‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ इत्यादि – मनुस्मृति के वचन

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते …’ कहते हुए समाज में स्त्रियों को सम्मान मिलना चाहिए की बात अक्सर सुनने को मिलती हैं । सम्मान तो हर व्यक्ति को मिलना चाहिए, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, बालक हो या वृद्ध, धनी हो या निर्धन, आदि । किंतु देखने को यही मिलता है कि व्यक्ति शरीर से कितना सबल है, वह कितना धनी है, बौद्धिक रूप से कितना समर्थ है, किस कुल में जन्मा है, आदि बातें समाज में मनुष्य को प्राप्त होने वाले सम्मान का निर्धारण करते हैं । सम्मान-अपमान की बातें समाज में हर समय घटित होती रहती हैं, किंतु स्त्रियों के साथ किये जाने वाले भेदभाव की बात को विशेष तौर पर अक्सर उठाया जाता है । फलतः उक्त वचन लोगों के मुख से प्रायः सुनने को मिल जाता है ।

उक्त वचन मनुस्मृति के हैं जो एक विवादास्पद ग्रंथ माना जाता है, फिर भी जिस पर हिंदू समाज के नियम-कानून कुछ हद तक आधारित हैं । मैंने सुना है कि समाज में व्याप्त कुछएक विकृतियों की जड़ में यह ग्रंथ भी है । मेरा विचार है कि यथाशीघ्र इस ग्रंथ का अध्ययन करूं और देखूं कि उसमें कितना कुछ आपत्तिजनक है । फिलहाल मेरी दृष्टि में उक्त कथन और उससे संबद्ध पांच श्लोकों पर गयी तो सोचा कि उनका उल्लेख इस स्थल पर करूं । ये श्लोक आगे दिये जा रहे हैं (मनुस्मृति अध्याय ३, श्लोक ५६-६०):

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।।५६।।

[यत्र तु नार्यः पूज्यन्ते तत्र देवताः रमन्ते, यत्र तु एताः न पूज्यन्ते तत्र सर्वाः क्रियाः अफलाः (भवन्ति) ।]

जहां स्त्रीजाति का आदर-सम्मान होता है, उनकी आवश्यकताओं-अपेक्षाओं की पूर्ति होती है, उस स्थान, समाज, तथा परिवार पर देवतागण प्रसन्न रहते हैं । जहां ऐसा नहीं होता और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहां देवकृपा नहीं रहती है और वहां संपन्न किये गये कार्य सफल नहीं होते हैं ।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।।५७।।

[यत्र जामयः शोचन्ति तत् कुलम् आशु विनश्यति, यत्र तु एताः न शोचन्ति तत् हि सर्वदा वर्धते ।]

जिस कुल में पारिवारिक स्त्रियां दुर्व्यवहार के कारण शोक-संतप्त रहती हैं उस कुल का शीघ्र ही विनाश हो जाता है, उसकी अवनति होने लगती है । इसके विपरीत जहां ऐसा नहीं होता है और स्त्रियां प्रसन्नचित्त रहती हैं, वह कुल प्रगति करता है । (परिवार की पुत्रियों, बधुओं, नवविवाहिताओं आदि जैसे निकट संबंधिनियों को ‘जामि’ कहा गया है ।)

जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः ।
तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ।।५८।।

[अप्रतिपूजिताः जामयः यानि गेहानि शपन्ति, तानि कृत्या आहतानि इव समन्ततः विनश्यन्ति ।]

जिन घरों में पारिवारिक स्त्रियां निरादर-तिरस्कार के कारण असंतुष्ट रहते हुए शाप देती हैं, यानी परिवार की अवनति के भाव उनके मन में उपजते हैं, वे घर कृत्याओं के द्वारा सभी प्रकार से बरबाद किये गये-से हो जाते हैं । (कृत्या उस अदृश्य शक्ति की द्योतक है जो जादू-टोने जैसी क्रियाओं के किये जाने पर लक्षित व्यक्ति या परिवार को हानि पहुंचाती है ।)

तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः ।
भूतिकामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च ।।५९।।

[तस्मात् भूतिकामैः नरैः एताः (जामयः) नित्यं सत्कारेषु उत्सवेषु च भूषणात् आच्छादन-अशनैः सदा पूज्याः ।]

अतः ऐश्वर्य एवं उन्नति चाहने वाले व्यक्तियों को चाहिए कि वे पारिवारिक संस्कार-कार्यों एवं विभिन्न उत्सवों के अवसरों पर पारिवार की स्त्रियों को आभूषण, वस्त्र तथा सुस्वादु भोजन आदि प्रदान करके आदर-सम्मान व्यक्त करें ।

सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च ।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ।।६०।।

[यस्मिन् एव कुले नित्यं भार्यया भर्ता सन्तुष्टः, तथा एव च भर्त्रा भार्या, तत्र वै कल्याणं ध्रुवम् ।]

जिस कुल में प्रतिदिन ही पत्नी द्वारा पति संतुष्ट रखा जाता है और उसी प्रकार पति भी पत्नी को संतुष्ट रखता है, उस कुल का भला सुनिश्चित है । ऐसे परिवार की प्रगति अवश्यंभावी है । – योगेन्द्र

8 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Srinivasa
    सितम्बर 12, 2009 @ 18:57:51

    उन्नतम निबन्ध। योगेन्द्रवर्य शिक्षित नारियों की आधुनिक समाज में स्थिति और उनके समस्याओं के बारे में भी कुछ लिखें तो बहुत अच्छा होगा।

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  2. Arvind kumar dwivedi
    अक्टूबर 21, 2009 @ 09:06:24

    welcome very good your coment. thanks

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  3. सत्यव्रत सिंह
    जून 27, 2012 @ 15:50:52

    अति उत्तम संग्रह

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  4. NITIN JOSHI
    दिसम्बर 24, 2012 @ 00:28:43

    इन श्लोको में कुछ आपत्तिजनक है क्या…ये खुलासा भी आपने किया होता तो उचित होता क्योकि आपकी शुरुआत “मनुस्मृति विवादित गृन्थ” से थी | मुझे तो कुछ भी विवादित नही दिखाई पढ़ रहा…

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  5. अविनाश धारीवाल
    मई 19, 2013 @ 21:11:32

    नारी का सर्वप्रथम स्वरुप माता का होता है, यदि माता रुपी स्त्री का ही जो सम्मान ना कर सके, वह नैतिकता अथवा मानवता का पक्षधर होने का केवल ढोंग ही कर केवल आलोचना तथा निंदा करते फिरते हैं.

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  6. ललित
    दिसम्बर 12, 2013 @ 17:45:51

    नारी की पूजा तो सबको करनी ही पड़ती है, चाहे या अनचाहे। वैसे ही जैसे शनि-राहु-केतु की पूजा करनी पड़ती है। शनि मंदिर में ही सबसे ज्यादा भीड़ होती है।

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  7. श्रीनिवास सिंह
    अप्रैल 11, 2014 @ 10:18:27

    आत्म चिन्तन हेतु ऐसे रहस्योद्घाटन हेतु आभार…

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  8. DEVISINGH BADGOTIYA
    फरवरी 27, 2015 @ 12:35:39

    बहुत अच्छा संग्रह

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