लक्ष्मण रेखा …, किंतु रामचरितमानस, महाभारत एवं रामायण में इसका उल्लेख ही नहीं! (तृतीय भाग – महाभारत)

पिछली दो पोस्टों (देखें 12 मई एवं 13 मई, 2010) में मैंने इस बात की चर्चा की थी कि रामकथा से संबंधित तीन महान् ग्रंथों, रामचरितमानस, महाभारत एवं रामायण, में ‘लक्ष्मण रेखा’ का कहीं उल्लेख नहीं मिलता । मैं आगे दी गयी पाठ्य सामग्री में किंचित् विस्तार से सीताहरण का वह वर्णन प्रस्तुत कर रहा हूं जो वेदव्यासरचित महाभारत में उपलब्ध है । उक्त ग्रंथ के वनपर्व में रामकथा का वर्णन है । संबंधित स्थल पर स्वर्णमृग मारीच के मारे जाने के पश्चात् की घटनाओं का वर्णन इस प्रकार किया है:
(संदर्भः व्यासरचितमहाभारत, वनपर्व, अध्याय २७८, श्लोक २४ एवं उसके आगे ।)

सा प्राद्रवत् यतः शब्दस्तामुवाच लक्ष्मणः ।
अलं ते शङ्कया भीरु को रामं प्रहरिस्यति ।।२४।।
मृहूर्ताद् द्रक्ष्यसे रामं भर्तारं त्वं शुचिस्मिते ।
इत्युक्ता सा प्ररुदती पर्यशङ्कत लक्ष्मणम् ।।२५।।
हता वै स्त्रीस्वभावेन शुक्लचारित्रभूषणा ।
सा तं परुषमारब्धा वक्तुं साध्वी पतिव्रता ।।२६।।

[ स्वर्णमृग बने मारीच ने श्रीराम के वाण से आहत होने पर ‘हे लक्ष्मण’ पुकारते हुए जब आर्तनाद किया और उसकी ध्वनि सीता ने सुनी तो वे विचलित हो बैठीं और …]
जिस ओर से शब्द सुनाई दिये उस ओर दौड़ पड़ीं । लक्ष्मण ने उन्हें समझाते हुए कहा “हे भीरु, किसी प्रकार की शंका मत करें, राम पर प्रहार कर सकने की सामर्थ्य भला किस में है । शुचिस्मिते, क्षण भर में ही आपको अपने पति श्रीराम के दर्शन मिल जाएंगे ।” ऐसा कहे जाने पर वे रोते हुए लक्ष्मण को शंका की दृष्टि से देखने लगीं । उज्ज्वल चरित्र वाली उन सीता की उस समय सहज स्त्री स्वभाव के कारण मति मारी गई । फलतः पतिव्रता साध्वी नारी सीता उन लक्ष्मण को कठोर, लांछनात्मक, वचन बोलने लगीं ।
[भीरु के शाब्दिक अर्थ है साहसहीन या संकोची । पौराणिक संस्कृत काव्यों में इसका प्रयोग स्त्रियों के प्रति संबोधन के रूप में देखने को मिलता है । शुचिस्मिते माने हे निष्कपट मुस्कान वाली ।]

अगले २७-२८ श्लोकों के बाद ऐसा उल्लिखित है:

निहीनमुपतिष्ठेयं शार्दूली क्रोष्टुकं यथा ।
एतादृशं वचः श्रुत्वा लक्ष्मणः प्रियराघवः ।।२९।।
पिधाय कर्णौ सद्वृत्तः प्रस्थितो येन राघवः ।
स रामस्य पदं गृह्य प्रससार धनुर्धरः ।।३०।।
अवीक्षमाणो बिम्बोष्ठीं प्रययौ लक्ष्मणस्तदा ।
एतस्मिन्नन्तरे रक्षो रावणो प्रत्यदृश्यत ।।३१।

जैसे सिंहनी सियार को स्वीकार नहीं कर सकती वैसे ही मैं तुम्हारी नहीं हो सकती । [कथन का अभिप्राय है कि सीता ने लक्ष्मण पर यह आक्षेप लगाना आंरभ किया वे चाहते हैं कि राम न रहें ताकि वे उन्हें अपनी भार्या बना सकें ।] राम के प्रिय तथा सदाचारी लक्ष्मण ने ऐसे कटु वचन सुनकर अपने दोनों कान ढक लिए और हाथ में धनुष लिए हुए उसी मार्ग पर चल दिए जिससे राम गये थे । बिम्बफल की भांति रक्तिम होंठों वाली सीता पर दृष्टि डाले बिना उन्होंने प्रस्थान किया । इसी बीच (अवसर पाकर) रावण वहां दिखाई दे पड़ा अर्थात् उपस्थित हो गया । [बिम्बफल – एक विशेष फल जो पकने पर सुर्ख लाल दिखता है ।]

अभव्यो भव्यरूपेण भस्मच्छन्न इवानल ।
यतिवेशप्रतिछन्नो जिहीर्षुस्तामनिन्दिताम् ।।३२।।
सा तमालक्ष्य सम्प्राप्तं धर्मज्ञा जनकात्मजा ।
निमन्त्रयामास तदा फलमूलाशनादिभिः ।।३३।।
अवमन्य ततः सर्वं स्वरूपं प्रत्यपद्यत ।
सान्त्वयामास वैदेहीमिति राक्षसपुङ्गवः ।।३४।।
सीते राक्षसराजो९हं रावणो नाम विश्रुतम् ।
मम लङ्कापुरी नाम्ना रम्या पारे महोदधेः ।।३५।।

सामान्यतः भयानक रूप वाले उस राक्षस रावण ने सुंदर छवि के साथ यति या संन्यासी के छद्म रूप से अपने को ढक रखा था, राख के भीतर छिपी सुलगती आग की भांति । संन्यासी रूपी रावण को पास आया देख धर्मकर्म में आस्था वाली सीता उसका कंद-मूल-फलों जैसे भोज्य पदार्थों से आदर-सत्कार करने लगीं । उस सब को नजरअंदाज करते हुए वह राक्षसराज अपने असल रूप में प्रकट हो गया और सीता को यों समझाने लगाः हे सीते, मैं राक्षसों का राजा हूं और रावण के नाम से जाना जाता हूं । महासागर के पार लंका नाम से मेरी रमणीय नगरी वसी है ।

इतना बताने के बाद रावण सीता के समक्ष उसकी महारानी बनने का प्रलोभन प्रस्तुत करता है:

तत्र त्वं नरनारीषु शोभिष्यसि मया सह ।
भार्या भव मम सुश्रोणि तापसं त्यज राघवम् ।।३६।।
एवमादीनि वाक्यानि श्रुत्वा तस्याथ जानकी ।
पिधाय कर्णौ सुश्रोणी मैवममित्यब्रवीत् वचः ।।३७।।

वहां लंका में तुम मेरे संग नर-नारियों के मध्य शोभायमान होगी, अतः मेरी भार्या बन जाओ और बेचारे तपस्वी राम को छोड़ दो । रावण के मुख से इसी प्रकार की और भी बातें सुनने पर सीता ने अपने कान बंद करते हुए उससे वैसे निन्द्य वचन न बोलने का आग्रह किया ।

सीता रावण को और भी खरीखोटी सुनाती है जिसका वर्णन अगले ३८-४० श्लोकों में मिलता है । अंत में वह कुपित हो अपनी पर्णकुटी के भीतर जाने लगती है । देखे:

इति सा तं समाभाष्य प्रविवेशाश्रमं ततः ।
क्रोधात् प्रस्फुरमाणौष्ठी विधुन्वाना करौ मुहुः ।।४१।।
तामभिद्रुत्य सुश्रोणीं रावणः प्रत्यषेधयत् ।
भर्त्सयित्वा तु रुक्षेण स्वरेण गतचेतसाम् ।।४२।।

