यावत् जीवेत् सुखं जीवेत् …: चार्वाक दर्शन (लोकायत)

मानव जीवन का सबसे प्राचीन दर्शन (philosophy of life) कदाचित् चार्वाक दर्शन है, जिसे लोकायत या लोकायतिक दर्शन भी कहते हैं । लोकायत का शाब्दिक अर्थ है ‘जो मत लोगों के बीच व्याप्त है, जो विचार जनसामान्य में प्रचलित है ।’ इस जीवन-दर्शन का सार निम्नलिखित कथनों में निहित है:

यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् ।

भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ।।

त्रयोवेदस्य कर्तारौ भण्डधूर्तनिशाचराः ।

(स्रोत: ज्ञानगंगोत्री, संकलन एवं संपादन: लीलाधर शर्मा पांडेय, ओरियंट पेपर मिल्स, अमलाई, म.प्र., पृष्ठ 138)
मनुष्य जब तक जीवित रहे तब तक सुखपूर्वक जिये । ऋण करके भी घी पिये । अर्थात् सुख-भोग के लिए जो भी उपाय करने पड़ें उन्हें करे । दूसरों से भी उधार लेकर भौतिक सुख-साधन जुटाने में हिचके नहीं । परलोक, पुनर्जन्म और आत्मा-परमात्मा जैसी बातों की परवाह न करे । भला जो शरीर मृत्यु पश्चात् भष्मीभूत हो जाए, यानी जो देह दाहसंस्कार में राख हो चुके, उसके पुनर्जन्म का सवाल ही कहां उठता है । जो भी है इस शरीर की सलामती तक ही है और उसके बाद कुछ भी नहीं बचता इस तथ्य को समझकर सुखभोग करे, उधार लेकर ही सही । तीनों वेदों के रचयिता धूर्त प्रवृत्ति के मसखरे निशाचर रहे हैं, जिन्होंने लोगों को मूर्ख बनाने के लिए आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य जैसी बातों का भ्रम फैलाया है ।

चार्वाक सिद्धांत का कोई ग्रंथ नहीं है, किंतु उसका जिक्र अन्य विविध दर्शनों के प्रतिपादन में मनीषियों ने किया है । उपरिलिखित कथन का मूल स्रोत क्या है इसकी जानकारी अभी मुझे नहीं हैं । मुझे यह ‘ज्ञानगंगोत्री’ नामक ग्रंथ में पढ़ने को मिला ।

माना जाता है कि ‘लोकायत’ विचार का कोई प्रणेता नहीं है, लेकिन इसे दर्शन रूप में स्थापित करने का श्रेय आचार्य बृहस्पति को दिया जाता है, जो कदाचित् देवगुरु बृहस्पति से भिन्न थे । चार्वाक को उनका शिष्य बताया जाता है, जिसने इस विशुद्ध भौतिकवादी विचारधारा को प्रचारित-प्रसारित किया । शायद इसीलिए उसका नाम इस दर्शन से जुड़ गया । यह भी माना जाता है कि चार्वाक नाम भी उसका मौलिक नाम नहीं था । मेरे पास उपलब्ध शब्दकोश में इस नाम की व्याख्या इस प्रकार दी गयी है:

चारुः लोकसम्मतो वाको वाक्यं यस्य (सः चारुवाकः)

(संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, वामन शिवराम आप्टे, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, 2006)
अर्थात् लोकलुभावन और आम जन को प्रिय लगने वाले वचन कहता हो, प्रचारित करता हो, वह चारुवाक । कालांतर में यही बदलकर चार्वाक हो गया । जो सीधे तौर में समझ आये और सुविधाजनक लगे जीवन का वैसा रास्ता जो दिखाये वह चार्वाक ।

चार्वाक दर्शन नास्तिकवादी एवं अनीश्वरवादी है । इस दर्शन के अनुसार जो भी इंद्रियगम्य है, जिसके अस्तित्व का ज्ञान देख-सुनकर अथवा अन्य प्रकार से किया जा सकता है, वही वास्तविक है । जिस ज्ञान को चिंतन-मनन से मिलने की बात कही जाती है, वह भ्रामक है, मिथ्या है, महज अनुमान पर टिका है । आत्मा-परमात्मा जैसी कोई चीज होती ही नहीं है, अतः पाप-पुण्य नर्क-स्वर्ग का कोई अर्थ ही नहीं है ।

