माण्डूक्योपनिषद् वचन – परमात्मा एवं जीवात्मा के बीच आकाश-घटाकाश के सदृश संबंध

यह नितांत सत्य है कि सभी जीवधारियों का भौतिक अस्तित्व पदार्थमूलक है, अर्थात् उनके अस्तित्व की अनुभूति उनके दृश्य या स्पृश्य शरीर के माध्यम से ही होती है । क्या इस भौतिक शरीर से परे भी कोई ऐसी सत्ता है जो जीव के निर्जीव पदार्थों से भेद का आधार हो ? क्या कुछ ऐसा है जो जीव के दैहिक नाश के बाद भी बचा रहता है, जो स्वयं नष्ट नहीं होता है ? अनादि काल से मनुष्य इन प्रश्नों के उत्तर खोजता आ रहा है ।

आधुनिक वैज्ञानिक युग में अनेक विज्ञानी, किंतु सभी नहीं, इस मत के हैं कि निर्जीव पदार्थ ही विशिष्ट भौतिक संरचना ग्रहण करते हुए विशेष रासायनिक प्रक्रियाओं के अधीन सजीव रूप धारण कर लेता है । उसकी ‘मृत्यु’ के साथ ही उसके भौतिक ढांचे का आधार ‘पदार्थ’ अपने मूल अवयवों से जा मिलता है और शेष कुछ भी नहीं बचता । अर्थात् उनके मतानुसार देहावसान के बाद ‘अनश्वर’ प्रकृति की कोई सत्ता सृष्टि में नहीं बची रह जाती है । इस धारणा के विपरीत शरीर से परे ‘आत्मा’ या तत्सदृश ‘अविनाशी’ कोई सत्ता बची रहती है ऐसी धारणा प्रचलित प्रायः सभी दर्शनों में देखने को मिलती है । वैदिक दर्शन में जीवधारी भौतिक पदार्थ और ‘आत्मा’ के संयोग का परिणाम है । यह आत्मा स्वयं सर्वव्यापी अशरीरी परमात्मा का अंश है, लेकिन उससे विभक्त अलग अस्तित्व धारण किये रहती है । अपने मूल ‘परमात्म’ तत्व में उसके विलय को मोक्ष कहा गया है ।

‘माण्डूक्य’ उपनिषद् में शरीर, आत्मा, तथा परमात्मा को क्रमशः घट (घड़ा), उसके भीतर सीमाबद्ध आकाश, और बाहर अनंत तक फैले आकाश से तुलना के माध्यम से समझाया गया है । गुरु द्वारा अपने जिज्ञासु शिष्य के समक्ष कही गयी बात अधोलिखित दो श्लोकों में अभिव्यक्त है:
आत्मा ह्याकाशवज्जीवैर्घटाकाशैरिवोदितः ।
घटादिवच्च संघातैर्जातावेतन्निदर्शनम् ।।
घटादीषु प्रलीनेषु घटाकाशादयो यथा ।
आकाशे प्रलीयन्ते तद्वज्जीवा इहात्मनि ।।

(माण्डूक्योपनिषद्, अद्वैतप्रकरण, श्लोक ३ एवं ४)

जिनकी सम्मिलित व्याख्या कुछ इस प्रकार की जा सकती हैः जिस प्रकार घड़ों के निर्माण पर आकाश विभक्त हो जाता है और उसके अलग-अलग भाग उन घड़ों के अंदर सीमित हो जाते हैं और ऐसा प्रतीत होने लगता है जैसे कि उनके भीतर का रिक्त स्थान बाहर के विस्तृत आकाश से भिन्न है, उसी प्रकार आत्मा (परमात्मा) पदार्थों के मिलन से जीव रूपों में प्रकट होता है । और घड़ों के टूटकर बिखर जाने पर जैसे उनके भीतर समाये हुए आकाशीय क्षेत्रों का बाह्याकाश से भेद मिट जाता है और वे पुनः बाह्याकाश के साथ एकाकार हो जाते हैं, ठीक वैसे ही जीवात्माएं पदार्थों के संयोग से विमुक्त होकर परम आत्मा में विलीन हो जाते हैं ।

यहां यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि वैदिक दर्शन में यह अवधारणा प्रचलित है कि जीवधारी के दो प्रकार के शरीर होते हैं, एक ‘स्थूल शरीर’ और दूसरा ‘लिंग देह’ या ‘सूक्ष्म शरीर’ । हमें जीवधारी के अस्तित्व का भान उसके स्थूल शरीर के माध्यम से होता है । यही शरीर है जिसे वह मृत्यु के समय त्यागता है । मान्यता है कि वह तब भी प्रकृति से सूक्ष्म शरीर के माध्यम से बंधा रहता है । इस सूक्ष्म शरीर में पंचमहाभूत (‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ अर्थात्‌ पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश एवं वायु) सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहते हैं; मृत्यु पश्चात् इसी का ‘प्रेत’ रूप में संसार के साथ बंधन बना रहता है; और इसी में जीव के संस्कार संचित रहते हैं । वस्तुतः घटाकाश की जो तुलना यहां प्रस्तुत है वह इस सूक्ष्म शरीर से संबंधित है, न कि स्थूल शरीर से । यह सूक्ष्म शरीर जन्म-मृत्यु के चक्र में उलझा रहता है और मोक्ष की अवस्था में आत्मा इससे बंधन तोड़कर परमात्मा में प्रलीन हो जाती है ।

आत्मा-परमात्मा, सूक्ष्म-स्थूल शरीरों और जन्म-मृत्यु आदि का दर्शन मैं स्वयं नहीं समझ पाया हूं । इतना ही कहूंगा कि वैदिक चिंतकों ने अपने दर्शन को स्पष्ट करने के लिए जो दृष्टांत प्रस्तुत किया है वह अवश्य मुझे प्रभावी लगा है । वैदिक चिंतक यदा-कदा इस बात पर भी बल डालते रहे हैं कि दृष्टांतों को शब्दशः न लिया जाये । – योगेन्द्र

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