लक्ष्मण रेखा …, किंतु रामचरितमानस, महाभारत एवं रामायण में इसका उल्लेख नहीं! (चतुर्थ भाग – रामायण)

(संबंधित पिछ्ली पोस्टें: १२ मई, १३ मई एवं १९ मई)

वाल्मीकीय रामायण में सीता-रावण संवाद और तत्पश्चात् के सीताहरण का तुलसीदासकृत रामचरितमानस तथा व्यासरचित महाभारत की तुलना में अधिक विस्तृत विवरण मिलता है । संबंधित कथा संस्कृत के इस आदिकाव्य के अरण्यकांड में उपलब्ध है । सीता का लक्ष्मण द्वारा समझाये जाने और फिर उनका रावण के साथ संपन्न वार्तालाप का प्रकरण ४५वें से ४९वें सर्ग में कुल १९२ श्लोकों के माध्यम से वर्णित है । अपनी बात कहने के लिए मैं इन सर्गों के कुछ चुने हुए श्लोकों को उद्धृत कर रहा हूं । मैं यह चर्चा उस घटना के आगे से आरंभ करता हूं जब राम द्वारा वन में मारीच का वध होता है और वह ‘हा लक्ष्मण’ की पुकार लगाकर सीता को भ्रमित करता है:

आक्रन्दमानं तु वने भ्रातरं त्रातुमर्हसि ।
तं क्षिप्रमभिधाव त्वं भ्रातरं शरणैषिणम् ॥
रक्षसां वशमापन्नं सिंहानामिव गोवृषम् ।
न जगाम तथोक्तस्तु भ्रातुराज्ञाय शासनम् ॥
तमुवाच ततस्तत्र क्षुभिता जनकात्मजा ।
सौमित्रे मित्ररूपेण भ्रातुः त्वमसि शत्रुवत् ॥
यस्त्वमस्यामवस्थायां भ्रातरं नाभिपद्यसे ।
इच्छसि त्वं विनश्यन्तं रामं लक्ष्मण मत्कृते ॥

(वाल्मीकिरचित रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग ४५, छन्द ३-६)

(उस समय बेचैन हो रही सीता देवर लक्ष्मण से कहती हैं) “अरे लक्ष्मण, वन में आर्त स्वर से पुकार रहे अपने भ्राता को बचाने चल पड़ो । तुम्हारी सहायता की अपेक्षा रखने वाले अपने भाई के पास शीघ्रता से जाओ । वे राक्षसों के वश में पहुंच रहे हैं जैसे कोई सांड़ सिंहों से घिर जाये ।” किंतु ऐसा कहे जाने पर भी लक्ष्मण अपने भाई के आदेश को विचारते हुए वहां से नहीं हिले । तब उस स्थल पर (लक्ष्मण की उदासीनता से) क्षुब्ध हो रहीं जनकपुत्री ने कहा “अरे सुमित्रानंदन, तुम तो मित्र के रूप में अपने भाई के शत्रु हो, जो कि तुम इस (संकट की) अवस्था में भाई के पास नहीं पहुंच रहे हो । तुम मेरे खातिर राम का नाश होते देखना चाहते हो ।”

वस्तुतः सीता ने लक्ष्मण पर यह आक्षेप लगा दिया कि तुम इस ताक में हो कि राम न रहें, ताकि मौके का लाभ उठाते हुए तुम मुझे अपनी भार्या बना सको । उन्होंने लक्ष्मण पर तरह-तरह के लांछन लगाते हुए अपशब्द कहना आरंभ किया । प्रत्युत्तर में लक्ष्मण ने उन्हें समझाने की भरसक कोशिश की:

अब्रवील्लक्ष्मणस्तां सीतां मृगवधूमिव ।
पन्नगासुरगन्धर्वदेवदानवराक्षसैः ॥
अशक्यस्तव वैदेही भर्ता जेतुं न संशयः ।

(पूर्वोक्त, सर्ग ४५, छन्द १०, ११ का पूर्वार्ध)
हिरणी की भांति डरी-सहमी-सी सीता को (ढाढ़स बधाते हुए) लक्ष्मण बोले, “हे विदेहनंदिनी, इसमें तनिक भी शंका नहीं है कि आपके पति श्रीराम नाग, असुर, गंधर्व, देव, दानव और राक्षसों के द्वारा भी नहीं जीते जा सकते हैं ।” (फिर क्यों इतनी चिंतित हो रही हैं ?)