चार्वाक सिद्धांत चार तत्वों, ‘पृथ्वी’, ‘जल’, ‘अग्नि’, एवं ‘वायु’ को मान्यता देता है । समस्त जीव-निर्जीव तंत्र/पदार्थ इन्हीं के संयोग से बने हैं । स्थूल वस्तुओं/जीवों की रचना में ‘आकाश’ का भी कोई योगदान नहीं रहता है, अतः उसे यह पांचवें तत्व के रूप में नहीं स्वीकारता है । (ध्यान रहे कि कई दर्शन पांच महाभूतों को भौतिक सृष्टि का आधार मानते हैं: ‘क्षितिजलपावकगगनसमीरा’) । चार्वाक के अनुसार मनुष्यों एवं अन्य जीवों की चेतना इन्हीं मौलिक तत्वों के परस्पर मेल से उत्पन्न होती है । जब शरीर अपने अवयवों में बिखर जाता है तो उसके साथ यह चेतना भी लुप्त हो जाती है । इस विचार को स्पष्ट करने के लिए चार्वाक का अधोलिखित कथन विचारणीय है:

जडभूतविकारेषु चैतन्यं यत्तु दृश्यते ।

ताम्बूलपूगचूर्णानां योगाद् राग इवोत्थितम् ।।

(स्रोत: भारतीय दर्शनशास्त्र का इतिहास, लेखक: हरिदत्त शास्त्री, साहित्य भंडार, मेरठ, 1966, पृष्ठ 63)

अर्थात् जिस प्रकार पान के पत्ते तथा सुपाड़ी के चूर्ण के संयोग से लाल रंग होंठों पर छा जाता है, उसी प्रकार इन चेतनाशून्य घटक तत्वों के परस्पर संयोग से चेतना की उत्पत्ति होती है । यानी चेतना आत्मा या तत्तुल्य किसी अन्य अभौतिक सत्ता की विद्यमानता से नहीं आती है । विभिन्न पदार्थों के सेवन से चेतना की तीव्रता कम-ज्यादा हो जाती है, जिससे स्पष्ट है कि ये ही पदार्थ चेतना के कारण हैं ।

चार्वाक दर्शन वस्तुतः आज का विज्ञानपोषित भौतिकवाद है, जिसकी मान्यता है कि समस्त सृष्टि भौतिक पदार्थ और उससे अनन्य रूप से संबद्ध ऊर्जा का ही कमाल है । पदार्थ से ही जीवधारियों की रचना होती है । उसमें किसी अभौतिक सत्ता की कोई भूमिका नहीं है । विशुद्ध चेतनाहीन पदार्थ से ही जटिल एवं जटिलतर जीवों की रचना हुई है । जीव-रचना की जटिलता के ही साथ चेतना का भी उदय हुआ है । ऐसी संरचना के निरंतर विकास के फलस्वरूप मानव जैसा चेतन और बुद्धियुक्त जीव का जन्म हुआ है । वैज्ञानिकों का एक वर्ग इस विचारधारा का पक्षधर है कि चेतना का मूल कारण भौतिकी के ही प्राकृतिक नियमों में छिपा है । चेतना का उदय कब और कैसे होता है यह अवश्य इन विज्ञानियों के लिए अभी अबूझ पहेली है ।

आधुनिक विज्ञान पदार्थमूलक है । अध्यात्म से उसका कोई संबंध नहीं है । आज के विज्ञानमूलक भौतिक दर्शन, जिसमें सब कुछ पदार्थगत है, को चार्वाक दर्शन का परिष्कृत दर्शन कह सकते हैं, क्योंकि यह भौतिक तंत्रों/घटनाओं की तर्कसम्मत व्याख्या कर सकता है । अवश्य ही यह चार्वाक के चार तत्वों पर नहीं टिका है । सभी वैज्ञानिक चार्वाक सिद्धांत को यथावत् नहीं मानते हैं । उनमें कई ईश्वर तथा जीवात्मा जैसी चीजों को मानते हैं ।

