‘सत्यं वद, धर्मं चर, …’ – तैत्तिरीय उपनिषद् के उपदेशात्मक मंत्र

अपने आरंभिक छात्रजीवन के समय संस्कृत पाठ्यपुस्तकों में मैंने “सत्यं वद । धर्मं चर ।… मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । …” के शिक्षाप्रद वचन पढ़े थे । अपरिपक्व सोच के उस काल में इन वचनों की अर्थवत्ता इम्तहान पास करने में अधिक थी और उनके निहितार्थ समझने में कम । हो सकता है उनका कुछ प्रभाव अपने आचरण पर पड़ा हो । कह नहीं सकता ।

इन वचनों के स्रोत के बारे में जिज्ञासा होने पर मैंने उननिषदों के पन्ने पलटना आरंभ किए तो पाया कि ये तैत्तिरीय उपनिषद् में समाहित हैं । इस उपनिषद् के तीन खंड हैं जिन्हें वल्ली कहा गया हैः शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली तथा भृगुवल्ली । प्रत्येक वल्ली स्वयं में अनुवाकों (अध्यायों) में विभक्त है । शिक्षावल्ली के ग्यारहवें अनुवाक में इस बात का वर्णन है कि कैसे वेदाध्यापन के बाद गुरु द्वारा अपने शिष्यों को सम्यग् आचरण की शिक्षा दी जाती है । उसी अनुवाक के आंरभ के दो मंत्र ये हैं:

वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजानन्तुं मा व्यवच्छेसीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् ।।
(तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षावल्ली, अनुवाक ११, मंत्र १)

अर्थ:- वेद के शिक्षण के पश्चात् आचार्य आश्रमस्थ शिष्यों को अनुशासन सिखाता है । सत्य बोलो । धर्मसम्मत कर्म करो । स्वाध्याय के प्रति प्रमाद मत करो । आचार्य को जो अभीष्ट हो वह धन (भिक्षा से) लाओ और संतान-परंपरा का छेदन न करो (यानी गृहस्थ बनकर संतानोत्पत्ति कर पितृऋण से मुक्त होओ) । सत्य के प्रति प्रमाद (भूल) न होवे, अर्थात् सत्य से मुख न मोड़ो । धर्म से विमुख नहीं होना चाहिए । अपनी कुशल बनी रहे ऐसे कार्यों की अवहेलना न की जाए । ऐश्वर्य प्रदान करने वाले मंगल कर्मों से विरत नहीं होना चाहिए । स्वाध्याय तथा प्रवचन कार्य की अवहेलना न होवे ।

देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि ।।
(तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षावल्ली, अनुवाक ११, मंत्र २)

अर्थ:- देवकार्य तथा पितृकार्य से प्रमाद नहीं किया जाना चाहिए । (कदाचित् इस कथन का आशय देवों की उपासना और माता-पिता आदि के प्रति श्रद्धा तथा कर्तव्य से है ।) माता को देव तुल्य मानने वाला बनो (मातृदेव = माता है देवता तुल्य जिसके लिए) । पिता को देव तुल्य मानने वाला बनो । आचार्य को देव तुल्य मानने वाला बनो । अतिथि को देव तुल्य मानने वाला बनो । अर्थात् इन सभी के प्रति देवता के समान श्रद्धा, सम्मान और सेवाभाव का आचरण करे । जो अनिन्द्य कर्म हैं उन्हीं का सेवन किया जाना चाहिए, अन्य का नहीं । हमारे जो-जो कर्म अच्छे आचरण के द्योतक हों केवल उन्हीं की उपासना की जानी चाहिए; उन्हीं को संपन्न किया जाना चाहिए । (अवद्य = जिसका कथन न किया जा सके, जो गर्हित हो, प्रशंसा योग्य न हो ।)संकेत है कि गुरुजनों का आचरण सदैव अनुकरणीय हो ऐसा नहीं है । अपने विवेक के द्वारा व्यक्ति क्या करणीय है और क्या नहीं इसका निर्णय करे और तदनुसार व्यवहार करे ।

एक शंका का समाधान मुझे कहीं नहीं मिला है । वैदिक साहित्य में सर्वत्र पुरुषों को केंद्र में रखते हुए ही बातें कही गयी हैं । ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए उन्हें आश्रम में रहने की बातें कही जाती हैं । यज्ञादि भी उन्हीं के द्वारा संपन्न होते रहे हैं । गार्हस्थ जीवन में भी उन्हीं के प्रवेश की बात की जाती रही है, जिसमें स्त्री एक सहायिका की भूमिका निभाती हो, इत्यादि । ऐसा क्यों रहा होगा ? स्त्रियों के बारे में इतनी विस्तृत बातें पुरातन साहित्य में पढ़ने को नहीं मिलती हैं । कदाचित् यह स्थिति विश्व के अन्य उन्नत समाजों में भी व्याप्त है । – योगेन्द्र जोशी

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