महाभारत प्रकरण: यक्ष-युधिष्ठिर संवाद – महाजनो येन गतः सः पन्थाः

महाकाव्य महाभारत में ‘यक्ष-युधिष्ठिर संवाद’ नाम से एक पर्याप्त चर्चित प्रकरण है । संक्षेप में उसका विवरण यूं है: पांडवजन अपने तेरह-वर्षीय वनवास पर वनों में विचरण कर रहे थे । तब उन्हें एक बार प्यास बुझाने के लिए पानी की तलाश हुई । पानी का प्रबंध करने का जिम्मा प्रथमतः सहदेव को सोंपा गया । उसे पास में एक जलाशय दिखा जिससे पानी लेने वह वहां पहुंचा । जलाशय के स्वामी अदृश्य यक्ष ने आकाशवाणी के द्वारा उसे रोकते हुए पहले कुछ प्रश्नों का उत्तर देने की शर्त रखी, जिसकी सहदेव ने अवहेलना कर दी । यक्ष ने उसे निर्जीव (संज्ञाशून्य?) कर दिया । उसके न लौट पाने पर बारी-बारी से क्रमशः नकुल, अर्जुन एवं भीम ने पानी लाने की जिम्मेदारी उठाई । वे उसी जलाशय पर पहुंचे और यक्ष की शर्तों की अवज्ञा करने के कारण सभी का वही हस्र हुआ । अंत में युधिष्ठिर स्वयं उस जलाशय पर पहुंचे । यक्ष ने उन्हें आगाह किया और अपने प्रश्नों के उत्तर देने के लिए कहा । युधिष्ठिर ने धैर्य दिखाया, यक्ष को संतुष्ट किया, और जल-प्राप्ति के साथ यक्ष के वरदान से भाइयों का जीवन भी वापस पाया । यक्ष ने अंत में यह भी उन्हें बता दिया कि वे धर्मराज हैं और उनकी परीक्षा लेना चाहते थे ।

उस समय संपन्न यक्ष-युधिष्ठिर संवाद वस्तुतः काफी लंबा है । संवाद का विस्तृत वर्णन वनपर्व के अध्याय ३१२ एवं ३१३ में दिया गया है । यक्ष ने सवालों की झणी लगाकर युधिष्ठिर की परीक्षा ली । अनेकों प्रकार के प्रश्न उनके सामने रखे और उत्तरों से संतुष्ट हुए । अंत में यक्ष ने चार प्रश्न युधिष्ठिर के समक्ष रखे जिनका उत्तर देने के बाद ही वे पानी पी सकते थे । ये प्रश्न अधोलिखित श्लोक में सम्मिलित हैं:

को मोदते किमाश्चर्यं कः पन्थाः का च वार्तिका ।
ममैतांश्चतुरः प्रश्नान् कथयित्वा जलं पिब ।।१४।।

(कः मोदते, किम् आश्चर्यं, कः पन्थाः, का च वार्तिका, मम एतान् चतुरः प्रश्नान् कथयित्वा जलं पिब ।)

अर्थात् १. कौन व्यक्ति आनंदित या सुखी है?
२. इस सृष्टि का आश्चर्य क्या है?
३. जीवन जीने का सही मार्ग कौन-सा है? और
४. रोचक वार्ता क्या है?

मेरे इन चार प्रश्नों का उत्तर देने के बाद तुम जल पिओ ।

यहां तथा आगे उद्धृत सभी श्लोक महाभारत, वनपर्व, अध्याय ३१३ में प्राप्य हैं । एक टिप्पणी करना समीचीन होगा कि पारंपरिक संस्कृत में ‘कॉमा’ तथा ‘हाइफन’ का कोई स्थान नहीं है । किंतु वर्तमान काल में वाक्यों में स्पष्टता दर्शाने के लिए इनका प्रयोग होने लगा है । यहां पर भी ऐसा किया जा रहा है ।

पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा शाकं पचति स्वे गृहे ।
अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते ।।१५।।

(वारिचर, स्वे गृहे पञ्चमे वा षष्ठे अहनि शाकं पचति, अनृणी च अप्रवासी च सः मोदते ।)

१. हे जलचर (जलाशय में निवास करने वाले यक्ष), जो व्यक्ति पांचवें-छठे दिन ही सही, अपने घर में शाक (सब्जी) पकाकर खाता है, जिस पर किसी का ऋण नहीं है और जिसे परदेस में नहीं रहना पड़ता है, वही मुदित-सुखी है । यदि युधिष्ठिर के शाब्दिक उत्तर को महत्त्व न देकर उसके भावार्थ पर ध्यान दें, तो इस कथन का तात्पर्य यही है जो सीमित संसाधनों के साथ अपने परिवार के बीच रहते हुए संतोष कर पाता हो वही वास्तव में सुखी है ।

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम् ।
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्।।१६।।

(इह अहनि अहनि भूतानि यम-आलयम् गच्छन्ति, शेषाः स्थावरम् इच्छन्ति, अतः परम् आश्चर्यम् किम् ।)

