‘नाराजके जनपदे …’: राजा के अभाव में राज्य का असुरक्षित हो जाना – बाल्मीकिरचित रामायण में प्रस्तुत विचार

महर्षि बाल्मीकि द्वारा रचित रामायण ग्रंथ में एक प्रकरण है । महाराजा दशरथ कैकेयी को दिये गये वचनों से बंधे होने के कारण न चाहते हुए भी श्रीराम को वनवास पर भेज देते हैं । तत्पश्चात् वे उनके असह्य वियोग में स्वयं प्राण त्याग देते हैं । यह सब घटित होता है श्रीभरत की अनुपस्थिति में, जो अपने नाना केकय-नरेश अश्वपति के पास गये हुए रहते हैं । महाराजा की मृत्यु से राज्य राजाविहीन हो जाता है । अराजकता की स्थिति पैदा होने लगती है, जिसे आज की भाषा में ‘संवैधानिक संकट’ कहा जाएगा । तब राज्य के ऋषिगण और महात्माजन राजपुरोहित ऋषि बशिष्ठ के पास एकत्रित हो उनसे निवेदन करते हैं कि वे श्रीभरत को शीघ्र ही अपने ननिहाल से बुलाने की व्यवस्था करें और उनका राज्याभिषेक करें ।

उस समय वे सभी शिष्टजन राजपुरोहित के समक्ष राजाविहीन राज्य की क्या स्थिति हो जाती है इस बात का वर्णन करते हैं । रामायण के अयोध्याकांड, सर्ग ६७ में इसी विषय की चर्चा की गई है । उक्त सर्ग में ३८ श्लोक हैं, जिनमें लगभग सभी के सभी में ‘अराजकता’ की चिंतनीय स्थिति का वर्णन है । मैं यहा पर चुने हुए ६ श्लोक प्रस्तुत कर रहा हूं (सभी श्लोक बाल्मीकीय रामायण, अयोध्याकांड, सर्ग ६७, से उद्धृत):

नाराजके जनपदे धनवन्तः सुरक्षिताः ।
शेरते विवृतद्वाराः कृषिगोरक्षजीविनः ।।१८।।
अराजके जनपदे धनवन्तः न सुरक्षिताः (न च) कृषिगोरक्षजीविनः विवृत-द्वाराः शेरते ।
बिना राजा के राज्य में धनी जन सुरक्षित नहीं रह पाते हैं और न ही कृषिकार्य एवं गोरक्षा (गोपालन) से आजीविका कमाने वाले लोग ही दरवाजे खुले छोड़कर सो सकते हैं । अर्थात् राजा न होने पर सर्वत्र असुरक्षा फैल जाती है और चोरी-छीनाझपटी जैसी घटनाओं का उन्हें सामना करना पड़ता है ।

नाराजके जनपदे वाहनैः शीर्घवाहिभिः ।
नरा निर्यान्त्यरण्यानि नारीभिः सह कामिनः ।।१९।।
अराजके जनपदे कामिनः नराः नारीभिः सह शीर्घवाहिभिः वाहनैः अरण्यानि न निर्यान्ति ।
बिना राजा के राज्य में स्त्रियों के प्रति आसक्त पुरुषगण नारियों के साथ शीघ्रगामी वाहनों के द्वारा वनविहार (मौजमस्ती) के लिए नहीं निकल सकते । राजाविहीन राज्य में प्रेमी युगल निर्भय होकर वनों-उपवनों में घूमने-फिरने का साहस नहीं रख सकते, क्योंकि उन्हें असामाजिक तत्वों का भय सताता है ।

नाराजके जनपदे वणिजो दूरगामिनः ।
गच्छन्ति क्षेममध्वानं बहुपण्यसमाचिताः ।।२२।।
अराजके जनपदे बहुपण्य-समाचिताः दूरगामिनः वणिजः क्षेमम् अध्वानं न गच्छन्ति ।
बिना राजा के राज्य में दूर-दूर तक व्यापार करने वाले वैश्यजन विक्रय हेतु चुनी गई बहुत-सी वस्तुएं लेकर सकुशल मार्ग तय नहीं करते । यानी उन्हें मार्ग में लुटेरों द्वारा लूटे जाने का डर रहता है ।

