दूसरों की सफलता सहना सरल नहीं – चाणक्य वचन

इस माह की ‘सम्भाषणसंदेशः’ नामक मासिक संस्कृत पत्रिका में मुझे अधोलिखित नीतिवचन पढ़ने को मिला:

दह्यमानाः सुतीव्रेण नीचाः परयशो९ग्निना ।
अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते ।।१०।।

{सुतीव्रेण परयशस्‌-अग्निना दह्यमानाः नीचाः तत्पदं गन्तुं अशक्ताः, ततः (ते तेषां) निन्दां प्रकुर्वते ।}

यह वचन चाणक्यनीतिदर्पण, अध्याय १३, से लिया गया है । इसके अनुसार नीच प्रकृति के लोग दूसरों की प्रसिद्धि या सफलता रूपी तेज अग्नि से जल उठते हैं और स्वयं प्रसिद्धि या सफलता के उस स्थान को पाने में अक्षम रहते हैं । ऐसे में वे उनकी निंदा करते फिरते हैं ।

मनुष्य के स्वभाव का यह रोचक किंतु कमजोर तथा निराशाप्रद पहलू है कि वह दूसरे की सफलता को सरलता से नहीं पचा पाता है, भले ही उस सफलता का उसके निजी जीवन से कोई लेना-देना न हो । अवश्य ही आज के प्रतिस्पर्धामूलक व्यावसायिक जीवन में एक व्यक्ति की प्रगति किसी दूसरे की प्रगति में बाधक हो सकती है । तब वह दूसरा व्यक्ति यह कामना कर सकता है, और शायद ऐसा आम तौर पर अघोषित शब्दों में करता भी है, कि पहला आगे न बढ़े, ताकि उसके स्वयं की प्रगति की संभावना बन सके । एक कुर्सी में दो व्यक्ति बैठ नहीं सकते हैं, कम से कम व्यावसायिक कुर्सी के लिए तो यह नितांत सत्य है । तब ? तब किस तरीके से दूसरे से आगे निकला जाये यह चिंता व्यक्ति को सताने लगती है । अपनी योग्यता कोई भी एक सीमा से आगे नहीं बढ़ा सकता है । प्रकृति ने सबको समान दैहिक सामर्थ्य, बौद्धिक क्षमता एवं समान अवसर नहीं दिये हैं । इसलिए कामयाबी की दौड़ में कोई आगे तो कोई पीछे रहेगा ही । यह सच भले ही हो पर सहज तौर पर स्वीकार्य नहीं है । तब आगे बढ़ने के प्रयासों में परनिंदा का एक मार्ग भी बचता है, जिसे मनुष्य अक्सर अपना बैठता है । आंरभ में मनुष्य को ऐसा करने में हिचक होती होगी, लेकिन कालांतर में वह इसका आदी हो जाता है । आत्मग्लानि का भाव भी उसमें जगना बंद हो जाता है ।

परनिंदा के माध्यम से अपना लक्ष प्राप्त करने के प्रयास आजकल राजनेताओं में खूब देखने को मिल रहा है । चुनाव का मौसम चल रहा है, जिसमें हर हाल में सफल होना है । किसी के बारे में कुछ भी उल्टा-सीधा, अनर्गल बोलने में किसी को भी हिचक नहीं रह गयी है । सामान्य शिष्टाचार भी वे लोग भूलते जा रहे हैं । आत्मसंयम की बात अब राजनीति में जैसे दुर्लभ हो गयी है ।

यह सब देख मुझे कभी-कभी आश्चर्य होता है । लोग धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक आदि की बातें करते हैं, और उनकी ऐसी बातें सुन भ्रम होने लगता है कि वे कभी अपने परलोक की भी चिंता करते होंगे । लेकिन जब उनके रोजमर्रा की जिंदगी पर नजर डालता हूं तो लगता है कि जीवन में उनके कार्य इस भौतिक संसार में येनकेन प्रकारेण सफल होने तक सीमित हैं, मरते दम तक । विचित्र है यह सृष्टि और विलक्षण है उसमें मानव स्वभाव । – योगेन्द्र

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