व्यंगोक्ति: न वृथा किञ्चिदाचरेत्

दक्षिण भारतीय नगर बेंगलुरु से ‘संस्कृतसंदेशः’ नामक एक संस्कृत पत्रिका छपती है । इसमें एक स्थाई स्तंभ ‘चाटुचणकः’ नाम से छपता है । जिसमें किंचित् रोचक, गुदगुदाने वाले तथा व्यंगात्मक श्लोक छपते हैं ।

संस्कृत शब्द ‘चाटु’ के अर्थ होते हैं मीठी-मीठी, चटपटी, प्रशंसापरक आदि प्रकार की बातें, बहुधा दूसरे को खुश करने तथा उसकी अनुकंपा पाने के लिए की गयी बातें । ‘चाटुकार’ (चापलूसी करने वाला) शब्द इसी से बना है । ‘चणक’ शब्द का अर्थ है चना । तदनुसार ‘चाटुचणक’ का अर्थ होना चाहिये ‘चटपटे चने’ । पत्रिका ने इस स्तंभ का उक्त नाम यही सोच के रखा गया होगा कि इसमें चटचटे चनों की भांति चटपटी बातें रहेंगी । शौकीन लोगों का प्रिय भोज्य ‘चाट’ संभवतः इसी शब्द पर आधारित है ।

उक्त पत्रिका के मौजूदा जनवरी अंक में इस बार यह श्लोक छपा है:
यथा जानन्ति बहवः यथा वक्षन्ति दातरि ।
तथा धर्मं चरेन्नित्यं न वृथा किञ्चिदाचरेत् ।।

लोग देखें, जानें कि अमुक व्यक्ति सत्कर्म कर रहा है (यथा जानन्ति बहवः) और दानी जनों के बीच उस बात की चर्चा चले (यथा वक्षन्ति दातरि) । धार्मिक कार्य में अवश्य ही सदैव संलग्न रहे (तथा धर्मं चरेन्नित्यं), परंतु ध्यान रखे कि व्यर्थ में कोई कार्य नहीं किया जा रहा है (न वृथा किञ्चिदाचरेत्) । ऐसा आशय ही उक्त श्लोक में निहित है ।

आम धारणा के अनुसार धर्मकर्म मृत्यु पश्चात् परलोक में सुफल मिले इस विचार से किया जाता है । परंतु कवि यहां यह स्पष्ट करता है कि ऐसे कार्य यहीं इसी लोक में सार्थक होने चाहिए । उस कार्य से भला क्या लाभ जिसका पता ही लोगों न चले, जिसके करने से प्रशंसा न मिले, और जिसकी चर्चा सर्वत्र न हो । भला परलोक की कौन जाने ! – योगेन्द्र

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