नाराजके जनपदे योगक्षेमः प्रवर्तते ।
न चाप्यराजके सेना शत्रून् विषहते युधि ।।२४।।
अराजके जनपदे योग-क्षेमः न प्रवर्तते, अपि च अराजके सेना युधि शत्रून् न विषहते ।
बिना राजा के राज्य में लोगों की सत्कर्म में संलग्नता एवं उनकी कुशलता (योगक्षेम) प्राप्त नहीं होती है, और न ही सेना राष्ट्र की सुरक्षा में शत्रुओं से लड़ पाती है । तब लोगों में सत्कर्म के प्रति लगाव और अनुचित कर्म में भय का भाव नहीं रह पाता है । सेना भी शत्रु से लड़ने का उत्साह खो बैठती है ।

नाराजके जनपदे हृष्टैः परमवाजिभिः ।
नरा संयान्ति सहसा रथैश्च प्रतिमण्डिताः ।।२५।।
अराजके जनपदे च नरा हृष्टैः परमवाजिभिः प्रतिमण्डिताः रथैः सहसा न संयान्ति ।
बिना राजा के राज्य में लोग आभूषणों के सजधजकर हृष्ट-पुष्ट उत्तम घोड़ों एवं रथों से सहसा (जब इच्छा हो तब) यात्रा नहीं करते । तब असुरक्षित मार्ग में लुटेरों के भय से वे यात्रा करने से बचते हैं ।

नाराजके जनपदे स्वकं भवति कस्यचित् ।
मत्स्या इव जना नित्यं भक्षयन्ति परस्परम् ।।३१।।
अराजके जनपदे कस्यचित् स्वकं न भवति, मत्स्याः इव जनाः नित्यं परस्परम् भक्षयन्ति ।
बिना राजा के राज्य में कोई व्यक्ति किसी का अपना नहीं रह जाता है और लोग एक-दूसरे को मछलियों की भांति खाने लगते हैं । राजा के अभाव में सामाजिक संबंध भी टूटने लगते हैं । समर्थ जन निरंकुश तथा भयमुक्त हो जाते हैं और वे कमजोर व्यक्तियों पर अत्याचार करने लगते हैं । ऐसे में बड़ी मछली द्वारा छोटी को आहार बना लेना जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है ।

पूर्वकाल में संपूर्ण शासकीय व्यवस्था राजा पर केंद्रित रहती थी । राजकाज की सफलता उसके व्यक्तित्व पर निर्भर करती थी । राजा से अपेक्षा रहती थी कि वह चरित्रवान हो, दृढ़ संकल्प वाला हो, जनता के हितों के प्रति समर्पित हो, ज्ञानी एवं अनुभवी जनों का सम्मान करता हो तथा उनसे राय लेता हो, आपराधिक वृत्ति में लिप्त जनों को दंड देने में विलंब न करता हो, इत्यादि । प्राचीन ग्रंथों में जिन राजाओं की प्रशंसात्मक चर्चा होती है वे इसी प्रकार के व्यक्ति थे । जब ऐसा राजा न रहे तो दुर्व्यवस्था जन्म लेने लगती है यही संदेश इन था अन्य श्लोकों में निहित है ।

आज राजा नहीं रह गये हैं । हम लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था में रह रहे हैं । राजा का स्थान अब नये प्रकार के शासकों ने ले ली है । शासकीय व्यवस्था अब इन नये ‘राजाओं’ के आचरण पर निर्भर करता है । जब वे अपने कर्तव्य भूल जाते हैं, जनता के प्रति असंवेदन हो जाते हैं, आपराधिक वृत्ति के लोगों पर अंकुश लगाने का संकल्प नहीं ले पाते हैं, और उचितानुचित का विवेक खो बैठते हैं, तब ‘अराजकता’ की स्थिति पैदा हो जाती है । आज हमारे देश में कुछ ऐसा ही हो रहा है । वर्तमान काल में हमारे राजा-तुल्य शासक केवल कुर्सी पर बैठना जानते हैं, न कि उसकी गरिमा के अनुसार कर्म करने में । – योगेन्द्र जोशी

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: