नीति वचन: गच्छन् पिपिलिको याति …

माध्यमिक स्तर की किसी कक्षा में संस्कृत विषयक पुस्तक में मैंने कभी नीति संबंधी एक श्लोक पढ़ा था । वह श्लोक मुझे आज भी याद है, यद्यपि उसका मूल स्रोत का ज्ञान मुझे नहीं है । उसके शब्द इस प्रकार हैं:
गच्छन् पिपिलिको याति योजनानां शतान्यपि ।
अगच्छन् वैनतेयः पदमेकं न गच्छति ।।

(गच्छन् पिपिलिकः योजनानां शतानि अपि याति । अगच्छन् वैनतेयः एकं पदं न गच्छति ।)

श्लोक का शाब्दिक अर्थ इस प्रकार दिया जा सकता हैः लगातार चल रही चींटी सैकड़ों योजनों की दूरी तय कर लेती है, परंतु न चल रहा गरुड़ एक कदम आगे नहीं बढ़ पाता है ।

अवश्य ही चींटी के संदर्भ में सैकड़ों योजनों की दूरी अतिशयोक्ति मानी जायेगी । उसकी गति अति सामान्य रहती है और उसके सामर्थ्य की तुलना गरुड़ से नहीं की जा सकती है, जो पलक झपकते ही कई मीटर दूर जा सकता है । परंतु सामर्थ्य के इस भेद का ही महत्त्व पर्याप्त नहीं है । महत्त्व तो उस संकल्प का भी है जिसको लेकर आगे बढ़ा जाता है । श्लोक का तात्पर्य मात्र यह है कि लगातार चलायमान चींटी अपने गंतव्य की ओर अग्रसर रहते हुए न जाने कितनी दूरी तय कर लेती है । दूसरी तरफ निष्क्रिय पड़ा हुआ गरुड़ वहीं का वहीं रह जाता है । जब तक वह आगे बढ़ने का संकल्प न ले और उस हेतु प्रयत्न न करे वह आगे नहीं वढ़ेगा ।

इस श्लोक में वस्तुतः वही सीख व्यक्त की गयी है जो कछुए और खरगोश की सुपरिचित कहानी के माध्यम से बच्चों को बतायी जाती है । किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयास का किया जाना पहली आवश्यकता होती है । उसके पश्चात् ही आवश्यक सामर्थ्य का महत्त्व है । सामर्थ्य अधिक होगी तो सफलता शीघ्र और सरलता से मिलेगी, अन्यथा उसमें विलंब और कठिनाई होगी । लेकिन कुछ कर गुजरने का विचार ही मन में न आवे और व्यक्ति उस दिशा में ही प्रयत्न करने को ही तैयार न हो तो सफलता की आशा करना मूर्खता कही जायेगी ।

हमारे समाज में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो अपने-अपने क्षेत्र में महारत रखते हों । उनकी शैक्षिक तथा व्यावसायिक योग्यता पर शंका नहीं की जा सकती । किंतु वे अपनी समस्त ऊर्जा एवं कार्य-क्षमता को अधिकांशतः स्वहित साधने में ही लगा देते हैं । सामाजिक दायित्वों के प्रति समर्पण भाव उनमें अपर्याप्त रहता है । समर्पण भाव नहीं तो समाज हित की दिशा में कदम नहीं । फलतः समाज वांछित प्रगति नहीं कर पा रहा है ।

आजकल अपने देश में लोकसभा के लिए चुनाव चल रहे हैं और इस समय देश के सामने खड़ी तमाम चुनौतियों की बात भी की जा रही है । जनप्रतिनिधि बनने के लिए उत्सुक राजनेता शासन चलाने की अपनी तथा अपने दल की सामर्थ्य एवं योग्यता का दावा कर रहे हैं । परंतु क्या वे चुने जाने पर उपयुक्त दिशा में कदम उठायेंगे ? या चुनौतियों की अनदेखी करते हुए सत्तासुख में बैठे रह जायेंगे ? यही त्रासदी है देश की कि समस्याओं के निराकरण का लक्ष्य ये जनप्रतिनिधि भूल जाते हैं ।
सृष्टि की अमूर्त नियंता शक्ति से मेरी प्रार्थना है कि उनमें सन्मति का उदय होवे । – योगेन्द्र

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