‘लक्ष्मण रेखा’! किंतु रामचरितमानस, महाभारत एवं रामायण में इसका उल्लेख ही नहीं!

पिछले कुछ समय से मैं वाल्मीकीय रामायण का अध्ययन कर रहा हूं । मेरे पास इस ग्रंथ की गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा दो खंडों में प्रकाशित प्रति है, जिसमें मूल संस्कृत श्लोकों से साथ-साथ हिंदी में भी उनका अनुवाद दिया गया है । इन संस्कृत श्लोकों के अर्थ समझने में मुझे सामान्यतः कोई खास कठिनाई अनुभव नहीं होती है; फिर भी कभी-कभी गाड़ी अटकने लगती है तो संबंधित हिंदी अनुवाद से मुझे पर्याप्त सहायता मिल जाती है । संप्रति मैं राम-कथा के उस प्रसंग पर पहुंच चुका हूं जिसमें हनुमान् समुद्र लांघकर रावण की लंका जाने की तैयारी कर रहे हैं । इसके पूर्व सीताहरण के प्रसंग के बारे में मैं पढ़ चुका था ।

सीताहरण के संदर्भ में मुझे एक रोचक तथ्य इस ग्रंथ में देखने को मिला । वह यह है कि उसमें ऐसा कहीं उल्लिखित नहीं है कि लक्ष्मण ने मारीच-वध के बाद श्रीराम की मिथ्या पुकार (वस्तुतः मारीच द्वारा ‘हा लक्ष्मण’ की कृत्रिम पुकार) सुनने और सीता की उलाहना झेलने के बाद वन की ओर जाने के पहले कुटिया के परितः कोई सुरक्षा घेरा खींचा हो । अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए मैंने महर्षि व्यास द्वारा रचित महाकाव्य महाभारत (उसमें भी रामकथा की चर्चा है) के पन्ने पलटे । और फिर गोस्वामी तुलसीकृत रामचरितमानस के पृष्ठों पर भी दृष्टि दौड़ाई । ‘लक्ष्मण रेखा‘ की बात वहां भी पढ़ने को नहीं मिली । तब मेरे मन में प्रश्न उठा कि लक्ष्मण रेखा की बात कब ओर कहां से आई ?

लक्ष्मण रेखा की बातें मैं बचपन से सुनता आ रहा हूं । कदाचित् कभी कहीं श्रीराम से जुड़ी किसी कथा में इसे पढ़ा हो, अथवा अपने बुजुर्गों के मुख से तत्संबंधित कथा सुनी हो । इस विषय मैं मुझे कुछ भी ठीक से याद नहीं है । हां, रोजमर्रा की जिंदगी में लोगों के मुख से मौके-बेमौके इस शब्दयुग्म को सुनता आ रहा हूं । क्या है यह लक्ष्मण रेखा ? कहा यही जाता है कि जीवन के विभिन्न कार्य-व्यापारों में मनुष्य को कुछेक मर्यादाओं का पालन करना चाहिए, उन सीमाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए जो नैतिकता, वैधानिकता, अथवा स्थापित परंपरा के आधार पर समाज में स्वीकारी गयी हैं । जब भी कोई ऐसे प्रतिबंधों का उल्लंघन कर बैठता है तो उस पर ‘लक्ष्मण रेखा पार कर दी’ का आरोप लगा दिया जाता है । आजकल अपने देश की राजनीति के संदर्भ में भी इस ‘रेखा’ का उल्लेख बहुधा देखा जाता है । यह बात अलग है कि उसका उल्लंघन करना राजनेताओं का शगल या विशिष्टाधिकार बन चुका है । अस्तु ।

