श्वः कार्यमद्य…यानी काल करै सो आज… (महाभारत)

महाकाव्य महाभारत के शान्तिपर्व में पितामह भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को विविध उपदेश दिये जाने का विस्तृत वर्णन है । उन्हीं उपदेशों में अधोलिखित नीतिश्लोक का भी उल्लेख है:

श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्णिकम् ।
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वास्य न वा कृतम् ।।१३।।

(महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय २७७)

जिसका अर्थ यूं दिया जा सकता है: “जो कार्य कल किया जाना है उसे पुरुष आज ही संपन्न कर ले, और जो अपराह्न में किया जाना हो उसे पूर्वाह्न में पूरा कर ले, क्योंकि मृत्यु किसी के लिए प्रतीक्षा नहीं करती है, भले ही कार्य संपन्न कर लिया गया हो या नहीं ।” अर्थात् मृत्यु कब आ जायेगी इसका पूर्वानुमान कोई नहीं कर सकता है । कार्य संपन्न हो चुका कि नहीं इस बात का इंतजार वह नहीं करने वाली । अतः अविलंब अपने कर्तव्य पूरे कर लेने चाहिये ।

यहां उपदेष्टा का इशारा सत्कर्मों से रहा है । भारतीय मान्यता रही है कि जीवात्मा अमर है और अपने इहलोक के कर्मों के फल अन्य लोकों अथवा अन्य जन्मों में भोगने को विवश है । अतः सत्कर्मों के निष्पादन में विलंब न करने की सलाह नीतिवचन देते हैं । अन्य समाजों में भी स्वर्ग-नरक की अवधारणा तथा कर्मफलों की महत्ता किंचित् भेद के साथ स्वीकारी गयी है । क्या इसे समाज का दुर्भाग्य कहा जाये कि आधुनिक जीवन में कर्मों की गुणवत्ता के अर्थ शनैः-शनैः बेमानी होते जा रहे हैं ?

उपर्युक्त नीतिवचन ने कबीर के एक दोहे की ओर मेरा ध्यान खींचा, जिसे मैंने अपनी प्राथमिक स्तर की हिन्दी पाठ्यपुस्तकों में कभी पढ़ा था । दोहा सुविख्यात है और मेरे अनुमान से अधिकांश हिन्दीभाषियों को ज्ञात होगा । दोहा यह है:

काल करै सो आज कर, आज करै सो अब ।
पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब ।।

(जो कल करना है वह आज ही कर ले और जिसे आज किया जाना है उसे अविलंब अभी पूरा कर ले । कभी भी प्रलय का पल आ जायेगा, तब फिर वह कार्य कब कर पाओगे ?)

यह दोहा मुझे ‘कबीरवाणी – सत्य ज्ञानामृत’ (मनोज पब्लिकेशन्स, दिल्ली, २००३, पृ. १४१) में भी देखने को मिला है । इसी दोहे के साथ नीतिकथन का एक और दोहा लगभग समान अर्थ वाला भी पढ़ने को मिला जिसके शब्द यूं हैं:

काल करै सो आज कर, सबहि साथ तुव साथ ।
काल काल तू क्या करै, काल काल के हाथ ।।

(जो कल किया जाना है उसे आज कर ले, क्योंकि अभी संसाधन या कार्य के अवसर तुम्हारे साथ हैं । अभी नहीं, कल-कल की बात तू क्यों करता है, कल तो काल के हाथ में है । अर्थात् समय तुम्हारे हाथ से अवसर छीन सकता है ।)

मुझे लगता है कि यह दूसरा दोहा कदाचित् कम चर्चित है । – योगेन्द्र

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