महाकाव्य महाभारत में सूर्यग्रहण का उल्लेख और ‘राहु’ की व्याख्या

आज प्रातः सूर्यग्रहण की घटना घटी थी । सूर्य तथा चंद्र ग्रहण तो घटित होते ही रहते हैं, प्रत्येक संख्या में दो से पांच तक हर वर्ष । परंतु इस बार का ग्रहण कुछ खास था । उत्तर एवं उत्तर-पूर्व भारत के कुछ क्षेत्रों में यह पूर्णग्रहण या खग्रास के रूप में दिखाई दिया होगा । पावस ऋतु का समय होने के कारण आसमान साफ रहा हो ऐसी संभावना कम ही थी, भले ही पानी बरसने के आसार कम ही रहे हों । अतः कुछ ही भाग्यशाली लोग इसे देख पाये होंगे । हलके बादलों के चलायमान चादर के पीछे दृश्यमान इस ग्रहण को सौभाग्य से मैं देखने में सफल रहा । पूर्ण सूर्यग्रहण की घटना दशकों में एक बार घटा करती है और वह भी हर बार पृथ्वी के अलग-अलग स्थानों से देखने योग्य । अतः जो नहीं देख पाये वे अब शायद ही कभी देख पाएं ।

ग्रहण की चर्चा होने पर मुझे ध्यान आया कि महाकाव्य महाभारत में एक स्थल पर सूर्यग्रहण का उल्लेख है । संबंधित प्रसंग में आदिपुरुष मनु द्वारा देवगुरु वृहस्पति को अध्यात्म तथा दर्शन के उपदेश की चर्चा की गई है । ग्रहण के दृष्टांत के द्वारा आत्मा और देह के आपसी संबंध की व्याख्या करने के प्रयास के तौर पर उस प्रसंग में अमुक उल्लेख है । संयोग से ऐसा करते समय ग्रहण कैसे घटित होता है और ‘राहु’ ग्रह क्या है इन प्रश्नों का उत्तर उस व्याख्या में प्रतिबिंबित होता है । ऐसा ही मुझे लगा । तत्संबंधित प्रासंगिक दो श्लोकों को मैं आगे उद्धृत कर रहा हूं (महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय २०३):

यथा चन्द्रार्कसंयुक्तं तमस्तदुपलभ्यते ।
तद्वच्छरीरसंयुक्तः शरीरीत्युपलभ्यते ।।२१।।

(यथा चन्द्र-अर्क-संयुक्तं तमः तत् उपलभ्यते, तत्-वत् शरीर-संयुक्तः शरीरी इति उपलभ्यते ।)

यथा चन्द्रार्कनिर्मुक्तः स राहुर्नोपलभ्यते ।
तद्वच्छरीरनिर्मुक्तः शरीरी नोपलभ्यते ।।२२।।

(यथा चन्द्र-अर्क-निर्मुक्तः सः राहुः न उपलभ्यते, तत्-वत् शरीर-निर्मुक्तः शरीरी न उपलभ्यते ।)

शरीर और आत्मा के संबंध की चर्चा करते हुए कहा जा रहा है कि जिस प्रकार चंद्रमा तथा सूर्य के संयोग होने पर ही चंद्रमा से संबद्ध ‘अंधकार’ के अस्तित्व की प्रतीति हो पाती है, उसी प्रकार भौतिक शरीर से संयुक्त होने पर ही ‘आत्मा है’ यह पता चलता है (प्रथम श्लोक) । और चंद्र-सूर्य के परस्पर विच्छेद हो जाने पर जिस तरह वह अंधकार रूपी राहु अदृश्य हो जाता है, उसी तरह शरीर छोड़ने पर आत्मा ‘अदृश्य’ हो जाती है । अर्थात् ‘वह है’ इसे कहने का आधार ही लुप्त हो जाता है (द्वितीय श्लोक) ।

उक्त बातें कही तो आध्यात्मिक दर्शन के संदर्भ में है, किंतु मुझे इन श्लोकों में ग्रहण की घटना को महाभारत-काल में कैसे देखा जाता होगा इसका संकेत दिखाई देता है । मेरे मतानुसार इनमें यह कहा जा रहा है कि जब चंद्रमा का सूर्य से संयोग होता है (सामान्यतः वह सूर्य से अलग रहता है, भले ही अमावास्या के दिन बहुत निकट हो) तब उसके साथ संबद्ध अंधकार अर्थात् उसके द्वारा प्रस्तुत अंधकारमय आच्छादन ही ग्रहण के रूप में हमें दिखता है । यही वस्तुतः ‘राहु’ है । जब चंद्रमा-जनित काला धब्बा सूर्य के ऊपर आ जाता है तो कहा जाता है कि राहु द्वारा सूर्य ग्रस लिया गया है । जब सूर्य चंद्रमा के संयोग से मुक्त हो जाता है तो चंद्रमा द्वारा उत्पन्न आच्छादन या काला धब्बा भी गायब हो जाता है । राहु के नाम से पुकारे जाने वाले इस धब्बे का अस्तित्व एक प्रकार से समाप्त हो जाता है । यह वह छाया है जो चंद्रमा के साथ बनी रहती है और जिसके प्रभाव क्षेत्र में आने पर पृथ्वीवासियों को सूर्य अंशतः/पूर्णतः ग्रस्त दिखाई देता है ।

गौर करें कि ज्योतिष् शास्त्र में राहु (और चंद्रमा को ‘ग्रसने’ वाले केतु) को छायाग्रह कहा जाता है । वास्तव में इनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है । दरअसल चंद्रमा का पृथ्वी के चारों ओर की कक्षा यानी चक्रमण-पथ (दीर्घवृत्त या इलिप्स) पृथ्वी के सूर्य के परितः कक्षा (दीर्घवृत्ताकार) के समतल से करीब पांच अंश का झुकाव रखता है । यह चंद्र-पथ पृथ्वी की कक्षा के तल को दो स्थानों पर काटता है । अर्थात् उस पथ के तल के साथ दो परिच्छेद बिंदु (पॉइंट्स अव् इंटरसेक्शन) उपलब्ध होते हैं, पहला (क) सूर्य की ओर तथा दूसरा (ख) उसके ठीक विपरीत । अपने मासिक चक्रमण के दौरान चंद्रमा इन दो बिंदुओं से गुजरता है, क्रमशः अमावास्या के दिन ‘क’ से और पौर्णमासी को ‘ख’ से । संयोग से जब ‘क’ सूर्य और पृथ्वी के सीध में होता है तो सूर्यग्रहण और जब ‘ख’ उसी सीध में होता है चंद्रग्रहण की स्थिति प्राप्त होती है । वस्तुतः यही दो बिंदु राहु तथा केतु हैं । ज्योतिष् के अनुसार बारह राशियों में केतु का स्थान राहु के स्थान से सदैव सातवां होता है । (जैसे राहु तुला में हो तो केतु मेष में होगा ।)

Eclipsesकहना मुश्किल है कि महाभारत-कालीन लोगों को सूर्य, चंद्र और उनके ग्रहणों के विषय में वही वस्तुनिष्ठ ज्ञान था या नहीं, जो आज के वैज्ञानिक युग में अधिकांश जनों को है । – योगेन्द्र

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. mohammad umar kairan
    जुलाई 22, 2009 @ 23:11:35

    कल्कि अवतार और अंतिम अवतार विषय में किया लिखा हे हिन्दू ग्रंथों में
    कुछ हमने भी पेश किया हे देखें
    antimawtar.blogspot.com

    प्रतिक्रिया

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