हितोपदेश के नीतिवचन: एक, विद्या की महत्ता

नीतिवचनों से सुसंपन्न साहित्य संस्कृत भाषा में प्रचुरता से उपलब्ध है । रामायण, महाभारत तथा विभिन्न पुराणों में नीति संबंधी बातों का उल्लेख बहुतायत में दिखाई देता है । किंतु बच्चों-किशोरों के लिए सुग्राह्य रूप में उपयोगी बातों के लिए पंडित विष्णुशर्मा द्वारा रचित ‘पंचतंत्र’ सर्वाधिक चर्चित है । इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि इसमें नीति और बुद्धिमत्ता की बातें उन कथाओं के माध्यम से कही गयी हैं जिनके पात्र पश-पक्षी रहे हैं । पंचपंत्र से कुछ कम विख्यात और कुछ छोटा और अपेक्षया सरल एक और ग्रंथ उपलब्ध है ‘हितोपदेश’ । इसमें भी कथाओं के पात्र पश-पक्षी ही हैं ।

मेरे पास ‘हितोपदेश’ की चौखंबा संस्कृत प्रतिष्ठान के द्वारा प्रकाशित प्रति है, जिसके अनुसार इस ग्रंथ के रचयिता श्री नारायण पंडित थे । लेकिन ग्रंथ के रचनाकाल का उल्लेख नहीं है किया गया है । आगे यह भी कहा गया है कि ग्रंथ वस्तुतः मौलिक नहीं है, बल्कि उसे अन्य संस्कृत ग्रंथों, विशेषतया पंचतंत्र, से विविध सामग्री जुटाकर रचा गया था । ग्रंथ के आरंभिक दो श्लोकों में भगवान् शिव की प्रार्थना और ग्रंथ के महत्त्व का उल्लेख है । तत्पश्चात् तीसरे से आठवें श्लोकों में विद्या की अर्थवत्ता की बातें कही गयी हैं । नौवें में यह स्पष्ट किया गया है कि ग्रंथ पंचतंत्र तथा अन्य स्थलों से जुटाई गयी जानकारी पर आधारित है । बाद में एक राजा तथा उसके मूर्ख संतानों के उल्लेख के साथ विभिन्न कथाएं एक सूत्र में पिरोई गयी हैं ।

मैं यहां पर विद्या की महत्ता को दर्शाने वाले तीसरे एवं चौथे श्लोकों का उल्लेख कर रहा हूं:

अजरामरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थं च चिन्तयेत् ।
गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ।।

(हितोपदेश, श्लोक ३)

{प्राज्ञः अजर(वत्) अमरवत् (च) विद्याम् अर्थं च चिन्तयेत् (तथा च) मृत्युना केशेषु गृहीतः इव धर्मम् आचरेत् ।}

सूझबूझ वाला मनुष्य विद्या एवं धन अर्जित करने का विचार यूं करे जैसे कि वह बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्त हो । किंतु साथ में धर्माचरण भी यूं करे जैसे कि काल उसके बाल पकड़कर बैठा हो और कभी भी उसे इहलोक से उठा सकता हो । तात्पर्य यह है कि मृत्यु अवश्यंभावी है, और कभी भी आ सकती है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए धर्मकर्म में संलग्न रहे । फिर भी काल के भय से पुरुषार्थ करना न छोड़े, और जब तक जीवन है वह विद्या तथा धन के लिए प्रयत्नशील रहे ।

सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् ।
अहार्यत्वादनर्घत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ।।

(हितोपदेश, श्लोक ४)

{(विद्वज्जनाः) सर्वदा अहार्यत्वात् अनर्घत्वात् अक्षयत्वात् च सर्वे(षु) द्रव्येषु विद्या एव अनुत्तमम् द्रव्यम् (अस्ति इति) आहुः ।}

विद्वान् लोग कभी न चुराये जाने, अनमोल होने तथा कभी क्षय न होने के कारणों से सभी द्रव्यों, यानी सुख-संपदा-संतुष्टि के आधारों, में से विद्या को ही सर्वोत्तम होने की बात करते हैं । वस्तुतः विद्या है तो बहुत कुछ संभव है यह बात बुद्धिमान लोग सदा से ही कहते आये हैं । विद्याहीन मनुष्य कई मानों में निरर्थक जीवन जीता है यह बात मानी ही जाती है ।
– योगेन्द्र

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. deepashree das
    अगस्त 12, 2012 @ 13:39:50

    wow sundaram

    प्रतिक्रिया

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