‘उत्तिष्ठत जाग्रत …’ – कठोपनिषद् का उपदेशात्मक वचन

स्वामी विवेकानंद के उपदेशात्मक वचनों में एक सूत्रवाक्य विख्यात है । वे कहते थे:
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।”

इस वचन के माध्यम से उन्होंने देशवासियों को अज्ञानजन्य अंधकार से बाहर निकलकर ज्ञानार्जन की प्रेरणा दी थी । कदाचित् अंधकार से उनका तात्पर्य अंधविश्वासों, विकृत रूढ़ियों, अशिक्षा एवं अकर्मण्यता की अवस्था से था । वे चाहते थे कि अपने देशवासी समाज के समक्ष उपस्थित विभिन्न समस्याओं के प्रति सचेत हों और उनके निराकरण का मार्ग खोजें । स्वामीजी इस कथन के महत्त्व को कदाचित् ऐहिक जीवन के संदर्भ देखते थे ।

यह सूत्रवाक्य स्वामीजी के अपने मौलिक वचन थे ऐसा मुझे नहीं लगा । वैदिक चिंतन तथा अध्यात्म में उनकी श्रद्धा थी । मुझे उस स्रोत को जानने की इच्छा हुई जहां से उन्हें उक्त वचन मिला होगा । संयोग से मुझे कठोपनिषद् में वह मंत्र दिखा जिसका आरंभिक अंश ‘उत्तिष्ठत जाग्रत …’ है । वह मंत्र है:

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।।

(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र १४)
(उत्तिष्ठत, जाग्रत, वरान् प्राप्य निबोधत । क्षुरस्य निशिता धारा (यथा) दुरत्यया (तथा एव आत्मज्ञानस्य) तत् पथः दुर्गं (इति) कवयः वदन्ति ।)

जिसका अर्थ कुछ यूं हैः उठो, जागो, और जानकार श्रेष्ठ पुरुषों के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करो । विद्वान् मनीषी जनों का कहना है कि ज्ञान प्राप्ति का मार्ग उसी प्रकार दुर्गम है जिस प्रकार छुरे के पैना किये गये धार पर चलना ।

कठोपनिषद् में गौतम ऋषि के पुत्र नचिकेता का मृत्युदेवता यम के साथ संवाद का विवरण है । नचिकेता को यम सृष्टि के अंतिम सत्य परमात्मतत्त्व के बारे में बताते हैं । उक्त मंत्र में यम द्वारा ऋषिकुमार को परमात्मा के अंशभूत आत्मा का ज्ञान पाने का उपदेश निहित है । स्पष्ट है कि प्रकरण आध्यात्मिक ज्ञानार्जन से संबंधित है न कि भौतिक स्तर के ऐहिक अर्थात् लौकिक विद्यार्जन से । किंतु स्वामी विवेकानंद ने मंत्र के आरंभिक अंश को लौकिक अर्थ में प्रयोग किया है । वस्तुतः उपनिषदों में लौकिक उपयोग की सामान्य विद्या को महत्त्व न दिया गया हो ऐसा नहीं है । इस बात पर चर्चा फिर कभी ।

वैदिक चिंतकों की दृष्टि में मनुष्य देह भौतिक तत्त्वों से बना है, परंतु उसमें निहित चेतना शक्ति का स्रोत आत्मा है । आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन आत्मा के अस्तित्व के बारे में सुनिश्चित धारणा नहीं बना सका है । कदाचित् कई विज्ञानी कहेंगे कि आत्मा-परमात्मा जैसी कोई चीज होती ही नहीं है । तत्संबंधित सत्य वास्तव में क्या है यह रहस्यमय है, अज्ञात है । – योगेन्द्र

4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. समीर लाल
    जुलाई 17, 2009 @ 07:31:00

    आभार!!

    प्रतिक्रिया

  2. Ritesh
    सितम्बर 20, 2009 @ 11:42:56

    Badiya .Dhanyawaad

    प्रतिक्रिया

  3. Trackback: .व्या.ख्या.स्वा.तं.त्र्या.ची. . . . | GuruDrushti
  4. Sanjeev Kumar
    फरवरी 10, 2015 @ 04:56:36

    स्मृ्ति तो निर्विकार आत्मा ही है, लेकिन जब उसमे जीवत्व(मै शरीर हूँ या ये शरीर मेरा है, ये भाव) प्रक्ट होने लगता है तो वही जीव की स्मृति कही जाती है ।
    जय श्री कृष्ण

    प्रतिक्रिया

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