कौटिलीय अर्थशास्त्रम् और राजधर्म – प्रजासुखे सुखं राज्ञः …

आचार्य चाणक्य के नाम से प्रायः हर भारतवासी परिचित होगा । उन्हें अवसर के अनुरूप हर प्रकार की नीति अपना सकने वाले एक अतिसफल राजनीतिज्ञ के तौर पर जाना जाता है । उनका काल चौथी सदी ईसवी पूर्व बताया जाता है । वे तत्कालीन यूनानी शासक, सिकंदर महान, के समकालीन थे, जो उनकी सूझबूझ के कारण भारत पर अपने आक्रमण में सफल नहीं हो सका था । चाणक्य ने मगध के तत्कालीन राज्यासीन नंदवंश का उन्मूलन करके मौर्य सामाज्य की संस्थापना की थी और चंद्रगुप्त मौर्य का राज्याभिषेक किया था ।

मैंने दो-चार दिन पूर्व ही कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (संपादक: वाचस्पति गैरोला, प्रकाशक: चौखंबा विद्याभवन, वाराणसी, २००६) का अध्ययन आंरभ किया है । उसमें प्रस्तुत ग्रंथ-परिचय में मुझे आचार्य चाणक्य के संदर्भ में विष्णुपुराण-आधारित अधोलिखित एक रोचक प्रकरण पढ़ने को मिला हैः
“महाभदन्तः तत्पुत्रास्चैकं वर्षशतमवनीपतयो भविष्यन्ति । नवैव । तान्नन्दान् कौटिल्यो ब्राह्मणः समुद्धधरिष्यति । तेषामभावे मौर्याश्च पृथ्वीं भोक्ष्यन्ति । कौटिल्य एव चन्द्रगुप्तं राज्ये९भिषेक्ष्यति । तस्यापि पुत्रो बिन्दुसारो भविष्यति । तस्याप्यशोकवर्धनः ।” ( “महाभदन्त और उसके नौ पुत्र एक सौ वर्ष तक धरती पर राज करेंगे । उन नन्दवंशीयों को कौटिल्य नामक ब्राह्मण विनाश करेगा । उनके अभाव में मौर्यवंशीय पृथ्वी का भोग करेंगे । कौटिल्य ही चन्द्रगुप्त को राज्याभिषेक करेगा । उस चंद्रगुप्त का पुत्र बिन्दुसार होगा और उसका पुत्र अशोकवर्धन ।) विष्णुपुराण अपेक्षतया प्राचीन माना जाता है, तदनुसार इस प्रकरण को भविष्य की घटना की पूर्वघोषणा के रूप में देखा जा सकता है ।

चाणक्य का असली नाम (परिवार द्वारा परंपरानुसार प्रदत्त) विष्णुगुप्त बताया जाता है । उनको चाणक्य नाम अपने पिता चणक के कारण मिला था । प्राचीन काल में व्यक्ति को माता-पिता या परिवार पर आधारित नाम से भी पुकारने की परंपरा रही है, यथा सुमित्रा-पुत्र सौमित्र (लक्ष्मण), वसुदेव-पुत्र वासुदेव (कृष्ण), पृथा-पुत्र पार्थ (अर्जुन), आदि । एक कुटिल राजनीतिज्ञ के नाते उन्हें कौटिल्य नाम से भी जाना जाता है । ‘ कौटिलीय अर्थशास्त्रम्’ अथवा कौटिल्य अर्थशास्त्र उनकी ही एक रचना है, जिसमें उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक विषयों से संबद्ध विचारों का संकलन किया है । ग्रंथ के आरंभ में उन्होंने कहा हैः
“पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थशास्त्राणि पूर्वाचार्यैः प्रस्थापितानि प्रायशस्तानि संहृत्यैकमिदमर्थशास्त्रं कृतम् ।” (पृथवीगत संपदा को पाने तथा उसकी रक्षा करने से संबंधित जितने भी शास्त्र पूर्व के आचार्यों ने रचे हैं प्रायः उनके सारसंकलन के रूप में यह अर्थशास्त्र लिखा गया है ।)

यह कौटिलीय अर्थशास्त्र अधिकांशतः गद्य रूप में निबद्ध है, किंतु उसमें कहीं-कहीं श्लोक भी लिखित हैं । इसी ग्रंथ में एक स्थल पर राजा के कर्तव्यों की व्यापक चर्चा की गयी है । उसी संदर्भ में निम्नलिखित तीन श्लोक (कौटिलीय अर्थशास्त्र, प्रथम अधिकरण (विनयाधिकारिक), प्रकरण १५) मुझे प्रासंगिक लगते हैंः

(१)
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम् ।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ।।

{राज्ञः सुखं प्रजासुखे, प्रजानां च हिते (तस्य) हितम्, आत्मप्रियं राज्ञः हितं न, (अपि) तु प्रजानां प्रियं हितम् ।}

प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है; अर्थात् जब प्रजा सुखी अनुभव करे तभी राजा को संतोष करना चाहिए । प्रजा का हित ही राजा का वास्तविक हित है । वैयक्तिक स्तर पर राजा को जो अच्छा लगे उसमें उसे अपना हित न देखना चाहिए, बल्कि प्रजा को जो ठीक लगे, यानी जिसके हितकर होने का प्रजा अनुमोदन करे, उसे ही राजा अपना हित समझे ।
(२)
तस्मान्नित्योत्थितो राजा कुर्यादर्थानुशासनम् ।
अर्थस्य मूलमुत्थानमनर्थस्य विपर्ययः ।।

{तस्मात् नित्य-उत्थितः राजा अर्थ-अनुशासनम् कुर्यात्, उत्थानम् अर्थस्य मूलम्, विपर्ययः (च) अनर्थस्य (कारणम्) ।}

अतः उक्त बातों के मद्देनजर राजा को चाहिए कि वह प्रतिदिन उन्नतिशील-उद्यमशील होकर शासन-प्रशासन एवं व्यवहार के दैनिक कार्यव्यापार संपन्न करे । अर्थ यानी संपदा-संपन्नता के मूल में उद्योग में संलग्नता ही है, इसके विपरीत लापरवाही, आलस्य, श्रम का अभाव आदि अनर्थ (संपन्नता के अभाव या हानि) के कारण बनते हैं ।
(३)
अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च ।
प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम् ।।

{अनुत्थाने प्राप्तस्य अनागतस्य च नाशः ध्रुवः, उत्थानात् फलम् प्राप्यते, अर्थ-सम्पदम् च लभते ।}

यदि राजा उद्योगरत तथा विकास-कार्यों के प्रति सचेत न हो तब जो धनसंपदा-पूंजी उसके पास पहले से मौजूद हो और जो कुछ भविष्य के गर्त में मिल सकने वाला हो (अनागत), उन दोनों, का नाश अवश्यंभावी है । सतत प्रयास, श्रम, उद्यम में संलग्न रहने पर ही सुखद फल और वांछित संपदा-संपन्नता प्राप्त होते हैं ।

हम लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था वाले देश के नागरिक हैं । अब पारंपरिक अर्थ में राजा नहीं हैं । आज राजा से क्या अर्थ लिए जाएं ? उच्च स्तर पर जो इस शासकीय व्यवस्था को चला रहे हैं वे ही राजा के तुल्य माने जाने चाहिए । अतः राजा से जो अपेक्षाएं ऊपर बताई गयी हैं वे इन आधुनिक ‘राजाओं’/शासकों पर लागू होती हैं । उन्हें ही प्रजा अर्थात् जनता के सामूहिक हितों का ध्यान रखना चाहिए और उन्हीं को अपनी वैयक्तिक रुचियों को जानकांक्षाओं से सामने त्याग देना चाहिए । राजा उद्यमशील रहे कहा जाता है तो उसके निहितार्थ अपने कर्तव्यों के अनुरूप सचेष्ट रहना समझा जाना चाहिए । वह अपने अधीनस्थों को समुचित कार्य में संलग्न रखे यह तात्पर्य है । दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा है । हमारे शासक मौजूदा व्यवस्था को अपने हितों को साधनेे के अवसर के रूप में देखते हैं । उनकी सोच में अंतर आवे यही कामना की जा सकती है । – योगेन्द्र

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