क्षमादान सदैव उचित नहीं – महाकाव्य महाभारत में युधिष्ठिर के प्रति द्रौपदी की सलाह

महाकाव्य महाभारत के वन पर्व में पांडवों के बारह-वर्षीय वनवास के समय उनके द्वारा भोगे गये कष्टों का वर्णन है । ध्यान रहे कि कौरवों के साथ खेले गये जुए में युधिष्ठिर के हार जाने के बाद सभी पांडवों को बारह वर्ष के वनवास एवं तदनंतर एक वर्ष के गुप्त वास पर जाना पड़ा था । वनवास काल में उन्हें तरह-तरह की परेशानियां झेलनी पड़ी थीं । युधिष्ठिर के चारों भाई एवं द्रौपदी यह महसूस करते थे कि उनकी दुःसह स्थिति के लिए युधिष्ठिर ही पूर्णतः उत्तरदायी हैं । वे इस तथ्य का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष उल्लेख यदाकदा कर युधिष्ठिर के समक्ष कर लेते थे । इस मामले में द्रौपदी सबसे अधिक मुखर थी । कई ऐसे प्रकरण हैं जिनमें उसके मुख से युधिष्ठिर के प्रति उलाहना के शब्द निकले हैं या उसने दोषारोपण किया है ।

वन पर्व के २८वें अध्याय में एक प्रसंग वर्णित है जिसमें द्रौपदी युधिष्ठिर को प्रेरित करती है कि वह कौरवों को उनकी करतूतों के लिए सजा दे । कौरवों की बारबार की धोखाधड़ी को वह क्षमा न करे । युधिष्ठिर की अति सत्यवादिता, उदारता तथा क्षमाशीलता को वह अनुचित मानती थी । वह युधिष्ठिर को यह समझाने का प्रयास करती है कि हर किसी को क्षमा नहीं किया जाना चाहिए, उस व्यक्ति को तो कतई नहीं जो जानबूझकर धोखा देता हो और अपराध करता हो । अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए वह राक्षसराज प्रह्लाद और उनके पौत्र राजा बलि (विरोचन पुत्र) के बीच के संवाद का जिक्र करती है । विरोचनकुमार बलि द्वारा जिज्ञासा व्यक्त करने पर पितामह प्रह्लाद उसे नीति संबंधी बातें बताते हैं । उसी क्रम में वे कौन क्षमा का पात्र होता है ओर कौन नहीं की बात समझाते हैं । तत्संबंधित बातें उक्त अध्याय के निम्नांकित चार श्लोकों में स्पष्ट की गयी हैं (महाभारत, वनपर्व, अध्याय २८):

अबुद्धिमाश्रितानां तु क्षन्तव्यमपराधिनाम् ।
न हि सर्वत्र पाण्डित्यं सुलभं पुरुषेण वै ।।२७।।
{अबुद्धिम् आश्रितानाम् अपराधिनाम् तु क्षन्तव्यम्, पुुरुषेण सर्वत्र पाण्डित्यम् सुलभम् न हि वै ।}
अनजाने में अर्थात् समुचित् सोच-विचार किए बिना जिन्होंने अपराध किया हो उनका अपराध क्षमा किया जाना चाहिए, क्योंकि हर मौके या स्थान पर समझदारी मनुष्य का साथ दे जाए ऐसा हो नहीं पाता है । भूल हो जाना असामान्य नहीं, अतः भूलवश हो गये अनुचित कार्य को क्षम्य माना जाना चाहिए ।

अथ चेद् बुद्धिजं कृत्वा ब्रूयुस्ते तदबुद्धिजम् ।
पापान् स्वल्पेऽपि तान् हन्यादपराधे तथानृजून् ।।२८।

{अथ चेद् बुद्धिजं कृत्वा ते तत् अबुद्धिजम् ब्रूयुः, सु-अल्पे अपि अपराधे तान् तथा अनृजून् पापान् हन्यात् ।}