राक्षसा विविधा वाचो आहरन्ति महावने ।
हिंसाविहारा वैदेहि न चिन्तयितुमर्हसि ॥
लक्ष्मणेनैवमुक्ता तु क्रुद्धा संरक्तलोचना ।
अब्रवीत्परुषं वाक्यं लक्ष्मणं सत्यवाहदनम् ॥

(पूर्वोक्त, सर्ग ४५, छन्द १९-२०)
हे वैदेही, आप चिंता न करें, इस बड़े वन में राक्षसगण, जिनका मनोरंजन ही हिंसा में निहित रहता है, नाना प्रकार की बोलियां बोलते रहते हैं । लक्ष्मण के ऐसा कहने पर क्रुद्ध तथा रक्तिम हो चुकी आंखों वाली सीता सत्यवादी लक्ष्मण को कटु शब्द कहने लगीं ।

सीता ने बहुत कुछ भला-बुरा कहा जिससे लक्ष्मण का विचलित होना स्वाभाविक था । तब न चाहते हुए भी उन्होंने राम के पास चले जाना ही उचित समझाः

ततस्तु सीतामभिवाद्य लक्ष्मणः कृताञ्जलि किञ्चिदभिप्रणम्य ।
अवेक्षमाणो बहुशः स मैथिलीं जगाम रामस्य समीपमात्मवान् ॥

(पूर्वोक्त, सर्ग ४५, छन्द ४०)
तब हाथ जोड़े हुए आत्मसंयमी लक्ष्मण ने नतमस्तक हो सीता को प्रणाम किया और उनकी ओर (चितिंत दृष्टि से) बारंबार देखते हुए वे श्रीराम के पास चले गये ।

तदासाद्य दशग्रीवः क्षिप्रमन्तराश्रितः ।
अभिचक्राम वैदेहीं परिव्राजकरूपधृक् ॥

(पूर्वोक्त, सर्ग ४६, छन्द २)
और तब संन्यासी का रूप धरे रावण को उपयुक्त अवसर मिल गया, अतः वह शीघ्रता से वैदेही सीता के पास आ पहुंचा ।

द्विजातिरूपेण हि तं दृष्ट्वा रावणमागतम् ।
सर्वैरतिथिसत्कारैः पूजयामास मैथिली ॥
उपानीयासनं पूर्वं पाद्येनाभिनिमन्त्र्य च ।
अब्रवीत् सिद्धमित्येव तदा तं सौम्यदर्शनम् ॥

(पूर्वोक्त, सर्ग ४६, छन्द ३३, ३४)

उस रावण को ब्राह्मण वेष में आया देख सीता ने आतिथ्य-सत्कार की सभी विधियों से उसका पूजन किया, यानी आदर-सम्मान दिया । सौम्य प्रतीत हो रहे उस (अतिथि) को सीता ने पहले आसन प्रदान करते हुए पैर धोने हेतु पानी दिया और फिर उन्होंने भोजन तैयार रहने की बात कही । (आसन एवं जल प्रदान करना आतिथ्य की परंपरा सदा से रही है ।)

रामायण के अनुसार आरंभ में सीता और रावण के मध्य पर्याप्त संवाद होता है । सीता अपना परिचय देते हुए विस्तार से बताती हैं कि क्यों और कैसे वह राम-लक्ष्मण के साथ वनवास भोग रही हैं । वार्तालाप के दौरान रावण भी अपना परिचय देता है और सीता को उसकी रानी बनकर सुख भोगने का प्रलोभन देता है । वह बताता है:

लङ्का नाम समुद्रस्य मध्ये मम महापुरी ।
सागरेण परिक्षिप्ता निविष्टा गिरिमूर्धनि ॥
तत्र सीते मया सार्धं वने विचरिस्यति ।
न चास्य वनवासस्य स्पृहयिष्यसि भामिनि ॥

(पूर्वोक्त, सर्ग ४७, छन्द २९, ३०)

“चारों ओर फैले जल से घिरी और पर्वत शिखर पर अवस्थित
समुद्र के मध्य में लंका नाम की मेरी पुरी है । हे भामिनी, वहां मेरे साथ तुम वनों-उपवनों में विहार करोगी और इस वनवास के जीवन की तुम्हें इच्छा ही नहीं रह जाएगी ।” (भामिनी = तरुणी, कामिनी, जिसे देख मन मचल उठे ।)

रावण सीता को भांति-भांति से लुभाने का प्रयास करता है, किंतु सीता के लिए रावण के प्रस्ताव सर्वथा अस्वीकार्य थे । उन्होंने राम की प्रशंसा करते हुए रावण को तुच्छ घोषित कर दिया, और फटकार लगाईः

