवचन महाभारत से – दुष्कर्म के लिए पुरुष दोषी

महाकाव्य महाभारत के शांतिपर्व के अंतर्गत मोक्षधर्म पर्व के अध्ययन से यही लगता है कि स्त्रीजाति के प्रति अन्याय सदा से होता रहा है । शारीरिक तौर पर अपेक्षया कमजोर स्त्री के साथ बलपूर्वक अथवा धोखे से दुष्कर्म करे तो भी उसकी सजा स्त्री को ही दी जाती है । क्या उसके साथ हो रहे अन्याय का विरोध सदा से ही असामान्य बात रही है ? महाभारत के उक्त स्थल पर एक कथा का जिक्र है जिसमें स्पष्ट कहा गया है पुरुष द्वारा संपन्न दुष्कर्म के लिए दोष स्त्री को देना अनुचित है । कथा इस प्रकार है:

एक बार ऋषि गौतम को यह पता चला कि उनकी धर्मपत्नी के साथ दुष्कर्म हुआ है । इस घटना के लिए अपनी पत्नी को दोषी मानते हुए उन्होंने अपने पुत्रों में से चिरकारी नाम के एक पुत्र को आदेश दिया कि वह अपनी ‘व्यभिचारिणी’ माता को मार डाले । आदेश देकर वे स्वयं वन को चले गये । कथा में यह बताया गया है कि चिरकारी का यह नाम धीमी चाल से कार्य करने के कारण पड़ा था । लोग उसको आलसी समझते थे । पर वस्तुतः वह आलसी नहीं था, बल्कि किसी कार्य को संपन्न करने से पूर्व उसके समस्त पहलुओं पर चिंतन-मनन करने में जुट जाता था और पर्याप्त सोच-विचार के पश्चात् ही वह कार्य आरंभ करता था । पिता के आदेश पर उसने अपने स्वभाव के अनुरूप तुरंत अमल नहीं किया । उसने पूरी घटना के बारे में जानकारी जुटाई और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि उसकी माता को दोषी माना जाना अनुचित है । उसके साथ तो परपुरुष ने पति के वेश में आकर छल किया और उसने आगत पुरुष को पति जानकर पत्नीधर्म के अनुकूल व्यवहार करते हुए कोई विरोध नहीं किया । अवश्य ही पिता का आदेश मानना उसका धर्म बनता है । किंतु निर्दोष माता की हत्या करना बहुत बड़ा पाप होगा यह सोचते हुए उसने पिता का आदेश न मानने का निर्णय लिया । इसी संदर्भ में उसके मन में नीति संबंधी ये विचार उठेः

एवं स्त्री न अपराध्नोति नर एव अपराध्यति ।
व्युचरंश्च महादोषं नर एव अपराध्यति ।।38।।
नापराधो९स्ति नारीणां नर एवापराध्यति ।
सर्वकार्यापराध्यत्वान्नापराध्यन्ति चाङ्नाः ।।40।।

(महाभारत, शांतिपर्व, मोक्षधर्म)

जिनका अर्थ इस प्रकार दिया जा सकता है: (मैंने दुष्कर्म की परिस्थितियों पर विचार किया) इसलिए मानता हूं कि स्त्री अपराध नहीं करती, पुरुष ही अपराध करता है । व्यभिचार में लिप्त होकर बडो पाप करने का अपराध करता है । ऐसे अवसरों पर पुरुष ही अपराधी होता है । कमजोर पड़ जाने के कारण स्त्रियां पुरुषों के समक्ष विवश हो जाती है, अतः वह नहीं, पुरुष ही अपराध को दोषी होता है ।

आज के सामाजिक परिवेश में स्त्रीजाति के प्रति अपराध आये दिन होते हैं । और उसकी सजा किसी न किसी रूप में स्त्री को ही मिलती है । समाज उसके प्रति सहानुभूति का नहीं बरन् निष्ठुरता का बर्ताव करता है । उक्त कथा यही बताती है कि प्राचीन काल में भी स्त्रियों को ही जिम्मेदार ठहराया जाता था ।

उल्लिखित कथा के उत्तरार्ध में यह भी कहा गया है ऋषि गौतम को वन से लौटते-लौटते यह पश्चाताप होने लगा कि उन्होंने अपने पुत्र को एक अनुचित आदेश दिया । घर पहुंचने पर जब उन्होंने पाया कि उनके तर्कशील चिरकारी पुत्र ने आदेश नहीं मानकर एक घोर पाप से उन्हें बचा लिया तो उन्हें महान् संतोष हुआ ।

इस कथा में ऋषिपत्नी के नाम का जिक्र नहीं है । पुराणों में यह कथा मिलती है कि ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या थीं जिनको एक बार ऋषि का रूप धरकर इंद्र ने छला था । बाद में ऋषि ने पत्नी को निर्जीव शिला बन जाने का शाप दिया था । क्या महाभारत की कथा उसी घटना का थोड़ा भिन्न वर्णन है ? मैं कह नहीं सकता ।

यह कथा यथार्थ पर कितना आधारित है यह बात उतने महत्त्व की नहीं जितना कि इसमें दिया गया संदेश । भीष्म पितामह के द्वारा युधिष्ठिर को सुनाये गये नीतिवचनों में यह कथा सम्मिलित है । – योगेन्द्र

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