अब यदि बुद्धि प्रयोग से यानी सोच-समझकर अपराध करने के बाद वे तुमसे कहें कि अनजाने में ऐसा हो गया है, तो ऐसे मृथ्याचारियों को थोड़े-से अपराध के लिए भी दण्डित किया जाना चाहिए । कुछ मनुष्य जानबूझकर आपराधिक कृत्यों में लगे रहते हैं । अपने उद्येश्य में असफल होने और पकड़ में आ जाने पर वे स्वयं को निरीह और निर्दोष बताने लगते हैं । ऐसे लोगों के प्रति उदारता नहीं दिखानी चाहिए ।

सर्वस्यैकोऽपराधस्ते क्षन्तव्यः प्राणिनो भवेत् ।
द्वितीये सति वध्यस्तु स्वल्पेऽप्यपकृते भवेत् ।।२९।।
{सर्वस्य प्राणिनः एकः अपराधः ते क्षन्तव्यः भवेत्, स्वल्पे अपि अपकृते द्वितीये सति वध्यः तु भवेत् ।}
सभी प्राणियों (प्रसंगानुसार मनुष्य) का एक अपराध तुम्हें क्षमा कर देना चाहिए, किंतु दूसरी बार अनुचित् कर्म किये जाने पर अवश्य उनको दण्डित करना चाहिए । पहिली बार अपराध करने पर क्षमा कर देना समझ में आता है, लेकिन जब व्यक्ति दूसरे की क्षमाशीलता का अनुचित लाभ उठाते हुए दुबारा-तिबारा गलत काम करे तो उसे छोड़ा नहीं जाना चाहिए ।

अजानता भवेत् कश्चिदपराधः कृतो यदि ।
क्षन्तव्यमेव तस्याहुः सुपरीक्ष्य परीक्षया ।।३०।।

{यदि कश्चित् अपराधः अजानता कृतः भवेत्, परीक्षया सुपरीक्ष्य एव तस्य क्षन्तव्यम् आहुः ।}

यदि वास्तव में अज्ञानवश कोई अपराध हो गया हो और समुचित् जांच-पड़ताल के बाद वह अनजाने में की गयी भूल सिद्ध हो जाए, तो उस कृत्य को क्षमायोग्य कहा गया है । भूल दुबारा-तिबारा भी हो सकती है और तदनुसार आरोपी अपने को निर्दोष बताये तो उसका ऐसा करना स्वाभाविक ही होगा । ऐसे अवसरों पर अपराध की बारीकी से छानबीन की जानी चाहिए और अगर यह सिद्ध हो जाये कि भूल से अनुचित कार्य हो गया, तो व्यक्ति को माफ कर देना चाहिए । वस्तुतः सभी सभ्य समाजों की न्यायिक व्यवस्था इसी नीति पर टिकी है ।

उक्त नीति वचनों में अपराधी को माफ न करने की बातें कही गयी हैं । यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी को दंडित करने से पूर्व यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आरोपी ने इरादतन अनुचित कार्य किया है या उससे भूल हो गयी । इस उद्येश्य के लिए समुचित छानबीन की व्यवस्था होनी चाहिए यह मत भी इन श्लोकों में निहित है । स्पष्ट है कि अंततोगत्वा महत्त्व होता है जांच करने वालों की निष्ठा और उनकी कार्यक्षमता का । यदि वे ईमानदारी न बरतें या उन्हें जांच करने की कला न आती हो तो उल्टा-सीधा हो सकता है । आज के समय में अपने देश में कुछ ऐसा ही हो रहा है । जहां आपराधिक वृत्तियों में लिप्त जन बारबार पकड़े जाने पर भी अदंडित छोड़ दिये जा रहे हैं, वहीं कई निरपराधियों को अकारण सजा मिल रही है । किसे क्षमा मिले और किसे सजा इसका सही निर्णय कहीं नहीं हो रहा है । – योगेन्द्र जोशी

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