‘लोकायत’ के मतावलंबियों को अक्सर ‘चार्वाक’ भी कहते हैं । चार्वाकों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है: (1) धूर्त, एवं (2) सुशिक्षित । ‘यह शरीर जब तक है, तभी तक सब कुछ है, उसके बाद कुछ नहीं रहता’ के सिद्धांत के कारण लोकायत में पाप-पुण्य, नैतिकता आदि जैसी बातों का कोई ठोस आधार न होते हुए भी ‘सुशिक्षित’ चार्वाक सुव्यवस्थित मानव समाज की रचना के पक्षधर होते हैं । दूसरी तरफ ‘धूर्त’ चार्वाकों के लिए ‘खाओ-पिओ मौज करो, और उसके लिए सब कुछ जायज है’ की नीति पर चलते हैं । उनके लिए सुखप्राप्ति एकमेव जीवनोद्येश्य रहता है । कोई भी कर्म उनके लिए गर्हित, त्याज्य या अवांछित नहीं होता है । और ऐसे जनों की इस धरती पर कोई कमी नहीं होती है ।

मेरा अपना आकलन है कि इस दुनिया में 90 प्रतिशत से अधिक लोग चार्वाक सिद्धांत के अनुरूप ही जीवन जीते हैं । यद्यपि वे किसी न किसी आध्यात्मिक मत में आस्था की बात करते हैं, किंतु उनकी धारणा गंभीरता से विचारी हुई नहीं होती, महज सतही होती है, एक प्रकार का ‘तोतारटंत’, एक प्रकार की भेड़चाल में अपनाई गयी नीति । चूंकि दुनिया में लोग ऐसा या वैसा मानते हैं, अतः हम भी मानते हैं वाली बात उन पर लागू होती है । अन्यथा तथ्य यह है कि प्रायः हर व्यक्ति इसी धरती के सुखों को बटोरने में लगा हुआ है । अनाप-शनाप धन-संपदा अर्जित करना, और भौतिक सुखों का आनंद पाना यही लगभग सभी का लक्ष्य रह गया है । मानव समाज में जो भी छोटे-बड़े अपराध देखने को मिलते हैं वे अपने लिए सब कुछ बटोरने की नियत से किये जाते हैं । हमारे कृत्य से किसी और को क्या कष्ट होगा इसका कोई अर्थ नहीं है । मेरा काम जैसे भी निकले वही तरीका जायज है की नीति सर्वत्र है । इस जीवन से परे भी क्या कुछ है इस प्रश्न को हर कोई टाल देना पसंद करता है । और कर्मकांडों के तौर पर कहीं कुछ होता है तो वह भी अपने, अपने परिवार, अपने लोगों के सुखमय जीवन एवं सुरक्षा की कामना से किया जाता है । यहां तक कि आधुनिक धर्मगुरु भी अपने सुख के लिए चेलों का संगठन तैयार करते हैं; वे अपने परलोक के लिए उतना चिंतित नहीं रहते जितना दूसरों के परलोक के लिए (धोखा देना) । वस्तुतः इस समय सर्वत्र चार्वाक सिद्धांत की ही मान्यता है; आप मानें या न मानें । – योगेन्द्र जोशी

14 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. संगीता पुरी
    जनवरी 12, 2010 @ 16:19:49

    आज अधिकांश लोगों की जीवनशैली चार्वाक के भौतिकवादी दर्शन के अनुसार ही है .. इससे इंकार तो नहीं किया जा सकता .. यह दृष्टिकोण मानवीयता के ख्‍याल से उचित भी नहीं .. पर न तो स्‍वयं और न ही किसी और को उपभोग करने देते हुए बचत की मानसिकता रखना और बुरी बात है .. स्‍वयं भी जीओ और दूसरों को भी आराम से जीने दो .. यही मेरी पसंदीदा जीवनशैली है .. ऊंचाई में रह रहे लोगों को इस दिशा में चिंतन करना चाहिए !!

    प्रतिक्रिया

  2. दिनेशराय द्विवेदी
    जनवरी 12, 2010 @ 17:44:06

    ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्
    यह उक्ति चार्वाकों की न हो कर उन पर थोपी गई अधिक प्रतीत होती है। क्यों कि वे चेतना को पदार्थ से उत्पन्न उसी का एक गुण मानते हैं और परलोक का भय नहीं मानते। लेकिन ईश्वर, परलोक और पुनर्जन्म को तो भगतसिंह भी नहीं मानता था। लेकिन उस ने तो ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् नहीं किया। अपितु उस ने तो इतना कर्जा भारतीय कौम पर छोड़ा है कि सदियों तक भी नहीं चुकाया जा सकेगा।
    वस्तुतः भौतिकवादियों को बदनाम करने के लिए यह कथन उन पर थोपा गया है। वरना लोकायत का तो अर्थ ही यही है कि वह लोगों का, लोक का दर्शन है। लोकायत नाम से देवीप्रसाद चटोपाध्याय की शोध पुस्तक को पढ़ेंगे तो आँखें खुल जाएँगी लोगों की। आप का कहना सही है कि दुनिया का वास्तविक दर्शन जिसे वह व्यवहार में लाती है वह भौतिकवाद ही है। आध्यात्मवाद तो वास्तव में खुद और औरों से ठगी के सिवा कुछ नहीं है।

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    • abhishek
      फरवरी 27, 2015 @ 21:07:06

      आप मुझे वो किताब मिलने का पता अवश्य बताइए. मैं पढना चाहता हूँ. आप पता न बता सकें तो कम से कम प्रकाशन का नाम और उसका पता या फ़ोन नम्बर बताइए. बहुत बहुत धन्यवाद.

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  3. loksangharsha
    जनवरी 12, 2010 @ 17:46:09

    nice

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  4. rajeysha
    जनवरी 12, 2010 @ 18:47:24

    आपकी इस पोस्‍ट से चार्वाक संबंधी कुछ और ज्ञान बढ़ा है, धन्‍यवाद।

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  5. जगसीर
    जनवरी 16, 2010 @ 19:41:45

    मैं हैरान हूँ कि दिनेश राय द्विवेदी द्वारा सुझाई गयी ‘लोकायत’ नाम से देवीप्रसाद चटोपाध्याय की शोध पुस्तक को पढ़े बिना लेखक ने यह उल-जलूल लेख छापने की हिमाकत क्यों की है । अच्छा होता कि उस पुस्तक में शामिल आपत्तिजनक सामग्री पर लेखक अपने विचार रखते । मैंने वह पुस्तक पढ़ी है । भौतिकवाद और अध्यात्मवाद की लड़ाई उतनी ही पुरानी है जितना मेहनतकशों और उनकी मेहनत पर पलनेवाले परजीवी लोगों का समाज । ऋग्वेद, प्रकृति की स्तुति से भरा हुआ है । इस ग्रन्थ में आस्तिकता-नास्तिकता, मोक्ष-गुलामी, भौतिकवाद और अध्यात्मवाद जैसे परस्पर विरोधी अर्थों वाले शब्दों का प्रयोग नहीं हुआ है । इसका कारण क्या है ? मोक्ष की बात तभी हो सकती है जब कोई गुलाम हो, नास्तिकता तभी होती है जब कुछ लोगों ने आस्तिकता, अर्थात उस जमाने के लुटेरे शासकों ने अपनी व्यवस्था के प्रति लोगों से निष्ठा की गारंटी मांगी हो । रामायण और महाभारत की रचना वेदों से बाद की है । यह समय आदिम साम्यवाद के टूटने और वर्गीय समाज के अस्तिव में आने का संक्रमण काल था । क्या कारण है कि हनुमान को अपना सीना चीरकर आदर्श गुलाम होने का सर्टिफिकेट दिखाना पड़ता है और क्यों एक कुत्ता (धर्मराज- उस ज़माने का धर्म कुत्ते के समान स्वामिभक्ति) अपनी स्वामिभक्ति के कारण स्वर्ग में पहुँच जाता है ?

    संगीता पूरी जैसे लोग बीच की स्थिति की वकालत करते हैं – वैसे ही जैसे शोषकों और शोषितों के बीच कुछ बीच की स्थिति होती है । उनसे एक सवाल – क्यों अब तक का वर्गीय समाज अपनी बहुसंख्यक आबादी को भूख से तडफता हुआ देखता रहा है ? वर्तमान, पूंजीवाद तो विज्ञान की विराट शक्तियों का मालिक है परन्तु यहाँ का अल्पसंख्यक शासक वर्ग भी लोगों को भूखे और असहाय रखना चाहता है क्योंकि पूंजीवाद में चलने वाले उत्पादन कार्य के लिए श्रमिक का भूखा होना जरूरी है ताकि वह अपनी श्रम-शक्ति बेचने पर मजबूर हो ।

    प्रत्युत्तर में –
    महोदय, मुझे खेद्द है कि आपको मेरी बातें ऊलजलूल और तदनुसार घोर आपत्तिजनक लगीं | क्षमा करें | लेकिन एक बात अवश्य कहूंगा कि ब्लाग पर किया गया लेखन आवश्यक नहीं कि किसी से राय-मशविरा के बाद किया गया कार्य हो | इसके लिए न कोई संपादक होता है और न ही कोई समकक्ष समालोचक (peer reviewer) जैसा कि शैक्षिक अनुसंधान से संबद्ध शोधलेखों के साथ होता है | लोगों की अपनी-अपनी रुचियों के अनुसार लिखित बातें ब्लागों पर देखने को मिलती हैं | वे कितनी तथ्यात्मक हैं, किसी पाठक समुदाय में उन बातों की कितनी स्वीकार्यता होगी, आदि जैसी बातों के बारे मं ठीक से अंतिम तौर पर कुछ कह पाना सरल नहीं | वस्तुत: अलग-अलग पठकों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं | अभी की जो स्थिति है उसमें सामान्यत: कोई सेंसरशिप नहीं, उन खास स्थितियों को छोड़कर जिसमें ब्लाग की सामग्री समाज के लिए घातक मानी जाती हैं, जैसे अश्लील साहित्य | लोग लिखते हैं, पढ़ने वाले को क्या लगेगा इसके पूर्वानुमान लगाये बिना | इसके अतिरिक्त यह भी सही है कि सामाजिक सरोकार के किसी मुद्दे पर लोगों के बीच मतैक्य का अभाव आम बात है | आप चाहे राजनीति को लें या धार्मिक आस्थाओं को, अथवा सामाजिक परंपराओं को, इत्यादि, आपको सर्वत्र मतभेद मिलेंगे ही | यहां तक कि विज्ञान में भी कभी-कभी मतभेद देखने को मिलते हैं | उदाहरणार्थ पिछली सदी के आरम्भ में जब क्वांटम भौतिकी के विचार जन्म ले रहे थे तो विख्यात विज्ञानी आइंस्टाइन उस विचारधारा को मानने को तैयार नहीं हुए | मतभेद हमारे सामाजिक जीवन का एक अपरिहार्य पहलू है | और वैमत्य को सहज रूप से सहा जा सकता है | समस्या तभी गंभीर होती है जब किसी का कार्य समाज के लिए हानिकारक या घातक होने लगे | (मेरा लेख उस श्रेणी में नहीं आता होगा ऐसा मेरा विश्वास है |) अगर ऐसा न हो रहा हो तो किसी के विचारों को नजरंदाज किया जा सकता है | ‘मैं नहीं मानता’ कहकर अलग हुआ जा सकता है | आशा है कि आप मेरा मंतव्य समझ पा रहे होंगे | जहां तक चटोपाध्यायजी की पुस्तक, लोकायत, का सवाल है, मैनें अभी तक उसे देखा नहीं | कह नहीं सकता कि उसमें क्या लिखा है, किन्तु जितना कुछ मैंने उपरिलिखित वाक्यों में कहा है उसके आधार पर आप सोच ही सकते हैं कि उसमें लिखित बातें मुझे स्वीकर्य ही होंगी ऐसा अवश्यक नहीं है | हो सकता है उसकी कई बातें ठीक न लगें | मुझे उन्हें न मानने की छूट तो रहेगी ही! कुल मिलाकर यही कहना है कि आप मेरी बातों को भुला दें | – योगेन्द्र जोशी

    प्रतिक्रिया

    • दिनेशराय द्विवेदी
      जनवरी 17, 2010 @ 20:18:19

      जोशी जी, मतभेद से तो जीवन है। यदि मतभेद न हों तो विमर्श का कोई अर्थ नही रह जाए। लेकिन मुझे एक बात अजीब लगी कि आप किसी पुस्तक को पढ़ने के पहले ही कह रहे हैं कि कोई जरूरी है कि उस से सहमत हुआ ही जाए। तब प्रश्न यह उठेगा कि जब सहमत नहीं ही होना है तो पढ़ा क्यूँ जाए?
      इस से अधिक कुछ कहना बेकार है।

      प्रतिक्रिया

  6. sharad akale
    जनवरी 07, 2011 @ 16:39:45

    tumhi dileli mahiti khupach changali aahe

    thank you

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  7. Manav Kumar
    मार्च 28, 2011 @ 22:13:09