इतना सब कहने के बाद क्रोध के कारण फड़फड़ाते होठों के साथ और अपने हाथ मसलती हुई सीता अपने आश्रम (कुटी) के अंदर प्रवेश करने लगती है । तुरंत लपकते हुए और रूखे शब्दों से डराते-धमकाते हुए रावण बदहवास-सी सीता का रास्ता रोक देता है ।

इसके बाद की कहानी सीता का रावण द्वारा जबरन उठाये जाने की है । ऐसा विवरण कहीं नहीं है कि उसने सीता से किसी सुरक्षा घेरे से बाहर निकलकर भिक्षा देने की मांग की हो । कुल मिलाकर न तो लक्ष्मण द्वारा खींचे गये सुरक्षा घेरे का उल्लेख है और न ही सीता द्वारा उस घेरे के उल्लंघन का ।

तब ‘लक्ष्मण रेखा’ की कथा कहां से प्रचलन में आई होगी ? सीताहरण का उपर्युक्त जैसा ही वर्णन कमोबेश वाल्मीकीय रामायण में भी मिलता है । अगले आलेख में उसकी चर्चा । – योगेन्द्र जोशी

14 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. arvind mishra
    मई 19, 2010 @ 19:20:40

    पहले मैं भी यही समझता था मगर मेरी और अब आपकी भी यह भूल है -लंकाकांड में मंदोदरी रावण से कहती है की आप तो उनकी एक रेखा तक नहीं लाघ पाए अब उनसे युद्ध करने का भ्रम पाले हैं ! फिर से चैक करें !

    प्रतिक्रिया

    • narendra saraswat
      नवम्बर 20, 2010 @ 08:54:55

      mein nahin manta ki ravan sita ko har ke le gaya tha

      प्रत्युत्तर में –
      संभव है कि आपका मानना सही हो। किंतु शंका करने वाले तो यह भी सवाल उठा सकते हैं कि रामायण की घटना वास्तव में कभी घटी थी? मेरे पास कोई उत्तर नहीं है। संबंधित ग्रंथों में जो लिखा है वह मेरे लेखन का विषय रहा है, उसकी सत्यता पर मेरी ठोस कोई राय नहीं । – योगेन्द्र जोशी

      प्रतिक्रिया

  2. nitish
    जून 02, 2010 @ 15:46:22

    jab laksman ji vaha se gaye to unko aapni jimadari ka aahsas tha,janay se pahlay unhonay vo rekha kichi thi or aapni sita maa se kaha tha ki aap is rekha ko bhulvash bhi paar na karna,ye lakshman reka aap or bhaiya ram k atirikt koi or paar nahi kar sakta.na hi koi isko mita sakta hai.CHECK IT AGAIN

    प्रतिक्रिया

  3. L P SINGH
    जून 23, 2010 @ 18:56:45

    aapne jo mahabharat ke van parv me Ramayan ka ulekh bataya hai vistav me wah sankshipt me Ramayan katha hai. Ramcharit manas me tulsi dasjine “Lakshman Rekha” ka ulekh kiya hai. TV serial Ramayan me shri Ramanand Sagar jee ne bhi “Lakshman Rekha” dikhaya hai aur unka kahna hai ki TV Serial Ramayan kai Ramayan aur anya purano, etc ka saransh hai. Purane Ramcharitmans me Kshepak Kathao ka varnan kiya gya hai.
    So u are request for check again.

