‘लोकः आचरति अहितम् ’ – भर्तृहरिकृत वैराग्यशतकम् से

राजा भर्तृहरि ने बतौर कवि के शतकत्रयम् की रचना की थी, जिसके तीन खंड हैं: नीतिशतकम्, शृंगारशतकम् एवं वैराग्यशतकम् । इन खंडों को शतक नाम से संबोधित किया तो जाता है, किंतु प्रत्येक में सौ से कुछ अधिक श्लोक हैं । मेरे पास उपलब्ध पुस्तक (चौखंबा संस्कृत सिरीज, वाराणसी) में श्लोकों की संख्या क्रमशः १०९, १०६ एवं ११३ है । अनुमान लगाया जा सकता है कि इनमें से द्वितीय ‘शतक’ की रचना उन्होंने अपने यौवन काल में की होगी और कदाचित् उसी के आगे-पीछे व्यावहारिक जीवन के अनुभव पा चुकने पर प्रथम ‘शतक’ रचा होगा । कहा जाता है कि रनिवास के किंचित् अप्रिय अनुभवों के बाद उनको ऐहिक जीवन की निरर्थकता की अनुभूति हुयी, और तब उन्होंने राजकार्य अपने छोटे भाई के सुपुर्द कर संन्यस्त जीवन अपना लिया । ग्रंथ के तीसरे शतक की रचना उन्होंने शायद उसी काल में की होगी ।

उक्त वैराग्यशतकम् में एक श्लोक है जो मुझे विशेष रूप से प्रभावी लगा । श्लोक है:
व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती
रोगाश्च शत्रव इव परिहरन्ति देहम् ।
आयुः परिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भो
लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम्
।।109।।

{जरा व्याघ्री इव परितर्जयन्ती तिष्ठति, रोगाः च शत्रवः इव देहम् परिहरन्ति, भिन्नघटात् अम्भः इव आयुः परिस्रवति, तथा अपि लोकः अहितम् आचरति इति (मम) (वि)चित्रम् (भाति) ।}

अर्थात् वृद्धावस्था बाघिन की तरह गुर्राती-सी सामने खड़ी है, शत्रुओं की भांति रोग शरीर पर प्रहार किये जा रहे हैं, दरार वाले फूटे घड़े से चू रहे पानी की तरह आयु-क्षरण हो रहा है, फिर भी यह संसार (जनसमूह) अहितकर कार्यों में संलग्न रहता है इस तथ्य का ज्ञान मेरे लिए वास्तव में विचित्र है ।

वस्तुतः औसत मनुष्य ऐहिक उपलब्धियों के प्रति इतना समर्पित है कि वह अपना समस्त समय, श्रम तथा ऊर्जा उन्हें पाने में लगा देता है । वह उसके आगे की किसी अन्य बात पर ध्यान देने का समय ही नहीं निकाल पाता है । ऐसा नहीं कि वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सदैव विवश हो । अवश्य ही कुछ दुर्भाग्यशाली लोगों का समय रोज की रोजी-रोटी के जुगाड़ में ही बीत जाता है, किंतु सभी की समस्याएं इतनी विवश करने वाली नहीं होती हैं । सच तो यह है कि आवश्यकताएं क्या हों और उनकी मर्यादा क्या हो इस पर विचार ही वे नहीं करना चाहते हैं । जैसे-जैसे उनकी एक आवश्यकता पूरी होती है उनकी चाहत एक कदम आगे बढ़ जाती है, और उनके लिए नयी आवश्यकताएं जन्म ले लेती हैं जिनकी प्राप्ति में वे जुट जाते हैं । यह सिलसिला ताउम्र चलता रहता है, कुछ अन्यथा भी करने योग्य है क्या यह प्रश्न मन में कभी आता ही नहीं । वे ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कि वे अजर-अमर बने रहेंगे । पर जीवन का कटु सच कुछ और ही है ।

स्वार्थ से परे हटकर कभी सत्कर्मों में भी संलग्न होने की सलाह कवि उक्त नीतिवचन में देता है । – योगेन्द्र

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: