“यदा यदा हि धर्मस्य …”: कितना सार्थक है श्रीमद्भगवद्गीता का यह वचन?

टिप्पणी – 

मैं अपने जो विचार यहां लिख रहा हूं  उनसे कई जन  असहमत होंगे। कई जन  आक्रोषित भी हो  सकते हैं।

मेरी प्रार्थना है कि जैसे ही आपको लगे कि विचार निकृष्ट हैं, आप आगे न पढ़ें।

असहमत होते हुए भी यदि पढ़्ना स्वीकार्य हो तो अपना ख़ून खौलाए बिना इन बातों को किसी मूर्ख अथवा सनकी की बातें समझकर अनदेखी कर दें और बड़प्पन  दिखाते हुए मुझे क्षमा कर दें।

धन्यवाद, शुक्रिया, थैंक्यू। 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥
(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४)
(यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत, अभि-उत्थानम् अधर्मस्य तदा आत्मानं सृजामि अहम् । परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुस्-कृताम्, धर्म-संस्थापन-अर्थाय सम्भवामि युगे युगे ।)
(टिप्पणीः श्रीमद्भगवद्गीता वस्तुतः महाकाव्य महाभारत के भीष्मपर्व का एक अंश है; इसके १८ अध्याय भीष्मपर्व के क्रमशः अध्याय २५ से ४२ हैं ।)

भावार्थः जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म आगे बढ़ने लगता है, तब तब मैं स्वयं की सृष्टि करता हूं, अर्थात् जन्म लेता हूं । सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों (कालों) मैं अवतरित होता हूं ।

मैं नहीं जानता कि ईश्वर होता है कि नहीं । जब कोई मुझसे पूछता है तो मेरा उत्तर स्पष्टतः अज्ञान का होता है, यानी साफ तौर पर “मैं नहीं जानता ।” हो सकता है ईश्वर हो । अथवा हो सकता है वह न हो और हम सदियों से उसके अस्तित्व का भ्रम पाले हुए हों । कोई भी व्यक्ति उसके अस्तित्व को प्रमाणित नहीं कर सकता है, और न ही उसके ‘अनस्तित्व’ को । ऐसे प्रश्नों के संदर्भ में अपनी अनभिज्ञता जताना मेरी वैज्ञानिक सोच के अनुरूप है ।

जब ईश्वर के बारे में निश्चित धारणा ही न बन सकी हो तो श्रीकृष्ण के ईश्वरावतार होने-न-होने के बारे में भला क्या कहा जा सकता है ? ऐसी स्थिति में “मैं युग-युग में जन्म लेता हूं ।” कथन कितना सार्थक कहा जाऐगा ? लेकिन मान लेता हूं कि महाभारत का युद्ध हुआ था, उसमें भगवदावतार श्रीकृष्ण की गंभीर भूमिका थी, और उन्होंने अपने हथियार डालने को उद्यत अर्जुन को ‘धर्मयुद्ध’ लड़ने को प्रेरित किया । उन्होंने युद्धक्षेत्र में जो कुछ कहा क्या वह अर्जुन को युद्धार्थ प्रेरित करने भर के लिए था या उसके आगे वह एक सत्य का प्रतिपादन भी था ? दूसरे शब्दों में, उपर्युक्त दोनों श्लोकों में जो कहा गया है वह श्रीकृष्ण का वास्तविक मंतव्य था, या वह उस विशेष अवसर पर अर्जुन को भ्रमित रखने के उद्येश्य से था । जब मैं गंभीरता से चिंतन करता हूं तो मुझे यही लगता है कि ईश्वर धर्म की स्थापना के लिए पुनः-पुनः जन्म नहीं लेता है ! कैसे ? बताता हूं ।