    ईश्‍वर भी निश्‍चित ही चार्वाक और अष्‍टावक्र दोनों का जोड़ होगा। चार्वाक को में धर्म-विरोधी नहीं मानता। चार्वाक को मैं धर्म की सीढी मानता हूं। सभी नास्‍तिक को में आस्‍तिकता की सीढी मानता हूं। सभी नास्‍तिकता को में आस्‍तिकता की सीढी मानता हूं। तुमने धर्मों के बीच समन्‍वय करने की बातें तो सूनी होंगी—हिंदू और मुसलमान एक; ईसाई और बौद्ध एक। इस तरह की बात तो बहुत चलती हे। लेकिन असली समन्‍वय अगर कहीं करना है तो वह है नास्‍तिक आरे आस्‍तिक के बीच।

    यह भी कोई समन्‍वय है—हिंदू और मुसलमान एक, ये तो बातें एक ही कह रहें है। इनमें समन्‍वय क्‍या खाक करना , इनके शब्‍द अलग होंगे,इससे क्‍या फर्क पड़ता हे।

    मैं एक आदमी को जानता था, उसका नाम राम प्रसाद था। वह मुसलमान हो गया, उसका नाम खुदा बक्‍स हो गया। वह मेरे पास आया। मैंने कहा: पागल इसका मतलब वहीं होता है। राम प्रसाद, खुदा बख्श होकर कुछ हुआ नहीं। खुदा यानि राम, बख्श यानी प्रसाद। वह कहने लगा: यह मुझे कुछ खयाल न आया।

    भाषा के फर्क है, इनमें क्‍या समन्‍वय कर रहे हो। असली समन्‍वय अगर कही करना है तो नास्‍तिक और आस्‍तिक के बीच; पदार्थ और परमात्‍मा के बीच;चार्वाक और अष्‍टावक्र के बीच। मै तुम्‍हें उसी असली समन्‍वय की बात कर रहा हूं। जिस दिन नास्‍तिकता मंदिर की सीढी बन जाती है। उस दिन समन्‍वय हुआ। उस दिन तुमने जीवन को इक्ट्ठा करके देखा, उस दिन द्वैत मिटा।

    मैं तुम्‍हें परम अद्वैत की बात कहर रहा हूं। इसका मतलब क्‍या होता है। इसका मतलब होता है। आखिर चार्वाक भी है, तो परमात्‍मा का हिस्‍सा ही। तुम कहते हो सभी में परमात्‍मा है। फिर चार्वाक में नहीं है क्‍या? फिर चार्वाक में जो बोल रहा है वह परमात्‍मा नहीं है। तुम चार्वाक का खंडन कर रहे हो। ये परमात्‍मा का ही खंडन नहीं है। अगर वास्‍तव में अद्वैत है। तो तुम कहोगे; चार्वाक की वाणी में भी प्रभु बोला। यही मैं तुमसे कहता हूं। और वाणी उसकी मधुर है; इसलिए चार्वाक ना पडा। चार्वाक का अर्थ होता है। मधुर वाणी वाला। उसका दूसरा नाम है: लोकायत। लोकायत का अर्थ होता है। जो लोक में प्रिय हो। जो अनेक को प्रिय है। लाख तुम कहो ऊपर से कुछ, कोई जैन है। कोई बौद्ध है, कोई हिंदू हे। को मुसलमान है। यह सब ऊपरी बकवास है, भीतर गौर से देखो, चार्वाक को पाओगें। और तूम अगर इन धार्मिकों के सवर्ग की तलाश करो तो तुम पाओगें कि सब स्‍वर्ग की जो योजनाएं है, वह चार्वाक ने बनाई होगी। सर्वग में जो आनंद और रस की धारे बह रही है। वह चार्वाक की ही धारणाएं हे।

    सूख जीवेत, चार्वाक कहता हे: सुख से जीओ, इतना में जरूर कहूंगा कि चार्वाक सीढ़ी है। और जिस ढंग से चार्वाक कहता हे। उस ढंग से सुख से कोई जी नहीं सकता। क्योंकि चार्वाक ने ध्‍यान का कोई सुत्र नहीं दिया। चार्वाक सिर्फ भोग है, योग का कोई सुत्र नहीं है; अधूरा है। उतना ही अधूरा है जितने अधूरे योगी हे। उनमें योग तो है लेकिन भोग का सूत्र नहीं है। इस जगत में कोई भी पूरे को स्‍वीकार करने की हिम्‍मत करता नहीं मालूम पड़ता—आधे-आधे को। मैं दोनो को स्‍वीकार करता हूं। और मैं कहता हूं: चार्वाक का उपयोग करों और चार्वाक के उपयोग से तुम एक दिन अष्‍टावक्र के उपयोग में समर्थ हो पाओगें।

