बुद्धवचनामृत, अश्वघोषविरचित बुद्धचरितम् से – ऐहिक संबंधों का अस्थायित्व

प्राचीन संस्कृत साहित्य में ‘बुद्धचरितम्’ नामक एक काव्य उपलब्ध है । मेरे पास इसकी एक प्रति है, श्री सूर्यनारायण चौधरी द्वारा संपादित-अनुवादित एवं मोतीलाल बनारसीदास द्वारा प्रकाशित । ग्रंथ-परिचय में बताया गया है कि काव्य की पूरी मूल प्रति उपलब्ध नहीं है । उसका अप्राप्य अधिकांश भाग तिब्बती एवं चीनी भाषाओं में प्राचीन काल में लिखित अनुवाद-ग्रंथों पर आधारित है । काव्य के रचनाकार कवि अश्वघोष बताये जाते हैं, जिनका कार्यकाल कदाचित् आज से दो हजार वर्ष पूर्व था । विद्वानों का मत है कि ब्राह्मण कुल में जन्मे अश्वघोष भगवान् बुद्ध के जीवन-चरित्र तथा बौद्ध धर्म के सिद्धांतों से इतने प्रभावित थे उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अपना जीवन अर्पित कर दिया ।

उक्त ग्रंथ में एक प्रसंग है । राजकुमार सिद्धार्थ गौतम (बुद्धत्व प्राप्ति के पूर्व) राजमहल छोड़कर चुपचाप निकल पड़ते हैं । जब इसकी जानकारी राजा शुद्धोदन को मिलती है तो वे राजपुरोहित और राजमंत्री को उन्हें खोजने तथा वापस बुलाने का दायित्व सोंपते हैं । राजकुमार उन्हें मिल जाते हैं । पुरोहित तथा मंत्री राजा के पुत्रवियोगजनित दुःख का हवाला देते हुए राजकुमार को समझाते हैं । तब राजकुमार राजा के प्रति अपना संदेश भिजवाते हैं कि संयोग के पश्चात् वियोग अवश्यंभावी है । हर मनुष्य अपने बांधवों-संबंधियों को कभी न कभी छोड़कर परलोक चला जाता है । संयोग-वियोग का चक्र अपरिहार्य है । राजा को चाहिए कि इस तथ्य को सहज तौर पर स्वीकारें और मेरे लिए दुःख न करें । मैं जन्म-मृत्यु के दुःखजनक चक्र से मुक्त होने का मार्ग ही तो खोजने चला हूं ।

मैं इस प्रकरण से संबद्ध तीन प्रासंगिक श्लोकों को आगे उद्धृत कर रहा हूं, जिनमें राजकुमार के उद्गारों को कवि अपनी शैली में प्रस्तुत करता है (बुद्धचरितम्, सर्ग 9, श्लोक संख्या क्रमशः ३४, ३५, तथा ३६):

एवं च ते निश्चयमेतु बुद्धिर्दृष्ट्वा विचित्रं जगतः प्रचारम् ।
सन्तापहेतुर्न सुतो न बन्धुरज्ञाननैमित्तिक एष तापः ।।

(एवं च जगतः विचित्रं प्रचारम् दृष्ट्वा ते बुद्धिः निश्चयम् एतु, न सुतः न बन्धुः सन्ताप-हेतुः, अज्ञान-नैमित्तिकः एषः तापः ।)

अर्थः- इस संसार की विचित्र गति को देखकर आपकी बुद्धि यह निश्चित समझे कि मनुष्य के मानसिक कष्ट या संताप के लिए उसका पुत्र अथवा बंधु कारण नहीं है, बल्कि दुःख का असली निमित्त तो अज्ञान है ।

यथाध्वगानामिह सङ्गतानां काले वियोगो नियतः प्रजानाम् ।
प्राज्ञो जनः को नु भजेत शोकं बन्धुप्रतिज्ञातजनैर्विहीनः ।।

(यथा इह सङ्गतानां अध्वगानाम् प्रजानाम् वियोगः काले नियतः, बन्धु-प्रतिज्ञात-जनैः विहीनः कः प्राज्ञः जनः नु शोकं भजेत ।)

अर्थः- जिस प्रकार मार्ग में मिले और साथ-साथ चले पथिकों का समय आने पर बिछुड़ना निश्चित है, उसी प्रकार बंधु-बांधवों का भी वियोग होना ही है । जब यही सत्य है तो बंधुओं-स्वजातियों द्वारा छोड़े जाने पर कौन समझदार व्यक्ति शोक में डूबेगा ? (अर्थात् सत्य को स्वीकारते हुए स्वजनों के वियोग में शोक न करें ।)

इहैति हित्वा स्वजनं परत्र प्रलभ्य चेहापि पुनः प्रयाति ।
गत्वापि तत्राप्यपरत्र गच्छत्येवं जने त्यागिनि को९नुरोधः ।।

(परत्र स्वजनं हित्वा इह एति, प्रलभ्य च इह अपि पुनः प्रयाति, अपि तत्र गत्वा अपरत्र अपि गच्छति, एवं त्यागिनि जने कः अनुरोधः ।)

अर्थः- जीव पूर्व जन्म के स्वजन को छोड़ इस लोक में जन्म लेता है; यहां बांधवों को प्रलोभित करके यानी अपनत्व का लोभ देते हुए फिर प्रस्थान कर जाता है । उस नये लोक में जाकर फिर कहीं अन्यत्र चला जाता है । ऐसे छोड़ते चले जाने वाले के लिए क्या आसक्ति रखी जाये ।

प्राचीन भारतीय वैदिक दर्शन में अमूर्त आत्मा, भौतिक देह तथा जन्म-मरण की अवधारणा देखने को मिलती है । जन्म-मृत्यु का चक्र कब तक और किस रूप में चलता रहेगा यह जीव द्वारा संपन्न कर्मों पर निर्भर करता है । वैदिक चिंतकों के अनुसार जब आत्मा अपने असली स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर लेती है और बारंबार देहग्रहण की उसकी आसक्ति समाप्त हो जाती है, तो उसका सच्चिदानंद परमात्मा में विलय हो जाता है (मोक्ष) । भगवान् बुद्ध के उक्त कथनों में भी जन्म-मृत्यु के चक्र में उनक विश्वास की झलक दृष्टिगत होती है । किंतु उनके द्वारा प्रतिपादित अध्यात्म दर्शन में इस चक्र से मुक्त होने के अर्थ वैदिक विचारधारा से भिन्न दिखाई देती है । वे कर्म-शरीर में विश्वास करते थे और कर्मजनित जन्म-मृत्यु की बात करते थे । उनके मत में जब संचित कर्मों का क्षय हो जाता है तो जीवधारी शून्य में विलीन हो जाता है (स्कन्ध निर्वाण) । उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है । वैदिक तथा बौद्ध चिंतन में पर्याप्त अंतर है । – योगेन्द्र

Saarnath - Bhttichitra

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी
    अगस्त 05, 2009 @ 13:24:26

    सुंदर आलेख।
    रक्षाबंधन पर शुभकामनाएँ! विश्वभ्रातृत्व विजयी हो!

    प्रतिक्रिया

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