मान्यता है कि महाभारत का युद्ध द्वापर युग के अंत में हुआ था । उसी के बाद कलियुग का आरंभ हुआ । चारों युगों में इसी युग को सर्वाधिक पाप का युग बताया जाता है । सद्व्यवहार एवं पुण्य का लोप होना इस युग की खासियत मानी जाती है । कहा जाता है पापकर्म की पराकाष्ठा के बाद फिर काल उल्टा खेल खेलेगा और युग परिवर्तन होगा । मैं बता नहीं सकता हूं कि कलियुग के पूर्ववर्ती सैकड़ों-हजारों वर्षों तक स्थिति कितनी शोचनीय थी, धर्म का ह्रास किस गति से हो रहा था, किंतु अपने जीवन में जो मैंने अनुभव किया है वह अवश्य ही निराशाप्रद रहा है । समाज में चारित्रिक पतन लगातार देखता आया हूं । देखता हूं कि लोग अधिकाधिक स्वार्थी होते जा रहे हैं और निजी स्वतंत्रता के नाम पर मर्यादाएं भंग करने में नहीं हिचक रहे हैं । सदाचरण वैयक्तिक कमजोरी के तौर पर देखा जाने लगा है । बहुत कुछ और भी हो रहा है ।

इस दशा में मेरे मन में प्रश्न उठता है कि श्रीकृष्ण के उपर्युक्त कथनों के अनुसार तो उन्हें धर्म की स्थापना करने में सफल होना चाहिए था, तदनुसार अपने पीछे उन्हें एक धर्मनिष्ठ समाज छोड़ जाना चाहिए था । लेकिन हुआ तो इसका उल्टा ही । महाभारत की युद्धोपरांत कथा है कि कौरव-पांडवों का ही विनाश नहीं हुआ, अपितु श्रीकृष्ण के अपने वृष्णिवंशीय यादवों का भी नाश हुआ । ‘सामर्थ्यवान्’ श्रीकृष्ण स्थिति को संभालने में असमर्थ सिद्ध हुए थे । अंत में निराश होकर उन्होंने अपने दायित्व अर्जुन को सौंप दिए और अग्रज बलभद्र के साथ वन में तपस्वी का जीवन बिताने चले गये । वहीं एक व्याध के हाथों उनकी मृत्यु हुई थी ।

कथा के इस अंश की किंचित् विस्तार से चर्चा मेरी अगली पोस्ट की विषय-वस्तु रहेगी ।योगेन्द्र जोशी

79 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Asha Joglekar
    जुलाई 26, 2010 @ 18:57:07

    Agle hisse ki prateeksha hai.

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  2. Aniruddha Pande
    जुलाई 26, 2010 @ 20:00:18

    He who thinks he does not come to know it, knows It. He who thinks he knows It, knows It not. जिसका यह मानना है की ब्रम्ह जानने में नहीं आता उसका वह जाना हुआ है . जिसका यह मानना है की ब्रह्म मेरा जाना हुआ है वह नहीं जानता .The true knowers think they can never know It (because of Its infinitude), while the ignorant think they know It. ——-KENA UPNISHAD ( PART-2-III)

    आपने बहुत गहन विषय उठाया है . जिस रूप मे इश्वर की पूजा होती है निश्चित तौर पर वह रूप विश्वसनीय नहीं है . इश्वर का वास्तविक स्वरुप क्या है यह बात शायद कोई भी नहीं जानता . जो भी उस स्वरुप के बारे मे कहा जाता है वह या तो अनुमान है या अनुभव . इश्वर इन दोनों से परे है .
    इश्वर पे विश्वास लोगो को दुःख सहने की क्षमता देता है जीवन के कठिन क्षणों मे मनोवैज्ञानिक सांत्वना देता है . यह इश्वर की सांसारिक उपयोगिता है . आध्यात्मिक अर्थ मे इश्वर एक बहुत भिन्न आयाम है
    दो शब्द है एक “जाना” दूसरा “माना” .इश्वर के बारे मे लोग जो कहते है वो सब मानी हुयी बाते है . जबकि इश्वर को कितना “जाना” यह बात कोई भी समझदार आदमी विश्वास से नहीं कह सकता है

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  3. jayantijain
    जुलाई 27, 2010 @ 21:00:18

    your thought is right

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  4. Amit Uttam
    सितम्बर 17, 2010 @ 22:23:53

    Mai bhi yahi sochta hu ki sabse jyda dharm ki hani to isi samay ho rhi hai. Isse jyada aur hani kya hogi? Aaj pratyek vyakti swarthi ho gya hai. Apne swarth ke liye wo kuchh bhi kar sakta hai. Mujhe to nhi lagta ki koi bhagwaan awataar lekar insano ko insano se bachane aayegaa…????

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  5. Shivam Dubey
    जनवरी 09, 2011 @ 12:58:02

    eeshwar yeh nahi dekhta ki prithvi par manushya ki hani hoo rahi hai eeshwar toh yeh dekhta hai ki jab buraiyon ka pratishat accchaiyon se zyada hoo jata hai aur sach par jooth ki vijay hooti hai,tab hi eeshwar avtar lete hain.yehi hota aaraha hai,hota hai aur hota rahega…!

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  6. RAKESH MEHRA JYOTISH MAHARAT
    अप्रैल 30, 2011 @ 21:54:33

    ishwar samne kisi ke nhi ayaga pahle us vyakti ka patta lagao jo ishwar ke shakal ko janta ho app sab kase viswash mai ayge ki kon ishwar ho sakta hai .jis parkar hawa ko nahi dekha ja sakta prantu wo haa eshe parkar ishwar……….. mare naye geeta gyan chakra dawara ..rakesh mehra jyotish maharat@ reddiffmail.com contract me

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  7. Anurag Tyagi
    जून 26, 2011 @ 10:48:02

    MUJHE LAGTA HAI KI HINDU DHARMA KE UPER PRASHCHINHA LAGANA AAJ EK FASHION SA BAN GAYA HAI.ME YOGENDRA JOSHI JI SE KAHNA CHAHTA HOO KI BHAGVAAN KRISHAN KE BAARE ME SOCH PANA BHI HAMARE MAN MASTISHK KI SAMARTHAY ME NAHI HAI.FIR YE DISSCUSSION KUE?

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  8. Rohit
    जुलाई 10, 2011 @ 10:32:03

    Is mahakavaya ko apne life me follow kare to jivan dhanya ho jayega.

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  9. Rakesh Mehra Rakesh Mehra
    जुलाई 12, 2011 @ 20:25:41

    SANSAR KAY LIYE EK SUNDER SUJAV: Jhoot na aisa boliye jo dusro ko be galat raha dikaye. Mann ko apnay hi mela karay . Dusro kay dhoso ko apany uper lay ker khud hi matti ho jaye. Ek matti jo agg ke bhatti may ha jhalti rehti. Ek matti wo jo GANGA-JALL ke gagar [ghrra] ha banti. SOCH abb TU bas thora sa TU KON SE MATTI BANNA CHATHA HA…..
    RAKESH MEHRA JYOTISH MAHARAT
    9213817117

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  10. Rakesh Mehra Jyotish Maharat
    जुलाई 17, 2011 @ 11:29:22

    SANSAR KA SAB SAY BARAA YOGA: PANCH MINTUS BAS AKANT MAY BETH KER APNI ANTER-ATMA MAY SUNDER SANSKARO KO DHARAN KERNAY KI KOSIS KERNI HA.
    RAKESH MEHRA JYOTISH MAHARAT

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  11. Rajender Juneja 9829887884
    जुलाई 26, 2011 @ 10:24:24

    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
    परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
    धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥
    (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४)
    (यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत, अभि-उत्थानम् अधर्मस्य तदा आत्मानं सृजामि अहम् । परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुस्-कृताम्, धर्म-संस्थापन-अर्थाय सम्भवामि युगे युगे ।)
    (टिप्पणीः श्रीमद्भगवद्गीता वस्तुतः महाकाव्य महाभारत के भीष्मपर्व का एक अंश है; इसके १८ अध्याय भीष्मपर्व के क्रमशः अध्याय २५ से ४२ हैं ।)

    भावार्थः जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म आगे बढ़ने लगता है, तब तब मैं स्वयं की सृष्टि करता हूं, अर्थात् जन्म लेता हूं । सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों (कालों) मैं अवतरित होता हूं ।

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  12. Manoj Dhoundiyal
    अगस्त 22, 2011 @ 13:43:53

    Nirdosh bhav bhakti me mera roop n nam
    Tulsi ko me ram banu hu, surdaas ko syam
    Usi roop me mil jata hu jiska jo viswas.

    Me sochta hu ki har samay aane wale samay ki prishtbhumi taiyaar hoti rahti he. Jo bhi ishwar ke astitva pe viswas rakhta he uske liye ye janna kafi he ki Bhav jaroori he. Anyatha wo to gyani rishi muniyo ki samajh se pare he.

    To bhai logo apne Viksit mastisk ka upyog anyatra kiya ja sakta he ishwar ko usme bhandhna namumkin he.

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  13. Sachin
    अगस्त 24, 2011 @ 13:26:54

    Aap apni rai na hi de to behtar hai bhagwan ki hone par sak hai are tum kiya ho kaun ho kabhi ye socha hai…………. kahan se aaye ho ……. aur ek din kahan chal jaayoge……………….. pehle khud ki socho fir Bhagwan hai ki nahi baat karte hain.

    प्रत्युत्तर में:
    बहुत-बहुत धन्यवाद टिप्पणी के लिए। क्षमा करें कि मेरे मन में प्रश्न उठता है। किस व्यक्ति को राय व्यक्त करने का अधिकार है और किसको नहीं इस बात का निर्णय लेने का अधिकार किसको होना चाहिए? क्या इसमें विसंगति नहीं दिखाई देती जब कोई कहे कि मैं राय पेश करता हूं कि आप राय मत व्यक्त करें। यानी एक व्यक्ति को अपनी राय रखने का अधिकार है पर दूसरे को नहीं। किसी राय से असहमत होना तो ठीक है, पर यह कहना कि आप मत राय व्यक्त करो कितना उचित है? किसी को पसंद न हो तो न देखे, न सुने या न पढ़े, पर दूसरा तो अपना मत रखेगा ही।
    जहां तक ईश्वर का सवाल है मैं उसके अस्तित्व के बारे में कुछ जानता। जिसे आस्था हो उसे ईश्वर मानने से रोका नहीं जा सकता है, और जिसे आस्था नहीं उसे मानने को विवश भी नहीं किया जा सकता। इस व्यक्तिगत अधिकार पर कोई कैसे रोक लगा सकता है?

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  14. निकुंज भट्ट
    सितम्बर 24, 2011 @ 04:28:21

    मैं योगेन्द्र जोशीजी की बात से पूरी तरह से सहमत हूँ|

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  15. Rakesh Mehra
    अक्टूबर 28, 2011 @ 08:23:40

    my dears, jin ke pass sansar ke serv-sukh hai samjo ishwar un ke pass hai aur ishwar bi un ka puran roop se dyan rekhta hai . jin ke pass es sansar ke sukh nahi hai toh samjo un ke pass ishwar nahi hota. kai beena baat ishwar ke naam ka shoor machathe rehthe hai….. ES TERHA KE KOG SANSAR ME 90% SE 95% KE KARIB HAI. NOTE: ISHWAR PRAGHAT ME NA TOH ABHI TEK KISI KE SAMANY AYA HAI AUR AGE BI KABI BI ISHWAR PRAGHAT ME KISI KE SAMANY KABI BI NAHI AYE GA.( ISHWAR KE BARE ME KISI BI PRAKER KI BHEHS NIRADHAR HAI..KYOKI ISHWAR SWAYAM HI NIRAKAR HAI. ) TOH app sab sansar ke ANAND BHOGHNE KE GYAN ki talhas karo…. ithi SHUBM

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  16. Rakesh Mehra Jyotish Maharat
    अक्टूबर 28, 2011 @ 09:09:02

    HY gyanvan atam gyaniyo ishwer ke bare me ajj app ke maan me vichar toh ayaa shyadh ishwer jaha kahi bi hai app ki atmik bavnao se prasaan toh jarur hota hoga. kehne me toh hum sab ishwer ke hi hum sab EK ATMA ROOP HAI aur WO ISHWER EK PARMATMA ROOP HAI.prantu app ne kabi apni hi atma ko kabi dekha hai.Sab se pehle apne app ke bare me janno aurthath apni sawayam ki atma ke bhare me. Tab hi ishwar ke bare me app ko apne app hi atmik gyan prapt hona shru ho jye ga.( mai kosis karu ga app ko iswher ke bhare gyan detha rehau ga )….

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  17. दीपक भारद्वाज
    जनवरी 22, 2012 @ 12:07:36

    मैं जोशी जी कि बात से सहमत नहीं हूँ. अच्छा होगा कि वो श्रीमदभागवदगीता का सम्पूर्णता से अध्ययन करें. हमारे धार्मिक ग्रंथों के ना जाने कितने ही अनुवाद हुए है, सभी तरह के गुरुओं ने अपनी अपनी सोच के अनुसार इनकी अपनी अपनी व्याख्या की है | पुराने ग्रंथों के अनुसार ईश्वर अवतरित होते रहे है | कभी राम, कभी कृष्ण के रूप में, हो सकता है कलियुग में वह समय अभी ना आया हो | निश्चित तौर पर पाप बढ़ गया है | परन्तु फिर भी, ईश्वर ने हर युग में आकर यह खुद नहीं कहा कि वो ईश्वर है ( सिर्फ गीता ही इसका अपवाद है, और क्योकि इसे ईश्वर कि वाणी समझा जाता है, तो यह पवित्र भी मानी जाती है ), वरन लोगो ने ही किसी रूप को ईश्वर तुल्य मान लिया है.

    मध्य काल में, नंद राजाओं के अत्याचार से मुक्ति के लिए चंद्रगुप्त मौर्या, और अंग्रेजों से मुक्ति के लिए महात्मा गाँधी ने, उनके काल के बहुत से लोगो ने उन्हें ईश्वर के तुल्य मन है. लोर्ड माउंटबेटन् ने गाँधी जी के लिए लिखा है “इतिहास में गाँधी जी का नाम जीजस, और पैगम्बर के तुल्य रखा जायेगा ” | खुद आइनसटाइन ने गाँधी जी के लिए लिखा ” आने वाली पीढियां यकीन ही नहीं कर पायेंगी कि हाड मांस से बना ऐसा आदमी भी इस धरती पर कभी चला है ”

    गीता एक सीख है, और जीवन जीने का तरीका बताती है | लोगों को कर्म करने को कहती है, और अकर्मण्यता को प्राप्त होने से रोकती है | और मेरी नज़र में हिंदू धर्म भी जीवन जीने का एक तरीका है | गीता उन लोगों के संशय दूर करती है, जो धर्म को समझ नहीं पाए है , जैसे मूर्तीपूजा क्यों करे, पूजा क्यों करें, कर्म क्या है, अकर्म क्या है, कर्म क्यों करें, ईश्वर कौन है इत्यादि |

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    • सावन
      जुलाई 31, 2014 @ 01:05:35

      दीपक जी बिलकुल सटीक जवाब दिया आपने इस गैर जरुरी प्रश्न का।
      और सही ही है, अगर ये एक बार भी भगवत गीता को समझने की कोशिश करते तो इस तरह के सवाल नही करते।
      गीता सिर्फ मान्यताओ पर टिका हुआ ग्रन्थ न हो कर पूर्णतह practical और जीवन के सभी प्रश्नों के उत्तर देने में सक्षम है। बशर्ते आप एक बार अपना पूरा ध्यान (मन) लगा कर उसे सुने या पढ़े और समझने की कोशिश करे।

