काल की महिमा – महाकाव्य महाभारत के वचन

महाकाव्य महाभारत के परिचयात्मक प्रथम अध्याय में ‘काल’ यानी समय की महिमा का वर्णन किया गया है । इस अध्याय के अनुसार महाभारत की कथा का बखान नैमिषारण्य वन (उत्तर प्रदेश में सीतापुर के पास गोमती नदी के तीर पर एक तीर्थस्थली) में लोमहर्षण ऋषि के पुत्र उग्रश्रवा द्वारा वहां के आश्रमवासी ऋषिवृंद के सम्मुख किया गया था । कथावाचक ऋषि का कथन था कि सृष्टि में जो कुछ घट चुका, घट रहा तथा घटेगा वह सब काल ही निर्धारण करता । यह काल स्वयं सृष्टि के मूल अमूर्त परमात्मा का नियंता रूप है । ऋषि के अनुसार महाभारत की घटनाएं इसी काल से प्रेरित रही हैं । मनुष्य अपने विवेक के अनुसार कर्म करता तो है, किंतु परिणाम क्या होगा इसे यही काल निर्धारित करता है ।

ग्रंथ के २४८वें से २५१वें तक के श्लोकों में काल की महिमा का वर्णन इस प्रकार किया गया है (वेदव्यासरचित महाभारत, आदिपर्व, अध्याय १):

कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ।
संहरन्तं प्रजाः कालं कालः शमयते पुनः ।।२४८।।

{ कालः भूतानि सृजति, कालः प्रजाः संहरते, (तथा) प्रजाः संहरन्तं कालं कालः पुनः शमयते ।}

जिसकी व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है: काल (निरंतर अतीत हो रहा समय) ही समस्त जीवों की सृष्टि करता है और वही उनका संहार करता है । इस प्रकार उनके संहार के कारणभूत काल को वही (महाकाल, परमात्मा का शामक रूप) शान्त करता है । इस प्रकार सृष्टि-संहार का चक्र चलता रहता है ।

कालो हि कुरुते भावान् सर्वलोके शुभाशुभान् ।
कालः संक्षिपते सर्वाः प्रजा विसृजते पुनः ।।२४९।।

{सर्वलोके कालः हि शुभ-अशुभान् भावान् कुरुते, कालः सर्वाः प्रजाः संक्षिपते पुनः (च ताः) विसृजते ।}

जिसका अर्थ है: सृष्टि के सभी शुभ-अशुभ पदार्थों का रचयिता काल ही है । वह सब जीवों का विनाशकर्ता है और वही उनके पुनरुत्पत्ति का कारण है । (संहारक एवं सृष्टिकर्ता की बात यहां दोहराई गयी है ।)

कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः ।
कालः सर्वेषु भूतेषु चरत्यविधृतः समः ।।२५०।।
{सुप्तेषु कालः जागर्ति, कालः हि दुरतिक्रमः, कालः सर्वेषु भूतेषु अविधृतः समः चरति ।}

इस कथन के अनुसार जब जीव सो रहा है तब (भी) काल जगा रहता है, यानी वह सदैव की भांति कार्यशील बना रहता है । काल की गति या प्रभाव का अतिक्रमण संभव नहीं है । तात्पर्य है कि उसके नियमों के अनुसार जो घटित होना है उसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है । सभी प्राणियों में वह बिना अवरोध के अपना कार्य निरंतर करता रहता है । इस प्रकार जीवधारियों के जीवनचक्र का वह नियंता है ।

अतीतानागता भावा ये च वर्तन्ति साम्प्रतम् ।
तान् कालनिर्मितान् बुध्वा न संज्ञां हातुमर्हसि ।।२५१।।

{(ये) अतीत-अनागताः भावाः ये च (भावाः) साम्प्रतम् वर्तन्ति, तान् कालनिर्मितान् बुध्वा (त्वम्) संज्ञां हातुम् न अर्हसि ।}

अर्थात् सृष्टि में जो भी पदार्थ पूर्व में थे, भविष्य में होंगे और वर्तमान में हैं, वे सब काल द्वारा निर्मित हैं इस तथ्य को समझते हुए तुम्हें (श्रोता) अपना संज्ञान-सामर्थ्य अथवा विवेक नहीं खोना चाहिए ।

तो क्या मनुष्य पूर्णतः पराधीन है ? अंतिम वाक्य में जो कहा गया है उससे तो यही लगता है कि ऐसा पूर्णतः नहीं है । मनुष्य अपने विवेक एवं निर्णय-सामर्थ्य से बहुत कुछ कर सकता है, लेकिन क्या कुछ हो पायेगा और परिणाम क्या होंगे यह बात काल के नियमों के अधीन रहेंगे । उनका अनुमान तो लग सकता है, किंतु उनके बारे में सुनिश्चित नहीं हुआ जा सकता है; बहुत कुछ काल के हाथ में जो रहेगा । कुल मिलाकर, कर्म मनुष्य के अधिकार में है, परंतु कर्मफल नहीं । – योगेन्द्र

3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Asha Joglekar
    मार्च 30, 2009 @ 11:26:03

    Bahut sarthak jankari.

    प्रतिक्रिया

  2. yogesh
    अगस्त 23, 2010 @ 17:34:47

    1 – follow the truth.
    2 – find the truth
    3 – accept the truth
    4 – TRUTH , TRUTH AND ONLY TRUTH

    प्रतिक्रिया

  3. चेतन धर्माधिकारी
    अगस्त 10, 2014 @ 22:53:24

    उत्तम जानकारी

    प्रतिक्रिया

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: