लक्ष्मण रेखा …, किंतु रामचरितमानस, महाभारत एवं रामायण में इसका उल्लेख ही नहीं! (द्वितीय भाग – रामचरितमानस)

पिछली पोस्ट (12 मई 2010) में मैंने अपने मन में उठे इस प्रश्न का जिक्र किया था कि ‘लक्ष्मण रेखा’ का रामकथा के अंतर्गत घटित किसी घटना से क्या वाकई कोई संबंध है । जिन तीन ग्रंथों में मैंने उत्तर खोजने की चेष्टा की उनमें ऐसा कुछ भी नहीं मिला । उनमें से एक गोस्वामी तुलसीदासकृत रामचरितमानस में सीताहरण का जो वर्णन मुझे पढ़ने को मिला उसका सार्थक अंश मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं । यह पाठ मेरे पास उपलब्ध उक्त ग्रंथ की गीताप्रेस, गोरखपुर, द्वारा प्रकाशित प्रति पर आधारित है ।
(संदर्भः रामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा सं. 27 के बाद के दोहे-चौपाइयां)

प्रसंग के अनुसार जब श्रीराम द्वारा स्वर्णमृग बने मारीच का वन में वध होता है तब उसके मुख से निकले‘हा लक्ष्मण’ का आर्तनाद सुनकर सीता विचलित हो उठती हैं और श्रीराम की सहायता करने लक्ष्मण से वन में जाने का आग्रह करती हैं । संबंधित वर्णन यों हैः

जाहु बेगि संकट अति भ्राता । लछिमन बिहसि कहा सुनु माता ।।

भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई । सपनेहु संकट परइ कि सोई ।।

मरम बचन जब सीता बोला । हरि प्रेरित लछिमन मन डोला ।।

बन दिसि सौंपि सब काहू । चले जहां रावन ससि राहू ।।

सून बीच दसकंधर देखा । आवा निकट जती कें बेषा ।।

(हे लक्ष्मण, जल्दी से जाओ, तुम्हारे भाई पर संकट आ पड़ा है । उत्तरस्वरूप लक्ष्मण ने हंसते हुए कहा, “हे माता, जिसके भौं के इशारे भर से सृष्टि का ही विलय हो जाए, ऐसे राम पर सपने में भी संकट आ सकता है भला?” तत्पश्चात् जब सीता के मुख से मर्मस्पर्शी या दिल को चुभने वाले लांछनात्मक शब्द निकले तो भगवत्प्रेरणा से लक्ष्मण का मन विचलित हो गया । फलतः वे सीता को वन-देवता तथा दिक्पालों को सौंपकर वहां चल दिए, जहां रावण रूपी चंद्र के लिए राहु रूपी राम गये हुए थे । तब पर्णकुटी के स्थल को सूना पाने पर रावण यती/सन्यासी के वेष में सीता के निकट आ पहुंचा ।)

दो-चार चौपाइयों के बाद आगे तुलसी का वर्णन यों हैः

नाना बिधि करि कथा सुहाई । राजनीति भय प्रीति दिखाई ।।

कह सीता सुनु जती गोसाईं । बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं ।।

तब रावन निज रूप दिखावा । भई सभय जब नाम सुनावा ।।

(रावण ने विविध प्रकार की लुभावनी बातें सुनाकर उन्हें प्रभावित करने की चेष्टा की और राजनीति, भय तथा प्रेम के मिश्रित दांव उन पर चलाए । उसकी बातें सुनकर सीता ने कहा, “अरे यति गोसाईं, आप तो दुष्टों की तरह बात कर रहे हैं, उनके जैसा बरताव कर रहे हैं ।” तब रावण ने अपना असली रूप दिखाया, अपना परिचय उनके सामने रखा । उसका नाम सुनने पर वे भयभीत हो गईं ।)

फिर आगे की घटना यों दर्शाई हैः

कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा । आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाड़ा ।।

जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा । भएसि कालबस निसिचर नाहा ।।

सुनत बचन दससीस रिसाना । मन महुं चरन बंदि सुख माना ।।

क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाई ।

चला गगनपथ आतुर भयं रथ हांकि न जाई ।।

(भयाकुल होने के बावजूद सीता ने धैर्य से काम लिया और बोलीं, “अरे दुष्ट, जरा ठहर तो, अभी प्रभु राम लौटने ही वाले हैं । जैसे हरिबधू अर्थात् सिंहनी, (हरि माने सिंह) की कामना कोई खरगोश करे, वैसे ही, अरे निशाचर, तुम मुझे चाहकर ख्वाहमख्वाह काल के वश में हो रहे हो ।” यानी मर्यादा भूलकर अपनी मृत्यु बुला रहे हो । इन वचनों को सुनकर रावण कुपित तो हो गया, लेकिन मन ही मन सीता के चरणों की वंदना में वह सुख का भी अनुभव करने लगा । क्रोध के वशीभूत होकर उसने सीता को बलात् रथ पर बिठाया और आकाश मार्ग से उतावली के साथ चल दिया, किंतु भय के मारे उससे रथ हांका नहीं जा रहा था ।)