      फिर इस तरह के सवालो का कोई अस्तित्व ही नही रह जाएगा और न ही ऐसा कोई doubt बचेगा।

      प्रतिक्रिया

  18. Mukesh Vishwakarma
    जून 02, 2012 @ 12:51:51

    Mai ek chota sa byakti hu mai nahi jata mera bichar kitna uchit he par prsn ye he ke grnth kab likhe gai kya us samaye konsa begyanik tha or konse yntar the jo vo likte he ke “koti koti surya” yani is sansar me karodo sury he vo kahte he ke har vo bastu jo dikhai de bo bhram he ya bo nasban he sada na rahe bali he arthat bah kebal mithya he par jo sada rahe bale he jiska udahran haba he khud begyanik mante he ki koina koi sakti jarur he jise ham puri taraha nai jante or rahi bat iswar ke hone n hone ki to bo bichar sirf hindu dharm ke liye hi kyo utate he har dharm ko dekho konsa dharm iswar ke prati bhramit nahi he agar iswar ke avtaro ki bat kare to us samaya bhi unhe na manne wale the n hote to na ramayan hoti n mahabharat or n aj ye bate.. agar iswar ko janna he to sirf ek test karo sani dham jaha aj bhi dukano me tale hahi he kuch churi karo or uska paidam khud janjao ge kisi ko batane or puchne ki jarurat hi nahi hogi. jaishe gandhi the par logo ke unke prti dharnaye alag alag he veshe hi ye kahna ki mai nahi mata dhik he par ye kahna ke bo nahi he murkhta hogi pahle apne dharm ko jane uski puja bidhi ke begyanik v adhyatmik saririk labho ko jane fir apni raye de kis dharm ke grantho me jane kitne samya purb he sare sor parivar aanek bhrammando ka pura sahi bardan ho use kya kahoge ke jo granth aadi kal me hi dharti ki choro akash patal ki jankari deta he jitna adhi begyanik bhi nahi khoj paye he yesha ek matr dharmik granth wala dharm he hindu dharma jai hind jai hindutav……….. hindu upvash ki bidhi kne uske labho ko jano. angrejo jate jate kokata ke hamari book sangrharly ko kyo jaaya kyu apne santh hamare grantho ko bhi le gae par ham hidu he inhe galat mate he ……………………………..

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  19. Bharat
    जून 30, 2012 @ 16:28:14

    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

    प्रतिक्रिया

  20. अजय यादव
    अगस्त 09, 2012 @ 08:03:40

    श्रीमान जोशी जी आपकी बातो से ऐसा नहीं लगता की आप वैज्ञानिक सोच वाले व्यक्ति है जैसा की आप दावा करते है .एक तरफ आप मानते है की महाभारत का युद्ध हुआ जैसे आप उसे देखने गए थे और दूसरी ओर श्रीकृष्ण के अस्तित्व को अधूरा स्वीकारते है …आप पूर्वाग्रह से ग्रसित व्यक्ति लगते है. आजकल फैशन हो गया है अपने को प्रचारित करने के लीये किसी महान व्यक्ति पर कीचड़ फेंकने की कोशिस शुरू कर दें .अगर आप वैज्ञानिक सोच के व्यक्ति है तो गीता में आपको अच्छा क्या लगा आप वही पोस्ट करिये ..मगर अफ़सोस आप जैसो को अच्छाई दिखती नहीं ,आँखों में कीचड़ जो भरा है .
    अरे भगवान श्री कृष्ण तो मान और अपमान दोनों से परे है .

    प्रत्युत्तर में —
    श्री अजय यादव जी, बहुत-बहुत धन्यवाद। मेरी बातों से आपको कष्ट हुआ इसके लिए मुझे खेद है। आप कुछ भी कहकर अपना आक्रोष व्यक्त कर सकते हैं, कदाचित उसके आगे बढ़कर सजा नहीं दे सकते। हां जो कुछ कीचड़-सदृश दिखे उससे स्वयं बचकर निकल सकते हैं।
    बड़प्पन दिखाते हुए मुझे क्षमा कर दें एवं मेरे विचारों की अनदेखी कर दें।
    पुनश्च धन्यवाद।

    – योगेन्द्र जोशी

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  21. सत्येन्द्र सिंह
    अगस्त 10, 2012 @ 15:31:30

    इस दुनिया में कुछ भी अमर और जड़ नहीं है , सब कुछ चलायमान है सब कुछ नश्वर भी है , सब कुछ एक चक्र में चलता है, सुबह होती है, दोपहर, फिर शाम और फिर रात. जैसे मनुष्य का जन्म होता है और धीरे धीरे बढ़ते हुए वो बुढा होकर मर जाता है और फिर दोबारा वही चक्र शुरू होता है. एक बार धर्म की संस्थापना होने का अर्थ यह बिलकुल भी नहीं है की अधर्म फिर कभी नहीं उभरेगा. एक कक्षा में जिस प्रकार से बच्चे मास्टरजी के आने से शांत हो जाते हैं और लगता है की वे अब शांत ही रहेंगे परन्तु ऐसा नहीं होता है मास्टरजी के जाने के बाद धीरे धीरे फिर से कक्षा में कोलाहल बढ़ जाता है. इसको साइंस में ला ऑफ़ एंटरोपी कहा जाता है. इसी प्रकार से सब कुछ सिस्टमैटिक होने के बाद फिर से केओस हो जाता है, इसी बात को बताते हुए ये श्लोक कहा गया है. इसमें मेरा मानना यह है की हो सकता है भगवन खुद सशरीर न प्रकट हों परन्तु विभिन्न महात्माओं में अपने अंश रूप में प्रकट हों और व्यवस्था को सुचारू रूप में लाने का प्रयत्न करें. अब यहाँ पर हो सकता है जिन्हें मैं संत मानता हूँ उन्हें बाकि सब लोग न मानते हों परन्तु उससे क्या फर्क पड़ेगा, भगवन श्री कृषण जी के ज़माने में उन्हें भी कई लोग भगवन नहीं मानते थे . इसमे मैं कुछ और कहना चाहूँगा की ध्यान पूर्वक देखेंगे तो आपको सब तरफ भगवन के रूप नजर आएंगे. एक अनजाना व्यक्ति जब सड़क पर किसी घायल व्यक्ति को पानी पिलाता है और उसकी सहायता करता है, तो वो व्यक्ति उसके लिए भगवान् ही साबित हो जाता है. वह अनजान व्यक्ति एक आम इंसान हो सकता है और ये भी बिलकुल संभव है की उसमें कुछ अवगुण भी हों परन्तु उस एक क्षण में उसके अन्दर भगवान् का अंश जागा और वो घायल व्यक्ति के लिए भगवन बनकर प्रकट हो गया. सो कहने का अर्थ है जैसा की अंग्रेजी में कहते हैं “Don’t take it literally. Understand the deep rooted meaning.” हिंदी में कहूँगा गूढ़ अर्थ पर ध्यान दें न की सिर्फ सतही अर्थ पर. जैसे शिव जी ने कहा था जाओ धरती के तिन चक्कर लगा कर आओ …
    अंत में कहूँगा पढ़ने के लिए धन्यवाद. आपका दिन शुभ हो.

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    • vimalkumar543
      जुलाई 20, 2013 @ 14:31:55

      मैं आप से पूर्ण रूप से सहमत हूँ सत्येन्द्र जी लेकिन कुछ लोग इस दुनिया में रावण के कदमो पर चलने वाले भी होते हैं जो खुद तो गलत होते ही हैं और दूसरों को भी वही रास्ता बताते हैं और अपनी गलती कभी मानने को तयार नहीं होते हैं ना ही अपनी कमी ढूँढने की कोशिश करते हैं , उनका एक मात्र लक्ष्य दुसरे को नीचा दिखाना होता है , और वो दुसरे के बारे में सिर्फ इतना ही जानना चाहता है जितने में वो दुसरे को नीचा साबित कर सके….. जो दुसरे को नीचा दिखाने की लालसा , इच्छा मन में रखता है अर्थात उसका मन साफ़ नहीं है और पापी मन को कभी शांति नहीं मिलती…. अशांत मन शारीर और आत्मा का आपस में संपर्क नहीं होने देता और जब तक हमारा मन और आत्मा एक नहीं हो जाते कभी परम आत्मा (इश्वर) की अनुभूति नहीं हो सकती………….. फिर चाहे आप गीता पढ़ें चाहे रामायण सब झूठ ही लगेगा………………
      इसका जीता जगता सुबूत हमारे योगेन्द्र जोशी जी हैं जिन्होंने ये पोस्ट लिख कर अपने विचार प्रकट किये हैं…. उन की बातों से लगता है की उन्होंने गीता को पढ़ा ही सिर्फ इसलिए है की उसकी आलोचना कर सकें…………………….
      लेकिन एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए की आलोचना एक ऐसी चीज है जो कभी ख़त्म नहीं होती… चाहे कोई अच्छा है चाहे बुरा आलोचना हमेशा अपने स्थान पर रहती है और जो आलोचक होते हैं किसी भी चीज की आलोचना करके खुद को महान समझने लगते हैं लेकिन वो ये भूल जाते हैं की जिस की उन्होंने आलोचना की है वो सदियों से महान है और सदियों पहले उसे किसी महान सख्शियत ने बनाया होगा और वो शक्स आलोचक से सदियों पहले पैदा हुआ था और वो ज्ञान जिस के दम पर आलोचक आलोचना कर रहा है उस से कही बेहतर ज्ञान वो शक्स सदियों पहले प्राप्त कर चुका है तभी उसने इतना बड़ा ग्रन्थ लिखा और दुनिया उस से आज तक सीख रही है…………………