    जीवन के सुख को भोगों। उस सुख में तुम पाओगें, दुःख ही दुःख है। जैसे-जैसे भोगोगे वैसे-वैसे सुख का स्‍वाद बदलने लगेगा और दुःख की प्रतीति होने लगेगी। और जब एक दिन सारे जीवन के सभी सुख दुःख-रूप हो जाएंगे,उस दिन तुम जागने के लिए तत्‍पर हो जाओगे। इस दिन कौन तुम्‍हें रोक सकेगा। उस दिन तुम जाग ही जाओगे। कोई रोक नहीं रहा है। रुके इसलिए हो कि लगता है शायद थोड़ा और सो ले। कौन जाने…..एक पन्‍ना और उलट लें संसार का। इस कोने से और झांक लें। इस स्‍त्री से और मिल लें। उस शराब को और पी लें। कौन जाने कहीं सुख‍ छिपा हो, सब तरफ तलाश ले।

    मैं कहता भी नहीं कि तुम बीच से भागों। बीच से भागे, पहुंच न पाओगें,क्‍योंकि मन खिचता रहेगा। मन बार-बार कहता रहेगा। ध्‍यान करने बैठ जाओगे, लेकिन मन में प्रतिमा उठती रहेगी उसकी, जिसे तुम पीछे छोड़ आए हो। मन कहता रहेगा। क्‍या कर रहे हो मूर्ख बने बैठे हो। पत्‍ता नहीं सुख वहां होता है। तुम देख तो लेते, एक दफा खोज तो लेत।

    इसलिए मैं कहता हू: संसार को जाने ही लो, उघाड़ ही लो, जैसे कोई प्‍याज को छीलता चला जाए—तुम बीच में मत रूकना, छील ही डालना पूरा। हाथ में फिर कुछ भी नहीं लगता। हां, अगर पूरा न छिला तो प्‍याज बाकी रहती है। तब यह डर मन में बना रह सकता है, भय मन में बना रह सकता है: हो सकता है कोहिनूर छुपा ही हो। तुम छील ही डालों, तुम सब छिलके उतार दो। जब तक शून्‍य हाथ में लगे,छिलके ही छिलके गिर जाएं—संसार प्‍याज जैसा है। छिलके ही छिलके है। भीतर कुछ भी नहीं। छिलके के भीतर छिलका है। भीतर कुछ भी नहीं। जब भीतर कुछ भी नहीं पकड़ में आ जाएगा। फिर तुम्‍हें रोकने को कुछ भी नहीं। जब भीतर कुछ भी पकड में आ जाएगा, फिर तुम्‍हें रोकने को कुछ भी न बचा।

    चार्वाक की किताब पूरी पढ़ ही लो, क्‍योंकि कुरान, गीता,और बाईबिल उसी के बाद शुरू होते है। चार्वाक पूर्वार्ध है, अष्‍टावक्र उत्तरार्ध।

    ओशो—(अष्‍टावक्र: महागीता-3, प्रवचन—10)
    copy from oshosatsangdotorg/2010/05/25

    प्रतिक्रिया

  8. Gopesh Sharma
    अप्रैल 25, 2011 @ 14:36:11

    Vicharottejak lekh (Blog). Sukh (Indriya sukh) ki apeksha Hit (Parinamatah Sukhkar) shbad adhik upayogi hai. vaise to dono hi Aapekshik (relative) hote hai. Seema atirek hone par sukh dukh mein evam Hita Ahita mein badal jata hai. Ye purna satya hai ki hum kisi bhi Dharma ,sampradaya ko manate ho par sarvamanya sarvpriya evam sarva prachlit LOKAYAT hi hai. Neti…..Neti….Neti…..
    Iti Sham

    प्रतिक्रिया

  9. saurabh rai
    अगस्त 14, 2011 @ 21:26:06

    mai to confuse hu ishwar hai ki nahi.koi kali ki puja karke bhi gyan prapt karta hai aur koi bina puja ke meditation dwara

    प्रतिक्रिया

  10. saurabh rai
    अगस्त 14, 2011 @ 21:29:56

    there is a god or not ?

    प्रतिक्रिया

  11. rohit chaudhary
    सितम्बर 13, 2012 @ 17:43:39

    this is a very applied method and…..very valuable

    प्रतिक्रिया

  12. vishal kumar sharma
    जून 17, 2013 @ 17:37:31

    Good

    प्रतिक्रिया

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