मतलब यह कि ‘लक्ष्मण रेखा’ प्रायः सभी के लिए एक सुपरिचित पदबंध अथवा सामासिक शब्द है । मेरा अनुमान है कि प्रायः सभी इसका संबंध उस कथा से जोड़ते हैं, जिसमें रावण द्वारा सीता का अपहरण न होने पाए इस उद्येश्य से सीता की पर्णकुटी के चारों ओर लक्ष्मण ने ‘कथित तौर पर’ अभिमंत्रित सुरक्षा घेरा खींचा था । प्रचलित कथा के अनुसार रावण उस खतरे को भांप गया; परंतु उसके झांसे में आकर स्वयं सीता उस घेरे को पार कर गयीं और रावण द्वारा हरी गईं । सीता ने उस ‘मर्यादा’ का अतिक्रमण कर डाला । और यहीं से ‘लक्ष्मण रेखा’ स्थापित मर्यादा-सीमा का द्योतक हो गयी । मेरा खयाल है कि लोगों की इस ‘रेखा’ के बारे में कुछ ऐसी ही समझ है ।

मुझे जिज्ञासा हुई कि क्या आधुनिक इंटरनेट खजाने में भी इस बारे में कुछ जानकारी उपलब्ध है । ‘विकीपीडिया’ (अंग्रेजी) पर (अथवा विकी-हिंदी पर) जो जानकारी मुझे मिली वह यों हैः

“रामायण के एक प्रसिद्ध प्रसंग के अनुसार वनवास के समय सीता के आग्रह के कारण राम मायावी स्वर्ण म्रग के आखेट हेतु उसके पीछे गये। थोड़ी देर मे सहायता के लिए राम की पुकार सुनाई दी, तो सीता ने लक्ष्मण से जाने को कहा। लक्ष्मण ने बहुत समझाया कि यह सब किसी की माया है,पर सीता न मानी। तब विवश होकर जाते हुए लक्ष्मण ने कुटी के चारों ओर अपने धनुष से एक रेखा खींच दी कि किसी भी दशा मे इस रेखा से बाहर न आना। तपस्वी के वेश मे आए रावण के झाँसे मे आकर सीता ने लक्ष्मण की खींची हुई रेखा से बाहर पैर रखा ही था कि रावण उसका अपहरण कर ले गया। उस रेखा से भीतर रावण सीता का कुछ नहीं बिगाड़ सकता था। तभी से आज तक [[लक्ष्मण रेखा]] नामक उक्ति इस आशय से प्रयुक्त होती है कि, किसी भी मामले मे निश्चित हद को पार नही करना है, वरना बहुत हानि उठानी होगी। “

श्रीराम की कथा पर विभिन्न भाषाओं में शायद एकाधिक ग्रंथ रचे गये हैं, जैसे तमिल में तमिल कवि ‘कंबन’ द्वारा रचित ‘रामावतारम्’ (कंब रामायण) । मैंने कभी यह ग्रंथ नहीं देखा है, लेकिन सुना है कि कंबन तमिल एवं संस्कृत के ज्ञाता थे और उन्होंने वाल्मीकीय रामायण पर आधारित रामकथा लिखी थी । अधिक जानकारी के लिए यहां अथवा यहां देखें । विख्यात भारतीय अंग्रेजी साहित्यकार आर. के. नारायण की ‘दि रामायण’ का भी नाम मैंने सुना है । रामकथा पर फिल्में तथा टेलिविजन भी आधुनिक काल में बन चुकी हैं । ये सब जनश्रुतियों पर आधारित हैं अथवा महर्षि वाल्मीकि की रामायण तथा अन्य ग्रंथों पर । अगर इनमें कहीं ‘लक्ष्मण रेखा’ की बात कही गयी हो तो उसकी वाल्मीकीय रामायण से संगति नहीं बैठेगी । ‘लक्ष्मण रेखा’ का जिक्र तो महाभारत तथा रामचरितमानस में भी देखने को नहीं मिलता है । इस संदर्भ में इन ग्रंथों में मुझे पढ़ने-समझने को क्या मिला इसका उल्लेख आगामी आलेखों में करने का मेरा विचार है । – योगेन्द्र जोशी