    श्रीमान् सिंह जी, टिप्पणी के लिए धन्यवाद । आपके प्रश्न के उत्तर में मेरे पास कहने को यह है:
    मैंने इस विषय में तीन ग्रंथों का जिक्र किया है – रामचरितमानस, महाभारत, एवं रामायण । इन तीनों ग्रंथों में मारीचवध तथा सीताहरण का जो वर्णन दिया गया है उसमें लक्ष्मणरेखा का कहीं उल्लेख नहीं है । वहां स्पष्टतः लिखा गया है कि सीता ने संन्यासी वेश में आये रावण का स्वागत किया, बाद में दोनों ने एक-दूसरे को अपना-अपना परिचय दिया, रावण ने सीता को साथ चलने को कहा, और अंत में सीता के न मानने पर रावण सीता को बलात् उठा ले गया । तत्संबंधित दोहे-श्लोकों के उद्धरण भी मैंने दिए हैं । हो सकता है इनसे भिन्न अन्य ग्रंथों में सुरक्षा घेरे का उल्लेख हो । अवश्य ही आम प्रचलन में जो कथाएं सुनने में आती हैं उनमें इस प्रकार की बातें हैं, किंतु प्रश्नगत तीन ग्रंथों में । मेरे पास उक्त तीनों ग्रंथों की ‘गीताप्रेस गोरखपुर’ से प्रकाशित प्रतियां हैं । अगर अन्यत्र प्रकाशित ग्रंथों में कुछ भिन्न विवरण हो तो मैं कह नहीं सकता । वाल्मीकिरचित रामायण को आदि ग्रंथ कहा गया है, और उसे इस संदर्भ में अधिक प्रामाणिक मानने की बात सोची जा सकती है । तुलसीकृत रामचरित्मानस के लंकाकांड में एक स्थल पर मंदोदरी के मुख से कुछ ऐसा ‘तुम तो एक घेरे को भी न लांघ सके!’ है जैसा मुझे याद आ रहा है । किंतु उसे महत्व नहीं दिया जा सकता, क्योंकि मंदोदरी सीताहरण की साक्षी तो थी नहीं । असल घटना का जो विवरण उक्त ग्रन्थों में है उसमें तो ऐसा नहीं लिखा है । इससे अधिक न मैंने पढ़ा है न खोजा है । जो मेरी नजर आया वह मैने लिखा ।
    इससे अधिक कुछ कहने को मेरे पास नहीं है । – योगेन्द्र जोशी

    प्रतिक्रिया

  4. ramkumar
    सितम्बर 12, 2010 @ 10:38:01

    kisi bhi garanth ka tika tippri nahi karni chahye jaisa ki sadu sant kahte hai

    प्रतिक्रिया

  5. Dilip kumar prasad.
    सितम्बर 13, 2010 @ 19:48:58

    aap ne jo likha ki Lakshman ji koi aisa rekha khicha hi nahi magar tulsi ramayan me or sagar art ki jo ramayan hai usme to dikhlaya hai ki lakshman bhaiya rekha khiche hai, kahane ke liye to log risi muni bhi yahi ulekh kiye hai. magar sasstra kuchh or kahta hai. itihaas ko koi mitta nahi sakta. Dilip from ankuri, aurangabad bihar.

    प्रतिक्रिया

  6. ganeshpriye dadhich
    नवम्बर 28, 2010 @ 10:05:17

    shiriman jai ram g ki ..jo mahan granth ha unke uper charcha jrur honi chahiye ,,lekin minmakh nikalne k liye jo charcha bindu uttaye jate ha wo ant me janbhawnao ko aandolit karte ha ,agar bodhikta or advavc thinking ka arth snatan garntho ki bakhiya udhedna hi ha to mei samjhta hu ki sb ..pujypursho me dosh nikalna aaj k pde likhe smaj ka fashion bn gya ha laxmn ne rekha khinchi k na ram ne sita ko ye kha k na wo suna k na ..in sb ko prcharit krne ka udeya mujhe to aaj tk smjh n aaya baki aap vigya mujhse jyada jante ho or aap jo krte ha uttam hi hoga g..parnam g

