लोभः पापस्य कारणम् (हितोपदेश) – लोभ से प्रेरित होती है ठगी

इधर कुछ दिनों से टीवी समाचार चैनलों पर ठगी के मामलों की चर्चा सुनने को मिल रही हैं । बताया जा रहा है कि गुजरात के अशोक जडेजा का देश भर में ठगी का जाल फैला हुआ है । इस किस्से की चर्चा के एक-दो दिन बाद दिल्ली के सुभाष अग्रवाल के कारनामों की भी चर्चा होने लगी । ठगी के इन मामलों में वास्तविक तथ्य क्या हैं इसे टीवी दर्शकों द्वारा तय कर पाना संभव नहीं है । यह सभी जानते हैं कि ये चैनल पूरे प्रकरण को अक्सर सनसनीखेज तथा अतिरंजित बनाकर पेश करते हैं । फिर भी वे निराधार नहीं होने चाहिए यह माना जा सकता है ।

ठगी की घटनाएं हमारे समाज में आये दिन होती हैं । हर घटना का समाचार अखबार और टीवी चैनलों द्वारा प्रसारित नहीं किया जाता है, लेकिन वे घटती रहती हैं । किसी को धन दुगुना-तिगुना करने के नाम पर ठगा जाता है, तो किसी को नौकरी दिलाने के नाम पर । किसी को अस्पताल में कारगर इलाज के नाम पर ठगा जाता है, तो किसी को सरकारी दस्तावेज बनाने के नाम पर, इत्यादि । कई नादान लोग बेवकूफ बनते हैं, तो कुछ गिने-चुने शातिर लोग बेवकूफ बना रहे होते हैं ।

कुछ मामले हैं जिनमें व्यक्ति का ठगा जाना समझ में आता है । अपने देश की अधिकांश जनता अनपढ़ तथा नियम-कानूनों से अनभिज्ञ रहती है । वे लोग कई मौकों पर दूसरों के झांसे में आ सकते हैं, विशेषतः सरकारी कामकाज के संदर्भ में । लेकिन जो लोग जेवर-जेवरात को बैठे-बैठे ही दूना करके देने का वादा करने वालों के चंगुल में फंसते हैं और जो धनराशि को अल्प काल में ही दुगुना-तिगुना करके लौटाने की बात करने वालों के झांसे में आते है उन्हें में मूर्ख तथा लोभी मानता हूं । जरा सोचने की बात है कि कोई व्यक्ति कैसे ऐसा चमत्कार कर सकता है ? और यदि किसी के पास ऐसी जादुई शक्ति है तो वह क्योंकर दूसरों पर इतना मेहरबान होने लगता है ? क्यों नहीं वह बिना कुछ लिए ही जनसेवा में ही लग जाता है ?

इस प्रकार की घटनाओं के पीछे लोभ एक, कदाचित् एकमेव, कारण रहता है ऐसी मेरी मान्यता है । लोभ ही है जो व्यक्ति को उचितानुचित का विचार त्यागकर धनसंपदा अर्जित करने को प्रेरित करता है । यह तो ठगी करने वाले की बात हुई । दूसरी तरफ लोभ ही है जो किसी व्यक्ति को ठगी करने वाले के द्वारा किए जा रहे दावे पर विश्वास करने को बाध्य करता है । गंभीरता से विचार करने और वस्तुस्थिति की पर्याप्त जानकारी हासिल किये बिना ही वह झांसे में आ जाता है ।

शिक्षाप्रद लघुकथाओं के संग्रह ‘हितोपदेश’ ग्रंथ में लोभ के बारे में कहा गया हैः
लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रजायते ।
लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम् ।।

(हितोपदेश, मित्रलाभ, २७)

अर्थात् लोभ से क्रोध का भाव उपजता है, लोभ से कामना या इच्छा जागृत होती है, लोभ से ही व्यक्ति मोहित हो जाता है, यानी विवेक खो बैठता है, और वही व्यक्ति के नाश का कारण बनता है । वस्तुतः लोभ समस्त पाप का कारण है ।

इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया हैः
लोभेन बुद्धिश्चलति लोभो जनयते तृषाम् ।
तृषार्तो दुःखमाप्नोति परत्रेह च मानवः ।।

(हितोपदेश, मित्रलाभ, १४२)

अर्थात् लोभ से बुद्धि विचलित हो जाती है, लोभ सरलता से न बुझने वाली तृष्णा को जन्म देता है । जो तृष्णा से ग्रस्त होता है वह दुःख का भागीदार बनता है, इस लोक में और परलोक में भी ।

ग्रंथ में अन्यत्र यह वचन भी पढ़ने को मिलता हैः
यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ते अध्रुवं नष्टमेव हि ।।

(हितोपदेश, मित्रलाभ, २१५)

अर्थात् जो व्यक्ति ध्रुव यानी जो सुनिश्चित् है उसकी अनदेखी करके उस वस्तु के पीछे भागता है जो अनिश्चित् हो, तो अनिष्ट होना ही है । निश्चित् को भी वह खो बैठता है और अनिश्चित् का ता पहले से ही कोई भरोसा नहीं रहता है । ठगी के मामलों में फंसे लोगों के बारे में यह पूर्णतः लागू होता । जिस जमा-पूंजी को निश्चित् तौर पर वे अपना कह सकते हैं उसको जब बिना सोचे-समझे वे दांव पर लगा दें, तो उससे वे हाथ धो बैठते हैं, और बदले में वांछित फल पाते नहीं हैं ।

इतना सब कहने का तात्पर्य यह है कि अविलंब अपनी धनसंपदा को दुगुना-तिगुना करने की चाहत से व्यक्ति को बचना चाहिए और उसे यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि कोई व्यक्ति कैसे धनवृद्धि के अपने अविश्वसनीय दावे को सफल कर सकता है ।

लोभ या तृष्णा यानी भौतिक धन-संपदा आदि के प्रति अदम्य चाहत के बारे में महाकाव्य महाभारत में भी काफी कुछ कहा गया है, जिनका संक्षिप्त उल्लेख मैंने इसी ब्लॉग में अन्यत्र (‘कभी न बुढ़ाने वाली तृष्णा …’ एवं ‘तृष्णा से मुक्ति भोग से नहीं …’) किया है । – योगेन्द्र

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. aniruddha pande
    फरवरी 20, 2010 @ 16:16:34

    aapka blog mere dwara padhe sarvottam blog me se ek hai …..
    itni amuly jankari ke liye dhanywad mai aapka abhari hu

    प्रतिक्रिया

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