12 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. jksaini
    मई 12, 2010 @ 11:56:22

    achi jankari di yogendra joshi ji par mere man mai ek shanka hai krapya samadhan kare
    lakshaman ji ne kutiya ke bahar rekha khich di jisko rawan par nahi kar sakta tha to yahi baat sita ji par bhi to lagu honi chahiye thi fir unhone wo rekha kaise par kar di aur ye baat lakshaman ji ko bhi sochani chahiye thi ki aisi rekha khinche jo na koi andar ja sake na koi bahar aa sake.
    maf kijiye man ki jigyasa thi so kah di agr bura laga ho to maf karna aur uchit margdarshan karne ki krapya kare
    dhanyawad
    प्रत्युत्तर:
    धन्यवाद सैनीजी । आपने जो सवाल उठाया वह मेरे मन में भी उठा था । मैं शंकाओं का निवारण तो नहीं कर सकता, पर दो-एक बातें कह सकता हूं जिनसे कुछ मदद मिल सकती है ।
    1) पहली बात तो यह है कि जिन ग्रंथों का नामोल्लेख मैंने किया, और जिनकी किंचित् विस्तार से चर्चा अभी करनी है, उनमें ‘लक्ष्मण रेखा’ जैसी कोई बात नहीं कही गयी है । उस वर्णन को स्वीकारें तो यह सवाल अर्थहीन हो जाता है ।
    2) दूसरी बात, जहां तक पौराणिक कथाओं का सवाल है, वे कितनी वास्तविक और कितनी काल्पनिक थीं मैं इस पर बहस नहीं कर सकता । हो सकता वे कथाएं प्राचीन काल में किसी प्रयोजन विशेष से लिखी गयी हों और कवियों की कल्पना से पूर्णतः प्रेरित रही हों । अन्यथा यह भी संभव है कि उन कथाओं का कोई ऐतिहासिक आधार हो पर कवियों ने उन्हें कुछ हद तक अतिशयोक्ति-पूर्वक प्रस्तुत किया हो । या कुछ और ही बातें रही हों । आज का कोई भी व्यक्ति उस काल की बातों पर साधिकार कुछ कह नहीं सकता ।
    3) तीसरी बात, यदि ‘लक्ष्मण रेखा’ की सच्चाई मान लें तो यह भी विश्वास किया जा सकता है कि वह रेखा केवल राक्षसों पर प्रभावी हो इस विचार के साथ अभिमंत्रित हो । वह उस विचार के साथ खींची गयी हो कि कपटपूर्ण व्यवहार वाला व्यक्ति ही उससे भस्मीभूत होवे । निष्कपट व्यक्ति पर उसका असर न हो । ऐसी ही अन्य बातें भी सोची जा सकती हैं, खुद को संतुष्ट करने के लिए ।
    सच क्या है, या क्या था, इसे बता पाना कठिन है । मैं इतना ही कह सकता हूं । और विषय का विशेषज्ञ तो मैं हूं भी नहीं ! (कोई विशेषज्ञ हो भी सकता है इसमें मुझे शंका है ।) – योगेन्द्र जोशी

    प्रतिक्रिया

  2. aniruddha pande
    मई 12, 2010 @ 19:25:10

    योगेन्द्र जी नमस्ते
    जान कर आश्चर्य लगा के लक्ष्मण रेखा का जिक्र रामचरित मानस मे नहीं है . इस जानकारी के लिए धन्यवाद .
    एक जिज्ञासा: मैंने सुना है की वाल्मिक ने रामायण मे राम को कही भी इश्वर नहीं माना है .वह उनके लिए एक नायक थे .क्या यह सही है ? अगर वाल्मिक ने राम को इश्वर नहीं माना तो राम ने कब इश्वरत्व प्राप्त किया . कृपया दोनों शंकाओ का समाधान करे