२. यहां इस लोक से जीवधारी प्रतिदिन यमलोक को प्रस्थान करते हैं, यानी एक-एक कर सभी की मृत्यु देखी जाती है । फिर भी जो यहां बचे रह जाते हैं वे सदा के लिए यहीं टिके रहने की आशा करते हैं । इससे बड़ा आश्चर्य भला क्या हो सकता है ? तात्पर्य यह है कि जिसका भी जन्म हुआ है उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है और उस मृत्यु के साक्षात्कार के लिए सभी को प्रस्तुत रहना चाहिए । किंतु हर व्यक्ति इस प्रकार जीवन-व्यापार में खोया रहता है जैसे कि उसे मृत्यु अपना ग्रास नहीं बनाएगी ।

तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम् ।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् महाजनो येन गतः सः पन्थाः ।।१७।।

(तर्कः अप्रतिष्ठः, श्रुतयः विभिन्नाः, एकः ऋषिः न यस्य मतं प्रमाणम्, धर्मस्य तत्त्वं गुहायाम् निहितं, महाजनः येन गतः सः पन्थाः ।)

३. जीवन जीने के असली मार्ग के निर्धारण के लिए कोई सुस्थापित तर्क नहीं है, श्रुतियां (शास्त्रों तथा अन्य स्रोत) भी भांति-भांति की बातें करती हैं, ऐसा कोई ऋषि/चिंतक/विचारक नहीं है जिसके वचन प्रमाण कहे जा सकें । वास्तव में धर्म का मर्म तो गुहा (गुफा) में छिपा है, यानी बहुत गूढ़ है । ऐसे में समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति जिस मार्ग को अपनाता है वही अनुकरणीय है । ‘बड़े’ लोगों के बताये रास्ते पर चलने की बातें अक्सर की जाती हैं । यहां प्रतिष्ठित या बड़े व्यक्ति से मतलब उससे नहीं है जिसने धन-संपदा अर्जित की हो, या जो व्यावसायिक रूप से काफी आगे बढ़ चुका हो, या जो प्रशासनिक अथवा अन्य अधिकारों से संपन्न हो, इत्यादि । प्रतिष्ठित वह है जो चरित्रवान् हो, कर्तव्यों की अवहेलना न करता हो, दूसरों के प्रति संवेदनशील हो, समाज के हितों के प्रति समर्पित हो, आदि-आदि ।

अस्मिन् महामोहमये कटाहे सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन ।
मासर्तुदर्वीपरिघट्टनेन भूतानि कालः पचतीति वार्ता ।।१९।।

(कालः अस्मिन् महा-मोह-मये कटाहे सूर्य-अग्निना रात्रि-दिवा-इन्धनेन मास-ऋतु-दर्वी-परिघट्टनेन भूतानि पचति इति वार्ता ।)

४. काल (यानी निरंतर प्रवाहशील समय) सूर्य रूपी अग्नि और रात्रि-दिन रूपी इंधन से तपाये जा रहे भवसागर रूपी महा मोहयुक्त कढ़ाई में महीने तथा ऋतुओं के कलछे से उलटते-पलटते हुए जीवधारियों को पका रहा है । यही प्रमुख वार्ता (खबर) है । इस कथन में जीवन के गंभीर दर्शन का उल्लेख दिखता है । रात-दिन तथा मास-ऋतुओं के साथ प्राणीवृंद के जीवन में उथल-पुथल का दौर निरंतर चलता रहता है । प्राणीगण काल के हाथ उसके द्वारा पकाये जा रहे भोजन की भांति हैं, जिन्हें एक न एक दिन काल के गाल में समा जाना है । यही हर दिन का ताजा समाचार है ।

महाभारत और उसके अंतर्गत यक्ष-युधिष्ठिर संवाद का कितना ऐतिहासिक महत्त्व है इस पर मेरी कोई टिप्पणी नहीं है । कदाचित् महाभारत मानव जीवन के सच का प्रतीकात्मक निरूपण है । ग्रंथ में वर्णित कथाएं शब्दशः अर्थपूर्ण न हों ऐसा संभव है । फिर भी उनका दार्शनिक पक्ष प्रभावी है, और मेरी दृष्टि में ग्रंथकार के चिंतन की व्यापकता आकर्षक है । – योगेन्द्र

2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. अनुनाद सिंह
    जुलाई 01, 2009 @ 18:38:53

    आप संस्कृत के अच्छे जानकार एवं शास्त्रों के अध्येता हैं। मुझे लगता है कि “चरैवेति चरैवेति” के इन मंत्रों का हिन्दी में अनुवाद आप से सम्भव है। यदि इसका कुछ प्रसंग
    है तो उसके बारे में भी बताने कीकृपा करें।

    १-ॐ नाना श्रान्ताय श्रीरस्ति, इति रोहित शुश्रुम ।
    पापो नृषद्वरो जन, इन्द्र इच्चरतः सखा । चरैवेति चरैवेति॥

    २- पुष्पिण्यौ चरतो जंघे, भूष्णुरात्मा फलग्रहिः ।
    शेरेऽस्य सवेर् पाप्मानः श्रमेण प्रपथे हताः । चरैवेति चरैवेति॥

    ३- आस्ते भग आसीनस्य, ऊध्वर्स्तिष्ठति तिष्ठतः ।
    शेते निपद्यमानस्य, चराति चरतो भगः । चरैवेति चरैवेति॥

    ४- कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः ।
    उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् । चरैवेति चरैवेति॥

    ५- चरन् वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुमुदुम्बरम् ।
    सूयर्स्य पश्य श्रेमाणं, यो न तन्द्रयते चरन् । चरैवेति चरैवेति॥

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