श्वेताश्वरोपनिषद् वचन: यथा तिल में तेल तथा देह में आत्मा

आत्मा-परमात्मा जैसी सत्ताएं होती हैं या नहीं इस बारे में मेरी कोई भी धारणा नहीं बन सकी है । कदाचित् यह भौतिक जगत् अपने आप में स्वयंभू है, और जीव एवं मानवीय चैतन्य उसी से पैदा होती हैं और उसी में विलुप्त भी हो जाती हैं । अथवा परमात्मा वस्तुतः स्वयंभू है; सृष्टि उसी से उत्पन्न हुयी है और उसी में विलीन हो जानी है । सच क्या है इसे शायद कोई प्रतिपादित नहीं कर सकता है । सत्य दोनों में से कोई एक हो सकता है, अथवा कुछ और पूर्णतः अन्यथा भी हो सकता है, जो मेरी कल्पना या तार्किक चिंतन में अभी तक नहीं आ सका है ।

अपने देश के प्राचीन वैदिक चिंतकों-मनीषियों की राय में अंतिम सत्य परमात्मा है, और सृष्टि का मूर्त-अमूर्त स्वरूप उसी का आत्म-प्रकटीकरण है । वे कितना सही थे इस पर टिप्पणी कर पाना मेरी बौद्धिक सामर्थ्य से बाहर है । मैं हजारों वर्ष पूर्व के उन चिंतकों की रचनाशीलता एवं तर्कक्षमता से स्वयं को अभिभूत पाता हूं । अपने चिंतन से प्राप्त ज्ञान को उन्होंने एकाधिक वैदिक ग्रंथों में सहेज कर रखा है । उनके आध्यात्मिक तथा दार्शनिक मत विभिन्न उपनिषदों में संगृहीत है । उन्हीं उपनिषदों में से एक ‘श्वेताश्वरोपनिषद्’ है ।

श्वेताश्वर उपनिषद् में आत्मा का भौतिक देह से किस प्रकार का संबंध है इसे सोदाहरण अधोलिखित मंत्र में स्पष्ट किया गया है:
तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिरापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः ।
एवमात्मा९९त्मनि गृह्यते९सौ सत्येनैनं तपसा यो९नुपश्यति ।।
(श्वेताश्वरोपनिषद्, अध्याय १, मंत्र १५)
{तिलेषु तैलं, दधनि सर्पिः, स्रोतःसु आपः, अरणीषु च अग्निः इव एवम् आत्मनि असौ आत्मा (वर्तते) यः एनं सत्येन तपसा (च) अनुपश्यति (तेन) गृह्यते ।}

अर्थात् जिस प्रकार तिलों (तिल के दानों) में अदृश्य रूप से तेल मौजूद रहता है, दही में घी, ऊपरी तौर पर सूखे नजर आ रहे जल-स्रोतों के भीतर पानी, और अरणियों में अग्नि की विद्यमानता रहती है, उसी प्रकार देही के अंदर यानी भौतिक काया के भीतर आत्मा का निवास रहता है । जो व्यक्ति सत्य तथा तप के माध्यम से उसे देखने या पहचानने का प्रयत्न करता है उसी को उसकी प्राप्ति होती है, इस तथ्य का साक्षात्कार हो पाता है ।

शमी नाम के वृक्ष की लकड़ी को अरणि कहा गया है । वैदिक युग में इनका प्रयोग यज्ञादि कायों में इंधन (समिधा) के तौर पर होता था । शमी की सूखी लकड़ियों को परस्पर रगड़कर आग पैदा की जाती थी ऐसा कहा जाता है । तिल से तेल, दही से घी अथवा शमी-काष्ठ से अग्नि प्राप्त करने के लिए समुचित उपक्रम करना पड़ता है । इन वस्तुओं को देखने भर से उनसे संबंधित अदृष्य तत्त्वों की प्रतीति नहीं हो जाती है । इसी प्रकार आत्मा के अस्तित्व के ज्ञान की प्राप्ति का भी मार्ग है । यह मार्ग है सत्य एवं तप का जीवनयापन – तप अर्थात् आत्मसंयम, क्रोधादि आवेगों पर नियंत्रण, काम-वासनाओं से मुक्ति के प्रयास, इत्यादि । – योगेन्द्र

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. amita haldankar
    जून 13, 2010 @ 10:28:47

    परमात्मा वस्तुतः स्वयंभू है

    प्रतिक्रिया

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