    प्रत्युत्तर
    राम के ईश्वरत्व पर आपके प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर दे पाना सरल नहीं । यों महर्षि वाल्मीकि ने ग्रंथ के आरंभ (बालकांड) में रामावतार की पृष्ठभूमि के रूप में देवताओं का ब्रह्मा के पास जाने का जिक्र किया है । देवताओं ने रावण के अत्याचारों से मुक्ति का मार्ग जानना चाहा और उसी सिलसिले में विष्णु के दशरथ-पुत्र राम के रूप में जन्म लेने का निर्णय हुआ । अर्थात् राम विष्णु के अवतार हैं यह वाल्मीकि को ज्ञात था । लेकिन जहां तक रामायण में रामकथा का सवाल है उसमें शायद कहीं भी राम के मुंह से स्वयं को अलौकिक या अवतारी पुरुष होने की बात नहीं कहलवाई है । उन्हें एक मानव/नायक के रूप में पेश किया गया है, जो धनुर्विद्या एवं युद्धकला में महारत रखते थे । उन्हें आम मनुष्य की भांति जीवन के उतार-चढ़ावों का सामना करना पड़ा । लोग अवश्य उन्हें अलौकिक व्यक्ति मानते थे, किंतु वे स्वयं ऐसा होने की बात नहीं कहते थे । अब आप स्वयं निष्कर्ष निकाले कि वाल्मीकि के लिए वे क्या थे । सभी पौराणिक कथाएं अलौकिक घटनाओं से अटी-पड़ी हैं । रामायण अपवाद नहीं है । इनके आधार पर राम को ईश्वरावतार माने या न यह आप खुद सोचें । मेरे अपने मत का कोई महत्त्व नहीं । – योगेन्द्र जोशी

    प्रतिक्रिया

  3. jayantijain
    मई 13, 2010 @ 08:04:48

    उन कथाओं का कोई ऐतिहासिक आधार हो पर कवियों ने उन्हें कुछ हद तक अतिशयोक्ति-पूर्वक प्रस्तुत किया हो । या कुछ और ही बातें रही हों ।
    It seems more correct.

    प्रतिक्रिया

  4. jksaini
    मई 13, 2010 @ 09:14:15

    yogendra ji margdarshan karne ke liye bahut bahut dhanyawad mai aap ki baat se purn sahmat hun. meri patni nursing traning mai thi unki class mai 50 ladkiya thi teacher ne ek din ek prayog kiya ki ek ladki ke kan mai ek baat kahi wahi baat usko dusari ladki ke kaan mai kahni thi es tarah se ye 50vi ladki tak baat panhuch gyi lekin jab teacher ne us 50vi ladki se wah baat puchi to wo baat bilkul badal chuki thi. ab ramayan to waise bhi hajao saal pahale likha gya tha uske baad bahut vidwan aaye jinhone apani budhi ka prayog bhi ramayan pe kiya hoga. esliye satya kya tha kaha nahi ja sakta ab ramayan sirf tark ka vishay hai.

    प्रतिक्रिया

  5. श्याम नारायण श्रीवास्तव
    अगस्त 07, 2013 @ 22:06:19

    कुछ ग्रन्थों लक्ष्मण रेखा की बात है ..

    प्रतिक्रिया

  6. बलराम अग्रवाल
    सितम्बर 20, 2013 @ 10:49:09

    लक्ष्मण रेखा का जिक्र न तो वाल्मीकि रामायण (दक्षिणात्य संस्करण) में है और न ही रामचरित मानस में। इसके अलावा एक अन्य बात भी है–वाल्मीकि ने कहीं भी नहीं लिखा कि सीता के सम्बन्ध में किसी ‘धोबी’ ने कुछ कहा। नकारात्मक प्रकरण में जाति-विशेष का नाम इतना महान ॠषि ले ही नहीं सकता। तुलसीदास ने तो राम के इस कमजोर प्रकरण को छोड़ ही दिया है। कोई बताएगा कि ‘धोबी’ के माध्यम से जाति-विशेष को बदनाम करने की साजिश किस ‘पण्डित’ ने की? मेरा ईमेल 2611ableram@gmail.com है।

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  7. rishiraj badariya.
    सितम्बर 25, 2013 @ 23:38:12

    Ati uttam

    प्रतिक्रिया

  8. ashok kumar jain
    जुलाई 04, 2014 @ 08:46:48

    mandodari rawan samvaad me kisi ne jod diya hai( raamanuj laghu rekh khinchaai……. kripaya is chaupai ko MANAS me padh le..