गोस्वामी तुलसीदास के वर्णन के अनुसार सीता द्वारा लांछन लगाए जाने पर लक्ष्मण ने उनकी सुरक्षा के बाबत वनदेवताओं से प्रार्थना की, और राम की सहायता के लिए चल पड़े । यह उल्लेख कहीं नहीं है कि वे कुटिया के बाहर किसी प्रकार का घेरा खींचकर गये, जिसका अतिक्रमण करने पर रावण भस्म हो जाता । कथा के अनुसार तो आरंभ में सीता ने रावण का आतिथ्य-सत्कार ही किया । दोनों के बीच बातें भी हुई, और जब साथ चलने के रावण के आग्रह को सीता ने ठुकराया, तब रावण ने कुपित हो उनका अपहरण किया ।

कुल मिलाकर ‘लक्ष्मण रेखा’ की बात कहीं पर नहीं कही गई है । महाभारत में भी मिलता-जुलता वर्णन पढ़ने को मिलता है, और लक्ष्मण रेखा की बात वहां भी नहीं कही गयी है । इस प्रकरण की महाभारत पर आधारित चर्चा आगामी आलेख का विषय रहेगा । – योगेन्द्र जोशी

 

इस पोस्ट में कालांतर में यह जोड़ा गया:

रामचरितमानस के लंकाकांड में चौपाइयों की ये दो पंक्तियां पढ़ने को मिलती हैं:

कंत समुझि मन तजहु कुमतिही । सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही ॥

रामानुज लघु रेख खचाई । सोउ  नहिं नाघेहु असि मनुसाई ॥

(श्रीरामचरितमानस सटीक, मझला साइज़, गीताप्रेस, गोरखपुर, १९वां पुनर्मुद्रण, सं. २०६३, लंकाकांड, पृष्ठ ७३९)

अर्थ: (प्रसंग के अनुसार महारानी मंदोदरी लंकानरेश रावण को समझाती हैं कि) हे कांत, अपने मन में किंचित विचार करो, श्रीराम और तुम्हारे मध्य यह युद्ध शोभा नहीं देता । राम के छोटे भाई (लक्ष्मण) ने छोटी-सी रेखा खींची थी, उसी को तुम लांघ नहीं पाये ऐसा तो तुम्हारा पुरुषार्थ है।

मंदोदरी के कथन के अनुसार रावण में इतना पुरुषार्थ नहीं था कि वह सीता की सुरक्षा के लिए लक्ष्मण द्वारा खींचा गया घेरा लांघ सकता । यहां यह सवाल उठता है कि मंदोदरी को कैसे पता चला कि सीता की सुरक्षा के लिए लक्ष्मण ने क्या प्रबंध किया था । वह स्वयं चस्मदीद गवाह तो हो नहीं सकती थी, क्योंकि वह सीताहरण के लिए रावण के साथ गई नही थी । ऐसे अवसर पर तो एक ही व्याख्या समीचीन हो सकती है कि उसे ऐसा किसी न किसी से सुनने को मिला होगा । मंदोदरी के सुने वचन – आंखों देखी घटना नहीं – को अधिक विश्वसनीय माना जाना चाहिए या ग्रंथकार ने रावण-सीता की भेंट, वार्तालाप, आदि का जो वर्णन किया है उस पर भरोसा किया जाए ? उस प्रकरण के अनुसार तो आरंभ में सभी कुछ सामान्य एवं सौहार्दपूर्ण था । मैं उसी वर्णन को मान्य समझता हूं और मंदोदरी के वक्तव्य को सुनी-सुनाई बात कहूंगा । इसलिए मेरे मत में लक्ष्मण रेखा की बात कथा के अनुसार काल्पनिक ही कही जायेगी । – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. santosh m unecha
    फरवरी 18, 2013 @ 16:15:38

    lankakand me mandodari ravan ko phatkarti hai ki ap chhotisi laxman rekha nahi lang sake to sri ram ko kia maroge padhiye

    प्रत्युत्तर में –
    बात सही है कि मन्दोदरी ने उलाहना के ये शब्द बोले हैं। लेकिन असल घटना का जो वर्णन काव्यकार (वाल्कीकि हों या व्यास या तुलसी) ने प्रस्तुत किया है वह सर्वथा भिन्न है। मन्दोदरी स्वयं उस घटना की प्रत्यक्षदर्शी नही रही होगी (कथा के अनुसार)। उसके उद्गार किस जानकारी पर आधारित रही होगी, कह पाना कठिन है। मेरे मत में उसे अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता है।

    प्रतिक्रिया

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