    प्रत्युत्तर में –
    करें कि मैं आपसे सहमत नहीं हूं । मैंने किसी ग्रंथ पर कोई आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं की है । मैंने केवल इतना कहा है कि जिन ग्रंथों को मैंने देखा/पढ़ा और जिनका संदर्भ दिया गया उनमें लक्ष्मण रेखा का उल्लेख नहीं है, जब कि आम लोग अक्सर लक्ष्मण रेखा जैसे शब्द का प्रयोग बोलचाल में करते हैं । मेरे समझ में नहीं आता कि इतनी-सी बात से कोई क्यों आहत हो जाता है । अगर कोई कहे कि महाभारत में अमुक बात कही गई है और वह बात वस्तुतः उस ग्रंथ में कहीं देखने को न मिले, तो महज उस तथ्य का उल्लेख करने से किसी को क्यों रोका जाए ? – योगेन्द्र जोशी

    प्रतिक्रिया

  7. ranjeet kumar
    जनवरी 06, 2011 @ 22:47:11

    kisi bhi granth par tippni nahi karna chahiye

    प्रत्युत्तर –

    रंजीत जी, धन्यवाद । आपसे इस बात को कहने पर क्षमा मांगना चाहूंगा कि किसी ग्रंथ में कोई कथा उसी रूप में वर्णित न हो जैसा लोगों के मुखसे सुनने को मिलता हो, और इस बाबत कुछ कहा जा रहा हो तो इसमें आपत्तिजनक क्या है । मैं किसी ग्रन्थ के बारे में भला-बुरा तो कह नहीं रहा हूं । मेरा कहना सिर्फ़ इतना है कि जिस लक्ष्मण-रेखा की लोग बात करते हैं उसका उल्लेख इन ग्रंथों में नहीं है । अगर यह झूठ है तो मिथ्याभाषण पर आपत्ति होनी चाहिए । यदि यह सच है तो उस सत्य के कहे जाने पर आपत्ति क्य़ों ? – योगेन्द्र जोशी

    प्रतिक्रिया

  8. नीलेश
    अप्रैल 19, 2011 @ 18:09:57

    श्रीमानजी, आप ने ठीक से पढ़ा नहीं, बिना पूरी जानकारी के कोई कमेन्ट नहीं करना चाहिए

    लक्ष्मण रेखा का उल्लेख श्रीरामचरितमानस में किया गया है .

    प्रत्युत्तर में –

    टिप्पणी के लिए धन्यवाद । क्षमा करें कि मैं “ठीक के पढ़ा नहीं” का मतलब समझ नहीं पाया । ठीक से पढ़ना क्या होता है यह स्पष्ट किया होता तो अच्छा होता । मैंने रामचरितमानस ग्रंथ के अरण्यकांड का हवाला देते हुए कुछएक दोहा-चौपाइयों का जिक्र किया है जो सीताहरण के प्रकरण से जुड़े हैं । चूंकि पूरे वर्णन में कहीं लक्ष्मण रेखा का जिक्र नहीं दिखा तो मैने वही निष्कर्ष निकाला । मुझे जिक्र मिला होता तो अवश्य लिखता । झूठ बोलने की मुझे जरूरत क्योंकर होगी मैं समझ नहीं पाता । मेरे कोई पूर्वाग्रह इस विषय पर नहीं हैं । लक्ष्मण रेखा की बात हो तो मुझे कोई हानि नहीं और उसका उल्लेख न हो तो कोई लाभ नहीं । मेरे पास गीताप्रेस गोरखपुर से छपी प्रति है । यदि वही अपूर्ण हो तो मैं कुछ नहीं कह सकता । संभव है कि प्रचलन में परस्पर भेद रखने वाले संस्करण उपलब्ध हों, किसी में एक वर्णन तो किसी अन्य में किंचित्‌ भिन्न । हो सकता है किसी में लक्ष्मण रेखा की बात हो । यदि आपने उन दोहों-चौपाइयों का उल्लेख किया होता जिनमें उक्त बातें हों तो मुझे सुधार करने का आधार मिल जाता । फिलहाल तो मैं अपने पास के ग्रंथ को ही आधार मान रहा हूं । हां इतना मुझे याद पड़ता है कि लंकाकांड में किसी स्थल पर मंदोदरी ने रावण की सामर्थ्य को आंकते हुए लक्ष्मण रेखा न लांघ पाने की बात कही है । पर यह अन्यत्र है, न कि सीता हरण के वर्णन में प्रत्यक्षतः जहां सीता द्वारा रावण की आवभगत की बात कही गयी है । इससे अधिक स्पष्टीकरण मेरे लिए संभव नहीं । – योगेन्द्र जोशी

