सामर्थ्यवान् व्यक्ति ‘पापी’ पर नियंत्रण रखे – महाकाव्य महाभारत के और्व ऋषि प्रकरण में वर्णित नीति

महाकाव्य महाभारत में और्व नामक भृगुवंशी ऋषि से संबद्ध एक प्रकरण है । उसके अनुसार एक बार क्षत्रिय लोग धर्मविरुद्ध व्यवहार करते हुए अकारण भृगुवंशियों को सताने और उनका संहार करने लगे । उनके आचरण से कुपित हो ऋषि और्व ने स्वयं उनका विनाश करने का संकल्प ले लिया और अपने अभियान पर उतर पड़े । उनके परलोकवासी पितरों को उनका ऐसा करना अनुचित लगा, फलतः उन्होंने दर्शन देते हुए उन्हें समझाने का प्रयास किया । लेकिन पितरों से असहमति व्यक्त करते हुए उन्होंने अपने अभियान के औचित्य को विस्तार से स्पष्ट किया । उसी संदर्भ में निम्नलिखित दो श्लोक मुझे विशेष रूप से विचारणीय और प्रासंगिक लगेः(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय १७९, श्लोक १० एवं ११, क्रमशः)

यदा तु प्रतिषेद्धारं पापो न लभते क्वचित् ।

तिष्ठन्ति बहवो लोकास्तदा पापेषु कर्मसु ।।

(यदा तु पापः प्रतिषेद्धारं क्वचित् न लभते तदा बहवः लोकाः पापेषु कर्मसु तिष्ठन्ति ।)

जब भी किसी पापी पुरुष के सामने कहीं कोई ऐसा व्यक्ति नहीं रह जाता जो उसे पापकर्म से रोके, तब बहुत-से लोग उसकी भांति पापकर्म में लिप्त हो जाते हैं । वस्तुतः पापकर्म में लिप्त होने की प्रवृत्ति संक्रामक होती है । समाज में यही अधिकतर देखने को मिलता है कि लोग ऐसे जनों का अनुकरण सहजता से करते हैं जो अनुचित कार्यों में लिप्त रहते हैं, क्योंकि ऐसा करना स्वार्थसिद्धि में सहायक होता है । जब उद्दंड लोग निर्भय होकर अनुचित कार्य करते हैं तो दूसरे भी वैसे आचरण से परहेज करना छोड़ देते हैं । ऐसी दशा में आदर्श केवल कथनी की बातें होकर रह जाती हैं, न कि करनी की ।

जानन्नपि च यः पापं शक्तिमान् न नियच्छति ।

ईशः सन् सोऽपि तेनैव कर्मणा सम्प्रयुज्यते ।।

(यः शक्तिमान् ईशः सन् अपि च जानन् पापं न नियच्छति सः अपि तेन एव कर्मणा सम्प्रयुज्यते ।)

जो शक्ति-संपन्न व्यक्ति अनुशासित रखने की सामर्थ्य रखते हुए और सब कुछ जानते हुए भी पापी को नियंत्रण में नहीं रखता वह भी उस पाप का भागीदार बन जाता है । सामान्यतः राज्य चलाने वाले (राजा या जनप्रतिनिधि) और उनके प्रतिनिधियों (प्रशासनिक अधिकारियों) को यह अधिकार एवं दायित्व मिला रहता है कि वे पापियों को नियंत्रण में रखें । जब ये लोग अपना दायित्व भूल जाते हैं तो स्वयं वे पापकर्म के लिए जिम्मेदार हो जाते हैं और फलतः दंडित किये जाने चाहिए ।

दंडित कौन करे

दंडित कौन करे इसका उत्तर और्व ऋषि के प्रकारण में प्राप्त होता है । निश्चय ही पापकर्म करने वाले को रोका जाना चाहिए । यदि पापी को रोका न जाये तो अन्य कमजोर तथा स्वार्थी जन यह मानने लगते हैं कि चूंकि कोई रोकने वाला नहीं है अतः पाप से बचने की जरूरत नहीं । एक-दूसरे की देखा-देखी समाज में पाप का भय खोने लगता है । हम देख ही रहे हैं कि आज हमारे समाज में कोई भय नहीं है । वास्तव में दो प्रकार के लोग समाज में देखने में आते हैं; एक वे जो स्वयं ही पाप से बचने का विचार रखते हैं (उन्हें उनकी ‘आत्मा’ की आवाज रोकती है, न कि कोई बाह्य कारण या एजेंसी), और दूसरे वे लोग जो बाह्य कारणों से डरकर पाप से बचते हैं । इस श्रेणी के लोग पापकर्म में तब लिप्त हो जाते हैं जब उन्हें इन बाह्य कारणों का भय नहीं रह जाता है ।

समाज में तरह-तरह के भय होते हैं और उनमें सबसे बड़ा कानून का भय होता है । लेकिन आज कानून का भय लुप्तप्राय हो चुका है । इसके अतिरिक्त किसी समय समाज में उठने वाली उंगली का भय भी व्यक्ति को रोकता था, किंतु आज के युग में सामाजिक बहिष्कार जैसी चीजें नहीं रह गयी हैं । अतः पापकर्म बढ़ने की परिस्थितियां पैदा हो चुकी हैं । ऐसी अवस्था में ‘कानून अपने हाथ में लेने’ की बात उठती है । यही तथ्य और्व ऋषि ने अपने पितरों को समझाया था । और्व ऋषि का कथन था कि जिसे पापियों को रोकने की जिम्मेदारी मिली हो और जो ऐसा करने में साधनों तथा अन्य प्रकार से सक्षम हो वही जब मूक दृष्टा बन जाये और अपना दायित्व न निभाए तब पापी पर नियंत्रण रखने का उस व्यक्ति की हो जाती है जो अपनंे बल पर ऐसा करने में समर्थ हो । अर्थात् उसने ‘कानून को अपने हाथ में’ ले लेना चाहिए । जब सामाजिक व्यवस्था निष्प्रभावी हो जाय तो व्यक्ति को स्वयं सुधार का मार्ग खोजना चाहिए । मैं व्यक्तिगत तौर पर इसका पक्षधर हूं, लेकिन शर्त यह है कि ऐसा स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि समाज को सुधारने और उसे दोषमुक्त करने के इरादे से किया जाए ।