    प्रतिक्रिया

    • योगेन्द्र जोशी
      अक्टूबर 19, 2015 @ 17:06:50

      घटना में जो पात्र (सीताजी एवं रावण) शामिल रहे उनके परस्पर संवाद में वह सब नहीं झलकता है जिसकी बात कही जाती है। मंदोदरी के मुख से ये वचन जरूर निकले हैं, लेकिन वह घटना की चश्मदीद गवाह रही नहीं होगी। उसने स्वयं कहीं से उस घटना के बारे में सुना होगा और उसी के आधार पर उक्त बातें कही होंगी। प्रश्न है कि सीता-रावण संवाद को साक्ष समझा जाए या मंदोदरी के कथन को। मैं पहले के पक्ष में हूं। मंदोदरी के ये वचन मूल रामायण एवं महाभारत में कथित रामकथा में हैं भी नहीं।

      प्रतिक्रिया

  9. Narahari Rao, K.
    जुलाई 16, 2014 @ 19:06:32

    बहुत अच्छा चर्चा शुरू की है आप ने. जैसे आप लिखे थे वैसा ही है. मैं भी कोई विसेशग्न नही हू| लेकिन, मैं ने धूण्ड के निकला एक बात: लङ्का काण्ड मे मण्डोदरी रावण से बोलती है ( दोहा ३५.१ )

    साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ।
    मंदोदरीं रावनहिं बहुरि कहा समुझाइ॥35 ख॥
    भावार्थ:- सन्ध्या हो गई जानकर दशग्रीव बिलखता हुआ (उदास होकर) महल में गया। मन्दोदरी ने रावण को समझाकर फिर कहा-॥35 (ख)॥
    चौपाई :
    * कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही॥
    रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई॥1॥
    भावार्थ:- हे कान्त! मन में समझकर (विचारकर) कुबुद्धि को छोड़ दो। आप से और श्री रघुनाथजी से युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाई ने एक जरा सी रेखा खींच दी थी, उसे भी आप नहीं लाँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है॥1॥

    यह् एक आधार मिला लक्ष्मण रेखा की, लेकिन सीता मा का रेखा उल्लन्घन की बात न कही गयी.
    और जिस आशय से यह् उक्ति प्रयुक्त होती है कि,”किसी भी मामले मे निश्चित हद को पार नही करना है, वरना बहुत हानि उठानी होगी। ” उसके बारे मे कुछ न मिलता है |

    धन्य वाद !

    प्रतिक्रिया

  10. Sanjay Dwivedi
    जून 01, 2016 @ 18:41:49

    ……कृपया एक मिनट का समय निकालकर अवश्य पढ़ें यह कॉपी पेस्ट वाला कंटेंट नही है अपितु, मेरे कुछ स्वयं के विचार है जिसमें आपके विचारों की उपस्थिति भी कमेंट के द्वारा वांछनीय है……

    जो निर्मित है उसके लिए निर्माता की आवश्यकता है अतः निर्मित वस्तु जितनी जटिल होगी उसका निर्माता उतना ही योग्य होगा,
    इसलिए यह कहने में तनिक मात्र भी परहेज नहीं है की सृष्टी के निर्माण के लिए जो निर्माता है, वह ही भगवान है।
    इस तरह हम सुस्थापित सिद्धांत के द्वारा बहुत ही आसानी से भगवान का अस्तित्व जान सकते है…
    जो व्यक्ति जितना तार्किक जितना विद्वान जितना जटिल होगा उसका भगवान भी उतना ही बड़ा होगा और जितना बड़ा होगा उसे पाना भी उतना दुर्लभ होगा..
    निष्कर्ष यह है कि बड़े सरल और सहज रूप से ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए उसमें व्यर्थ का गुणा भाग और तर्क करने से बचना चाहिए।
    पं. संजय द्विवेदी
    (शिक्षक)

    प्रतिक्रिया

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