तृष्णा से मुक्ति भोग से नहीं शमन से संभव – नीतिवचन महाभारत से

महाकाव्य महाभारत में राजा ययाति की कथा का उल्लेख है । कहा जाता है कि किसी समय दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री शर्मिष्ठा की शिकायत पर ययाति को शाप दे डाला कि वृद्धावस्था उन्हें समय से पूर्व ही शीघ्र आ घेरेगी । (कहानी लंबी है । शर्मिष्ठा ययाति की रानी थी और किंचित् कारणों से दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री देवयानी दासी के तौर पर उसके साथ आई थी । कदाचित् ययाति उस पर अधिक आसक्त थे । शिकायत इसी बात से संबंधित थी ।) शाप के फलस्वरूप ययाति देह से जल्दी ही बूढ़े हो गये, किंतु उनकी दैहिक भोगेच्छाएं-कामनाएं समाप्त नहीं हो सकीं थीं । उन्होंने ऋषि शुक्राचार्य से क्षमा-याचना की तो उन्हें यह वरदान मिला कि वे अपने बुढ़ापे की किसी युवक की जवानी से अदला-बदली कर सकेंगे ।

भला कौन वृद्धावस्था स्वीकारने के लिए राजी होता ? राजा ययाति ने सबसे पहले अपने ही पांच पुत्रों के समक्ष अपनी चाहत की बात रखी । राजकुमार पुरु को छोड़कर शेष सब ने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया । राजा ने पुत्र का यौवन प्राप्त कर लंबे समय तक दैहिक सुखों का भोग किया । अंत में उन्हें यह अनुभव हुआ कि दैहिक आनंद से उन्हें कभी भी तृप्ति नहीं हो सकती । तब उन्होंने अपने इस पुत्र को ‘उधार’ का यौवन लौटा दिया और उसे राजपाठ सोंपते हुए वानप्रस्थ आश्रम में चले गये । (कौरव-पांडव इन्हीं पुरु के कई पीढ़ियों के बाद के वंशज थे ।)

तृष्णा, अर्थात् भौतिक मूल के सुखों की कामना की तृप्ति, उन सुखों के अधिकाधिक भोग से नहीं बल्कि उनके ‘शमन’, यानी लालसाओं से स्वयं को मुक्त करने के माध्यम, से ही संभव है । राजा ययाति का उक्त ‘बुद्धत्व’ इस श्लोक में व्यक्त हैः

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एव अभिवर्तते ।।
(महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 75, श्लोक 50)

अर्थात् मनुष्य की इच्छा कामनाओं के अनुरूप सुखभोग से नहीं तृप्त होती है । यानी व्यक्ति की इच्छा फिर भी बनी रहती है । असल में वह तो और बढ़ने लगती है, ठीक वैसे ही जैसे आग में इंधन डालने से वह अधिक प्रज्वलित हो उठती है । इसलिए इच्छाओं पर नियंत्रण (शमन) ही विवेकशील व्यक्ति के लिए अनुकरणीय मार्ग है । (हविषस् = इंधन, कृष्णवर्त्मन् = अग्नि)

उक्त श्लोक का उल्लेख मुझे दो स्थलों पर दिखा । अध्याय 85 में भी यह श्लोक शब्दशः दुबारा शामिल है (महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 85, श्लोक 11) ।

तृष्णा के संदर्भ में एक और श्लोक अध्याय 75 में इस प्रकार हैःतृष्णा के संदर्भ में एक और श्लोक अध्याय 75 में इस प्रकार हैः
पृथिवी रत्नसंपूर्णा हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् ।।

(महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 75, श्लोक 51)

इसका अर्थ यूं दिया जा सकता हैः पृथिवी रत्नों से भरी है; यह स्वर्ण (मूल्यवान धातुएं आदि), पशुधन, तथा स्त्रियों का भंडार है । यह सब एक व्यक्ति के लिए भी पर्याप्त नहीं है ऐसा मानते हुए मनुष्य शमन का रास्ता अपनाये । ऐसा इसलिए है कि मनुष्य सब मिल जाने पर भी असंतुष्ट बना रहेगा और काश! कि मेरे पास और अधिक होता जैसे भाव उसके मन में उत्पन्न होते रहते । (हिरण्यम्‌ = स्वर्ण)

इस श्लोक का भी जोड़ीदार अध्याय 85 में देखने को मिलता है, किंतु कुछ शब्दों के अंतर के साथ । वह श्लोक हैः
यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
एकस्यापि न पर्याप्तं तस्मात्तृष्णां परित्यजेत् ।।

(महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 85, श्लोक 12)

इस श्लोक के अर्थ पहले उल्लिखित श्लोक के अर्थ के समान ही हैं । अर्थानुसार इस पृथिवी पर जो भी धान-जौ (अन्न), स्वर्ण, पशुधन एवं स्त्रियां हैं वे सब एक मनुष्य को मिलें तो भी पर्याप्त नहीं होंगे । इस तथ्य को जानते हुए व्यक्ति को चाहिए कि तृष्णा का परित्याग करे । (व्रीहियवम्‌ = व्रीहि+यवम्‌ = धान+जौ अर्थात्‌ अन्न)

इन सभी श्लोकों में जिस जीवन-दर्शन का उल्लेख है वह सार्थक है । परंतु एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि क्यों स्त्री को भी भोग्य वस्तुओं में शामिल किया गया है । ऐसा लगता है कि समस्त बातें पुरुषों को ध्यान में रखकर कही गयी हैं और धन-धान्य, रत्न, स्वर्ण, आदि एवं स्त्रियां पुरुषों के सुख-भोग के साधनों के तौर पर स्वीकारे गये हैं । मुझे ऐसी सोच आपत्तिजनक लगती है । तृष्णा के संदर्भ में कही गयी बातें तो स्त्री तथा पुरुष दोनों के लिए समान रूप से लागू होती हैं; फिर क्यों केवल पुरुषों का नाम लिया गया । महाभारत के रचयिता महर्षि व्यास ने स्त्री-पुरुषों के मध्य ऐसा भेद क्यों किया होगा ? प्रश्न विचारणीय है, पर इसका उत्तर मेरे पास तो नहीं है; कदाचित् संतोषप्रद उत्तर किसी के भी पास न हो ।

तृष्णा के बारे में महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 7 में भी बहुत कुछ कहा गया है, जिसकी चर्चा मैंने अन्यत्र (20 फरवरी, 2009, की पोस्ट में) की है । उक्त अध्याय में कहा गया है कि मनुष्य स्वयं बुढ़ा जाता है, किंतु उसकी भोगलिप्सा जवान बनी रहती है । – योगेन्द्र

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Himanshu Pota
    सितम्बर 13, 2009 @ 09:13:12

    आपके लेख आंशिक ही पढ़े हैं किन्तु जितना पढ़ा है उससे लगता है वह रोचक तथा ज्ञानवर्धक दोनों हैं। समय मिलने से पूर्णलेख पढ़ूँगा|

    आपका संस्कृत भाषा का ज्ञाना प्रशंशनीय है। आपके किये अनुवाद अर्थ का अनर्थ नहीं करते वरन् सीधा अर्थ करते हैं।

    आप अपना ज्ञान इसी प्रकार संसार को बांटते रहें।

    हिमांशु पोटा

    प्रतिक्रिया

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