    प्रतिक्रिया

  9. नीलेश
    अप्रैल 20, 2011 @ 22:04:13

    श्रीमानजी,

    जैसा आपने लिखा है कि-
    “रामकथा से संबंधित तीन महान् ग्रंथों, रामचरितमानस, महाभारत एवं रामायण, में ‘लक्ष्मण रेखा’ का कहीं उल्लेख नहीं मिलता ।”

    इसलिए ही मैंने लिखा कि आपने ठीक से पढ़ा नहीं, क्योंकि कम से कम श्रीरामचरितमानस में एक जगह लक्ष्मण रेखा का उल्लेख है ।

    जहाँ तक गीता प्रेस से प्रकाशित श्रीरामचरितमानस का सवाल है तो यहाँ से परस्पर भेद रखने वाले संस्करण नहीं निकलते हैं । किसी भी प्रकाशन की श्रीरामचरितमानस देखिये तो निम्न चौपाई लंकाकाण्ड में जरूर मिलेगी-

    ” रामानुज लघु रेख खचाई । सोउ नहि नाघेहु असि मनुसाई ।।”

    ( रामानुज=लक्ष्मण, रेख= रेखा; यानी लक्ष्मण रेखा )

    अब चूँकि यह चौपाई लंकाकाण्ड में लिखी है, अरण्यकाण्ड में सीताहरण के समय नहीं लिखी है । केवल इसलिए आप ऐसा नहीं लिख/ कह सकते कि श्रीरामचरितमानस में लक्ष्मण रेखा का उल्लेख नहीं है ।

    आजकल ऐसे कमेन्ट और प्रश्न बहुत मिलते हैं । जिस आधार पर आपने लिख दिया कि ‘लक्ष्मण रेखा का उल्लेख श्रीरामचरितमानस में नहीं है । इसी आधार पर आप ऐसा भी लिख सकते हैं कि वाल्मीक रामायण में जयंत द्वारा चोंच मारने की घटना नहीं लिखी है । क्योंकि वाल्मीक रामायण में यह घटना सुंदरकाण्ड में लिखी गई है । वहाँ यानी अयोध्याकाण्ड या अरण्यकाण्ड में नहीं लिखी गई है जब श्रीसीतारामजी चित्रकूट में थे ।

    धन्यवाद ।

    प्रतिक्रिया

  10. kamleshpandey
    अगस्त 08, 2011 @ 08:51:21

    http://parmeshwarpandey.blogspot.com यह बहूत खास बहस है।जहां तक लक्षमणरेखा की बात है तो उसे नकारना ठीक नही

    प्रतिक्रिया

  11. पं. नंद किशोर मिश्र
    सितम्बर 04, 2011 @ 18:36:14

    श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास जी ने अरण्यकाण्ड में लक्ष्मणरेखा का वर्णन नहीं किया है।

    प्रतिक्रिया

  12. rajendra agarwal
    जुलाई 08, 2012 @ 23:52:15

    कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही।
    ===========================================
    रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई।।
    ========================================

    पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा।।
    कौतुक सिंधु नाघी तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका।।
    रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा।।
    जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा।।
    अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु।।
    पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुल बल जानहु।।
    बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा।।
    जनक सभाँ अगनित भूपाला। रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला।।
    भंजि धनुष जानकी बिआही। तब संग्राम जितेहु किन ताही।।
    सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा।।
    सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी।।
    दो0-बधि बिराध खर दूषनहि लीँलाँ हत्यो कबंध।
    बालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध।।36।।

    प्रतिक्रिया

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