संस्कृत नाट्यकृति ‘मृच्छकटिकम्’ से: दारिद्र्यम् अनन्तकं दुःखम्

संस्कृत साहित्य में ‘मृच्छकटिकम्’ नामक एक नाट्यकृति उपलब्ध है, जिसे शूद्रक द्वारा रचित बताया जाता है । शूद्रक कौन था, वह कब और कहां जन्मा था, ऐसे तमाम सवालों के उत्तरों में संस्कृत साहित्य के विद्वान एकमत नहीं हैं । कुछ लोग उन्हें राजा शूद्रक के नाम से जानते हैं तो कुछ अन्य इस नाम को छद्मनाम ही समझते हैं । शूद्रक कोई ही भी हो, सदियों पुराना यह नाटक वास्तव में काफी रोचक है और कदाचित् अपने काल की सामाजिक स्थिति का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करता है ।

नाटक चारुदत्त नामक एक सुसंपन्न ब्राह्मण की कहानी पर आधारित है,  जो अपनी   दानशीलता तथा अति उदारता के कारण निर्धनता की स्थिति में पहुंच जाता है । उसके सत्यवादिता, उदारता और मृदु व्यवहार पर एक गणिका, वसंतसेना, उसके प्रति आकर्षित होती है । इस तथ्य पर ध्यान दिया जाना चाहिये कि प्राचीन भारतीय समाज में अभिजात वर्ग से परे की कुछ स्त्रियां गणिका वृत्ति अथवा वेश्या वृत्ति अपना लिया करती थीं । इनमें से गणिकाएं अपेक्षया सम्मानित मानी जाती थीं । वे नृत्य, संगीत आदि में पारंगत होती थीं और ये ही उनकी आजीविका के आधार होते थे, जब कि वेश्याएं शारीरिक संसर्ग के लिए उपलब्ध रहती थीं । उक्त नाटक चारुदत्त तथा वसंतसेना के बीच के निःस्वार्थ तथा निश्छल प्रेम पर ही केंद्रित है । रसशास्त्र की दृष्टि से भी नाटक संपन्न तथा अद्वितीय है । इसमें हास्य, शृंगार तथा करुण रसों का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है । शूद्रक कोई भी हो, यह कृति पठनीय है ऐसी मेरी धारणा है ।

प्राचीन संस्कृत नाटकों में ‘विदूषक’ नाम का पात्र भी सामान्यतः मौजूद रहता था और उसकी भूमिका अक्सर काफी महत्त्वपूर्ण होती थी । वह प्रायः मुख्य पात्र नायक का मित्र होता था और अपने हावभाव, वेशभूषा, बातचीत आदि के माध्यम से दर्शकों का मनोरंजन करता था । उक्त नाटक में चारुदत्त का मित्र मैत्रेय विदूषक की भूमिका निभाता है ।

मृच्छकटिकम् नाटक में एक प्रसंग है जिसमें विदूषक मैत्रेय रंगमंच पर चिंतित मुद्रा में बैठे चारुदत्त के पास पहुंचता है और उससे चिंता का कारण पूछता है । चारुदत्त को इस बात का दुःख है कि लोग उसकी नष्टप्राय संपन्नता के कारण उससे अब कुछ पाने की उम्मींद नहीं रखते और तदनुरूप उसके द्वार पर भी नहीं आते । दोनों मित्रों के मध्य बातचीत का दौर चलता है । इसी बातचीत में चारुदत्त अपने कष्ट का वर्णन करते हुए मैत्रेय से कहता है:
सुखं हि दुःखान्यनुभूय शोभते घनान्धकारेष्विव दीपदर्शनम् ।
सुखात्तु याति नरो दरिद्रतां धृतः शरीरेण मृतः स जीवति ।।

(शूद्रकरचित मृच्छकटिकम्, अंक प्रथम, श्लोक १०)

[घनान्धकारेषु दीपदर्शनम् इव सुखं दुःखानि अनुभूय हि शोभते । सुखात् तु (यः) नरः दरिद्रतां याति सः शरीरेण धृतः (अपि) मृतः (इव) जीवति ।]
जिस प्रकार घने अंधकार में प्रज्वलित दीप के दर्शन पाना सार्थक और वांछित होता है उसी प्रकार दुःखों की अनुभूति के बाद ही सुखप्राप्ति के आनंद की अर्थवत्ता है । लेकिन जो मनुष्य सुखों के बाद दुःखों के गर्त में गिरता है वह शरीर धारण किये हुए मृत व्यक्ति के समान होता है ।

धनहीनता का जीवन जीने से तो मृत्यु का वरण करना अच्छा है यह बात भी वह यूं कहता हैः
दारिद्र्यान्मरणाद्वा मरणं मम रोचते न दारिद्र्यम् ।
अल्पक्लेशं मरणं दारिद्र्यमननन्तकं दुःखम् ।।

(पूर्वोक्त, श्लोक ११)

[दारिद्र्यात् (अथ)वा मरणात् मम मरणं न (तु) दारिद्र्यम् रोचते । मरणं अल्पक्लेशं (भवति किंतु) दारिद्र्यम् अननन्तकं दुःखम् (अस्ति) ।]
दरिद्रता एवं मरण में से मुझे मरना ही चुनने योग्य लगता है, न कि दरिद्रता के साथ जीना, क्योंकि मरने में होने वाला क्लेश वस्तुतः अल्पकालिक होता है परंतु दरिद्रता का कष्ट तो अंतहीन कष्ट देने वाला सिद्ध होता है ।

दरिद्रता वास्तव में एक अभिशाप है । दरिद्र व्यक्ति जीवनपर्यंत कष्ट भोगता है । लेकिन चाहने से तो मृत्यु भी नहीं आती है । और जिजीविषा तथा आशावादिता भी तो मनुष्य को मृत्यु से परे रखे रहतीं हैं । – योगेन्द्र

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