पूर्णचन्द्राननं रामं राजवत्सं जितेन्द्रियम् ।
पृथुकीर्तिं महाबाहुमहं राममनुव्रता ॥
त्वं पुनर्जम्बूकः सिंहीं मामिच्छसि दुर्लभाम् ।
नाहं शक्या त्वया स्प्रष्टुमादित्यस्य प्रभा यथा ॥

(पूर्वोक्त, सर्ग ४७, छन्द ३६, ३७)

(अरे रावण,) राजकुमार राम का मुख पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह सुंदर है, वे जितेन्द्रिय और महान् यशस्वी हैं । ऐसे महाबाहु राम में ही मेरा मन लगा है । तुम तो महज गीदड़ हो जो मुझ दुर्लभ सिंहनी को पाने की इच्छा रखते हो । समझ लो कि जैसे सूर्य के प्रकाश को हाथ नहीं लगा सकता वैसे ही तुम मुझे छू भी नहीं सकते । (सीता का मंतव्य था कि जैसे सूर्य से उसकी आभा अलग नहीं की जा सकती वैसे ही उन्हें भी राम से अलग नहीं किया जा सकता है ।)

और आगे वे यह भी कहती हैं:

अपहृत्य शचीं भार्यां शक्यमिन्द्रस्य जीवितुम् ।
नहि रामस्य भार्यां मामानीय स्वस्तिमान् भवेत् ॥

(पूर्वोक्त, सर्ग ४८, छन्द २३)

इंद्र देवता की भार्या शची का अपहरण करने पर भी जीवित रह जाना संभव है, परंतु राम की मुझ भार्या को ले जाकर कोई कुशल से रह सके यह संभव नहीं । तात्पर्य यह है कि राम द्वारा उसका विनाश अवश्यंभावी है ।

सीता ने इस प्रकार की तमाम बातें सुनाकर रावण को धिक्कारा । वह ता पहले से ही एक उद्येश्य लेकर चल रहा था । सीता के सीधे तौर पर न मानने पर उसने बलात् उन्हें ले जाने का मन बनायाः

अभिगम्य सुदुष्टात्मा राक्षसः काममोहितः ।
जग्राह रावणः सीतां बुधः खे रोहिणीमिव ॥
वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण सः ।
ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना ॥

(पूर्वोक्त, सर्ग ४९, छन्द १६, १७)

काम से मोहित अतिदुष्ट राक्षस रावण ने सीता के निकट जाकर उन्हें पकड़ लिया, मानों कि आकाश में बुध ने रोहिणी को जकड़ लिया हो । उसने कमलनयनी सीता के सिर के बालों को बायें हाथ से पकड़ा और जांघों के नीचे से दांया हाथ डालकर उन्हें उठा लिया । (पौराणिक कथा के अनुसार रोहिणी चंद्रमा की पत्नी थी और बुध उनका पुत्र । मैं नहीं जानता कि इस पुत्र-पत्नी के रिश्ते का गंभीर अर्थ क्या है । यहां कवि ने आलंकारिक वर्णन प्रस्तुत किया है । बुध ने अपनी माता रोहिणी का अपहरण नहीं किया था । माता सदृश सीता का अपहरण उतना ही गर्हित था जितना बुध द्वारा रोहिणी का अपहरण, जो वस्तुत हुआ नहीं ।)

उपर्युक्त बातें संक्षेप में यह स्पष्ट करने के लिए कही गयी हैं कि बाल्मीकि के अनुसार लक्ष्मण ने सीता को समझाने की भरसक कोशिश की थी, किंतु अंत में उन्हें विवश होकर सीता को पर्णकुटी पर अकेले छोड़कर जाना पड़ा । अवसर पाकर रावण सीता के पास आया, दोनों के बीच परस्पर परिचय के साथ विस्तार से बातें हुई, और अंत में कुपित होकर वह सीता को हर ले गया । कथा में कहीं पर किसी सुरक्षा घेरे का जिक्र नहीं है ।

मुझे लगता है कि रामकथा के वर्णन में समय के साथ बदलाव आता गया होगा और लक्ष्मण रेखा की कल्पना बाद के कथाकारों/कथावाचकों की देन रही होगी । – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Satish Chandra satyarthi
    मई 26, 2010 @ 20:18:06

    अति सुन्दर……
    भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहार को इन्टरनेट पर जनसुलभ बनाने का जो महान कार्य आप कर रहे हैं उसके लिए मेरी बधाई और शुभकामनाएं स्वीकार करें.

    प्रतिक्रिया

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