कभी न बुढ़ाने वाली तृष्णा – नीतिवचन महाभारत से

महाकाव्य महाभारत के कौरव-पांडव युद्ध की समाप्ति के बाद उसके दुष्परिणामों से व्यथित युधिष्ठिर शरशय्या पर पड़े पितामह भीष्म के समक्ष अपनी विविध शंकाएं-समस्याएं रखते हैं और उनसे उपदेशात्मक वचन सुनते हैं । तत्संबंधित अनुशासन पर्व में नीति संबंधी अनेक बातों का जिक्र मिलता है । एक स्थल पर भीष्म युधिष्ठिर को संबोधित करते हुए मनुष्य की सहज वृत्ति ‘तृष्णा’ की चर्चा करते हैं – तृष्णा अर्थात् ऐहिक सुख-सुविधा, धन-संपदा, मान-प्रतिष्ठा, अधिकार-वर्चस्व आदि पाने-बटोरने की भूख । जिन दो श्लोकों पर मेरा ध्यान विशेष तौर पर गया है वे हैं:

या दुर्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।
यो९सौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ।।

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय ७, श्लोक २१)

(या दुर्मतिभिः दुर्त्यजा, जीर्यतः या न जीर्यति, असौ यः प्राणान्तिकः रोगः, तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ।)

जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।
चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका न तु जीर्यते ।।

(यथा पूर्वोक्त, श्लोक २४)

(जीर्यतः केशा जीर्यन्ति, जीर्यतः दन्ता जीर्यन्ति, चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते, एका तृष्णा तु न जीर्यते)

जो तृष्णा सुमतिहीन व्यक्तियों द्वारा न छोड़ी जाती है, जो मनुष्य के वृद्धावस्था में पहुंच जाने पर भी स्वयं बुढ़ी नहीं होती, जो रोग की भांति प्राणघातक बनी रहती है, उस तृष्णा को त्याग देने पर ही वास्तविक सुखानुभूति मिलती है ।२१।

मनुष्य के जराप्राप्त होने यानी बुढ़ा जाने पर उसके बाल भी वृद्ध हो जाते हैं, दांत भी उसके बूढ़े हो जाते हैं, आंख-कान भी वृद्ध हो जाते हैं, किंतु उसकी तृष्णा फिर भी यथावत् युवा बनी रहती है ।२४।

वास्तव में उम्र बढ़ने पर शरीर के विभिन्न अंग अपनी शक्ति-सामर्थ्य के चरम तक पहुंचते हैं और फिर उनमें विकार एवं ह्रास आरंभ हो जाते हैं । हमारी काया धीरे-धीरे अशक्त होने लगती है, बाल, दांत, आंख तथा कान जैसे अंग वृद्धावस्था के अनुरूप ढलने लगते हैं । सभी अंग नैसर्गिक नाश की ओर बढ़ने के संकेत देने लगते हैं । लेकिन मनुष्य की इच्छाएं तब भी सदैव की भांति तीव्र बनी रहती हैं । असहाय हो चुकने पर भी उसकी जिजीविषा, संपदा अर्जित करने की इच्छा तथा और अधिक समय तक सुख भोगने की लालसा तब भी बनी रहती हैं । अब मुझे अधिक कुछ नहीं चाहना है, बल्कि संसार से किसी समय पूर्वतः अघोषित क्षण पर अलविदा करने के लिए तैयार हो जाना चाहिये, यह भाव आम तौर पर किसी के मन में नहीं जगता है ।  इस भावना को वैदिक भारत में संन्यास कहा गया है ।

आज जो भी कदाचरण और आर्थिक भ्रष्टाचार अपने देश ही में नहीं बल्कि सारे विश्व में न्यूनाधिक मात्रा में देखने को मिल रहा है, वह इसी अदम्य तृष्णा या मानव मन में व्याप्त अतृप्त भूख का परिणाम है । पेट की भूख तो एक हद के बाद शांत हो जाती है, किंतु मन की भौतिक जगत् संबंधी पिपासा उतनी ही बढ़ती जाती है जितनी उसकी तृप्ति का प्रयास किया जाता है ।

यही सृष्टि की विचित्र माया है । – योगेन्द्र

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. P K MISHRA Banarasi
    जून 26, 2010 @ 10:27:30

    “DHARAYATI ETI DHARMAH” means “Jo dharan karne yogya hai, vahi dharm hai.

    प्रतिक्रिया

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