छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति – संस्कृत नाट्यकृति मृच्छकटिकम् की उक्ति

अक्सर यह देखने को मिलता है कि जब मनुष्य किसी एक विपत्ति का सामना कर रहा होता है तो और भी कई अड़चनें उसके सामने एक-एक कर प्रकट होने लगती हैं । ऐसी स्थिति की व्याख्या लोग ‘कंगाली/गरीबी में आटा गीला’ के कहावत से करते हैं । इस प्रकार की विपरीत परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर अंगरेजी में ‘मिसफॉर्च्यून्स् सेल्डम कम् अलोन् (misfortunes seldom come alone)’ कहावत का प्रयोग किया जाता है । संस्कृत भाषा में ऐसी कष्टकर परिस्थिति उत्पन्न होने पर ‘छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति’ कहना पड़ता है । मैं कह नहीं सकता कि इस उक्ति का मूल स्रोत क्या है, लेकिन मुझे इसके दर्शन नाट्यकार शूद्रक द्वारा रचित संस्कृत नाट्यकृति मृच्छकटिकम् के अधोलिखित श्लोक में मिले:

यथैव पुष्पं प्रथमे विकासे समेत्य पातुं मधुपाः पतन्ति ।
एवं मनुष्यस्य विपत्तिकाले छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ।।

(मृच्छकटिकम्, नवम् अंक, २६)

(यथा एव प्रथमे विकासे पुष्पं पातुं मधुपाः समेत्य पतन्ति, एवं मनुष्यस्य विपत्तिकाले छिद्रेषु अनर्थाः बहुलीभवन्ति ।)

अर्थात् किसी पुष्प के आरंभिक विकास के समय यानी उसके खिलने की आरंभिक अवस्था में उसमें निहित मधु का पान करने जिस प्रकार भौंरों के समूह उसे आ घेरते हैं, उसी प्रकार विपत्ति के समय जरा-सी चूकों के घटित होने पर अनेकों अनर्थ अर्थात् अनिष्ट एक साथ मनुष्य के ऊपर आ पहुंचती हैं । (छिद्र = दोष, अवगुण, भूल, चूक; अनर्थ = अनिष्ट, दुर्योग, अवांछित स्थिति; बहुलीभू = एक के बदले अनेक हो जाना ।)

मृच्छकटिकम् नाटक के बारे में दो शब्द अन्यत्र लिखे गये हैं । नाटक में उसके प्रमुख पात्र चारुदत्त (नगर का एक सुख्यात, गुणी और प्रतिष्ठित नागरिक) पर राजा के रखैल का भाई शकार नायिका वसंतसेना (चारुदत्त की प्रेमिका) की हत्या का नितांत झूठा आरोप लगाता है । वस्तुतः शकार ने स्वयं ही वसंतसेना की हत्या का प्रयास किया होता है और उसे मृत मानते हुए छोड़ जाता है । परंतु वह मरती नहीं और एक बौद्ध भिक्षुक उसको अपने आश्रम चिकित्सा-शुश्रूषा के लिए ले गया होता है । न्यायालय में न्यायाधिकारी के सामने शकार पूर्व में चारुदत्त के साथ हुई घटनाओं का विवरण इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि वे उसके विरुद्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्य के रूप में स्वीकारे जा सकें । चारुदत्त असत्य का सहारा लेकर उन घटनाओं को नकार नहीं पाता है, अतः न्यायालय की दृष्टि में दोषी सिद्ध हो जाता है । न्यायालय में चल रही बहस के समय चारुदत्त अपनी पूर्व की भूलों का स्मरण करते हुए उक्त श्लोक का स्वगत पाठन करते हुए नाटक में दिखाया गया है ।

नाटक मृच्छकटिकम् मुझे काफी दिलचस्प लगा । आज से एक-डेड़ हजार साल पहले रचित इस नाटक में तत्कालीन परिस्थितियों का जो वर्णन मिलता है उसमें अपने देश में आज व्याप्त सामाजिक-राजनैतिक-प्रशासनिक वास्तविकता की झलक देखने को मिलती है । उदाहरणार्थ, न्यायाधिकारी चारुदत्त के निर्दोष होने को समझता है, किंतु वह इतना साहस नहीं जुटा पाता है कि शकार के मनःप्रतिकूल निर्णय लेने के लिए प्रस्तुत हो सके । शकार का राजा का निकटस्थ होना न्यायाधिकारी के प्रति उसकी समर्पिता को प्रभावित किए बिना नहीं रहती ।

विपत्तियां क्या वास्तव में एक साथ आ पड़ती हैं ? शायद सदैव नहीं, परंतु यह संभावना तो रहती ही है कि जब आप किसी एक समस्या को सुलझाने में लग जाते हैं तो किसी अन्य समस्या का समाधान छूट जाता है और उसके समय पर हल न हो पाना नई-नई समस्याओं को जन्म दे जाता है । अन्य एक कारण यह भी हो सकता है कि जब आपके समक्ष कोई समस्या आ खड़ी होती है तो जिन मित्र-परिचितों पर आप भरोसा किये रहते हैं वे किसी न किसी बहाने आपसे दूर होने लगते हैं । तब आपको लगता है कि आप अकेले पड़ रहे हैं । मनोवैज्ञानिक कारणों से नई छोटी-सी अड़चनें भी आपको भारी नजर आने लगती हैं । मित्र-परिचित सहयोग के लिए प्रस्तुत हो जायें तो स्थिति तथा उसके प्रति दृष्टिकोण बदल जायें । – योगेन्द्र

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