लाङ्गूलचालनम् …: नीति वचन भर्तृहरिकृत नीतिशतकम् से

श्रीभर्तृहरि विरचित नीतिशतकम् में कुण्ठित एवं स्वाभिमानी व्यक्ति के बीच का अंतर कुत्ते और हाथी की परस्पर तुलना के माध्यम से स्पष्ट किया गया है । उक्त ग्रंथ में एक स्थल पर अधोलिखित नीति-श्लोक अंकित है:
लाङ्गूलचालनमधश्चरणावपातं भूमौ निपत्य वदनोदरदर्शनं च ।
श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुङ्गवस्तु धीरं विलोकयति चाटुशतैश्च भुङ्ते ।।

(नीतिशतकम्, 31)

जिसका भावार्थ कुछ इस प्रकार है:
भक्ष्य पदार्थ देने वाले व्यक्ति के समक्ष कुत्ता स्वयं को उपकृत तथा कृतार्थ अनुभव करने का भाव तरह-तरह से व्यक्त करता है । वह पूंछ हिलाता है, चरणों में लोटता है और जमीन पर पीठ के बल लेटकर अपना चेहरा एवं पेट दाता को दिखाता है । स्वयं को दीन-हीन प्रस्तुत करने का यह उसका तरीका है । इसके विपरीत भोजन दिये जाने पर भी हाथी गंभीर बना रहता है और सौ-सौ बार चिरौरी करने पर ही उसे ग्रहण करता है । इस प्रकार उसके हावभाव में दीनता के बदले स्वाभिमान झलकता है ।

उक्त श्लोक में हाथी और कुत्ता प्रतीकमात्र हैं । नीति वचनों में मानवेतर प्राणियों तथा निर्जीव वस्तुओं के उदाहरण के माध्यम से अपनी बात व्यक्त करने की शैली रही है । कुत्ते और हाथी के व्यवहार तो प्रकृति-प्रदत्त एवं अपेक्षया स्थायी रहते हैं । प्रतीत तो यही होता है कि वे मनुष्य की भांति चिंतनसमर्थ नहीं होते और अपने व्यवहार के निहितार्थ के प्रति सजग नहीं होते हैं । परंतु मनुष्य निर्णय लेने की सामर्थ्य रखते हैं और स्वाभिमान जैसी अवधारणाओं से परिचित ही नहीं होते, बल्कि उनके प्रति सचेत और बहुधा समर्पित भी रहते हैं ।

मनुष्यों के व्यवहार में उल्लेखनीय विविधता रहती है । एक ओर कोई मनुष्य स्वयं को समर्थ एवं संपन्न व्यक्ति के सामने दीन-हीन प्रदर्शित करते हुए उसकी श्रेष्ठता को सहज तौर पर स्वीकार लेता ह, तो दूसरी ओर अन्य व्यक्ति कष्ट और दैन्य की अवस्था में भी अपने स्वाभिमान को नहीं छोड़ता है और उसे एक याचक की तरह का आचरण मान्य नहीं होता । – योगेन्द्र

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