पाप की व्याख्या

उक्त संदर्भ में पाप की व्याख्या क्या हो यह पूछा जा सकता है । मुझे शंका है कि पाप की सुनिश्चित परिभाषा लोगों के बीच नहीं व्याप्त है । पाप शब्द वस्तुतः हिंदू समाज की धार्मिकता से संबद्ध है और उसे अधिकतर लोग धर्म के संदर्भ में ही परिभाषित करते हैं । अंग्रेजी का ‘सिन्’ (sin) इसका तुल्य शब्द माना जाता है । लेकिन ख्रीस्तीय मतावलंबियों के लिए जो ‘सिन्फुल’ हो वह हिंदुओं की दृष्टि में भी वैसा ही हो यह आवश्यक नहीं है । तात्पर्य यह है कि पाप की स्पष्ट तथा सर्वस्वीकार्य परिभाषा शायद नहीं है । मेरी अपनी दृष्टि में पाप की अवधारणा बहुत व्यापक है और आजकल जो निर्बाध गति से बढ़ रहा अनियंत्रित भ्रष्टाचार हमारे समाज में व्याप्त है उसे भी मैं पाप के अंतर्गत मानता हूं । भ्रष्टाचार आम तौर पर प्रचलित कानूनों के संदर्भ में देखा जाता है, और यह संभव है कि जो कानूनन स्वीकार्य हो वह भी पापपूर्ण हो । जिस कार्य के बारे में कानून मूक हो वह भी पापपूर्ण हो सकता है । मेरे मत में पाप को भ्रष्टाचार से कहीं अधिक व्यापक अर्थवत्ता की दृष्टि से देखा जाना चाहिए । मैं मानता हूं कि जो कुछ भी विशुद्ध स्वार्थ से प्रेरित होकर किया जाता है, जिसे धर्म तथा नैतिकता के प्रतिकूल माना जाता है, जो समाज के लिए व्यापक स्तर पर हानिकर अथवा घातक हो, वह सब पाप है । मैं तो यहां तक मानता हूं कि प्रकृति के संसाधनों का जो अमर्यादित दोहन शीघ्रातिशीघ्र और अधिकाधिक संपन्नता अर्जित करने के विचार से कुछ लोगों के द्वारा किया जा रहा है वह भी पापकर्म है । वस्तुतः जब कुछ लोग घोर विपन्नता में जी रहे हों और अन्य कोई व्यक्ति असीमित संपदा बटोरे और उसका एकांश भी समाज हित में न लगाए तो वह भी पापपूर्ण है, हालाकि इसे अवैध नहीं कहा जाएगा । पाप क्या है क्या नहीं यह विषय इस युग में निरर्थक हो चला है । आज का युग ‘यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्‌’ का है । अर्थात् जब तक जीवित हैं तक तक सभी सुख भोग लो, और उसे पाने के लिए जो भी किया जाए वह सब उचित है । वर्तमान युग में पाप-पुण्य की बात करना निरर्थक और कायरतापूर्ण माना जाने लगा है । यही सब मुझे आज के मानव आचरण में दिखाई देता है । – योगेन्द्र जोशी

2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. aniruddha pande
    अप्रैल 10, 2010 @ 21:58:32

    अच्छा व्यक्ति होना और अच्छे चरित्र का व्यक्ति होना दो अलग अलग बाते है . हमें इस अंतर को स्वीकार करे या न करे पर यह अंतर तो है . कोई भी काम अच्छा या बुरा नहीं होता है मात्र उनके परिणाम बताते है की वो अच्छा था या बुरा था . कोई भी कार्य जो पाप के रूप मे परिभाषित किया जा सकता है पर उसके परिणाम व्यापक जन हित मे हो सकते है . आज का समय सही या गलत के बीच चुनाव का नहीं है बल्कि अच्छे या बुरे के बीच चुनाव का है . जिसका परिणाम अच्छा है वही सही है . इन सब के ऊपर मनुष्य का विवेक है जो निर्धारित करता है की कौन सा निर्णय किया जाए क्यों की एक ही घटना की व्याख्या अलग अलग दृष्टीकोण से की जा सकती है .

    आपने अद्भुत विषय चुना . आपको धन्यवाद .इस पर चर्चा अनंत है …………….

    प्रतिक्रिया

    • योगेन्द्र जोशी
      अप्रैल 10, 2010 @ 22:39:21

      धन्यवाद अनिरुद्धजी । महाभारत में मुझे कथित बातें देखने को मिलीं, उसी पर मैंने दो-चार शब्द लिख दिये । वस्तुतः ग्रन्थ के संबंधित अध्याय में बहुत कुछ और भी है, पर उतने सब की बात बहुत लंबी हो जाती । कौन अच्छा और कौन नहीं इस पर सभी एकमत शायद न हों । मेरी दृष्टि में अपने ही स्वार्थ तक सीमित व्यक्ति अच्छा नहीं हो सकता । कुछ तो शेष समाज का खयाल भी रखे आदमी । – योगेन्द्र जोशी

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