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  22. दीपक भारद्वाज
    अगस्त 17, 2012 @ 10:50:03

    मैं एक बार फिर से कहूँगा कि इस सवाल का उत्तर देने के लिए गीता का बहुत गहनता से अध्ययन करना जरुरी है. अध्याय ११ में भगवान कृष्ण ने साफ़ कहा है कि
    ———————————————-
    na tu mam sakyase drastum
    anenaiva sva-caksusa
    divyam dadami te caksuh
    pasya me yogam aisvaram (Chap 11, Verse-8)

    But you cannot see Me with your present eyes. Therefore I give to you divine eyes by which you can behold My mystic opulence.
    ————————————————————-

    aneka-vaktra-nayanam
    anekadbhuta-darsanam
    aneka-divyabharanam
    divyanekodyatayudham (Chap 11, Verse 10)

    divya-malyambara-dharam
    divya-gandhanulepanam
    sarvascarya-mayam devam
    anantam visvato-mukham (chap 11, Verse 11)

    Arjuna saw in that universal form unlimited mouths and unlimited eyes. It was all wondrous. The form was decorated with divine, dazzling ornaments and arrayed in many garbs. He was garlanded gloriously, and there were many scents smeared over His body. All was magnificent, all-expanding, unlimited. This was seen by Arjuna.
    —————————————————————————

    lelihyase grasamanah samantal
    lokan samagran vadanair jvaladbhih
    tejobhir apurya jagat samagram
    bhasas tavograh pratapanti visno (Chap 11, Verse 30)

    O Visnu, I see You devouring all people in Your flaming mouths and covering the universe with Your immeasurable rays. Scorching the worlds, You are manifest.
    —————————————————————————–
    sri-bhagavan uvaca
    kalo ‘smi loka-ksaya-krt pravrddho
    lokan samahartum iha pravrttah
    rte ‘pi tvam na bhavisyanti sarve
    ye ‘vasthitah pratyanikesu yodhah (chap 11, Verse 32)

    The Blessed Lord said: Time I am, destroyer of the worlds, and I have come to engage all people. With the exception of you [the Pandavas], all the soldiers here on both sides will be slain.
    —————————————————————————-
    इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण ने अपना असली रूप दिखाया जोकि काल रूप था, तथा सब लोकों को नष्ट करने के लिए उद्धृत हुआ था |

    तथा महाभारत वास्तव में हुआ था, यह बहुत से शोधकर्ताओं ने माना है| सन्दर्भ में –
    http://hi.wikipedia.org/wiki/महाभारत

    http://hi.wikipedia.org/wiki/कुरुक्षेत्र_युद्ध

    प्रतिक्रिया

    • Sanjeev Kumar
      जनवरी 11, 2016 @ 06:59:11

      यहां दिव्य दृष्टि का अर्थ है स्मृति की व्यापकता से अथार्त ब्रह्म स्मृति -जीव स्मृति वो जो खुद को शरीर मान ये सब प्रपंच देखती है !वास्तव में बंधन का अनुभव जीवात्मा को नहीं स्मृति को होता है और उसका मूल कारण है अज्ञान ! ब्रह्म स्मृति तो सब और एक समान व्याप्त है इसलिये तो उसे नित्य भी कहा गया !इसीलिये उसे सब और से आँख-कान-नाक-मुह आदि वाला भी कहा गया !

      प्रतिक्रिया

  23. Jaspal Singh
    अगस्त 24, 2012 @ 11:24:48

    योगेन्द्र जी बिलकुल सही हैं. ईश्वर की परिकल्पना से ही विभिन्न धर्मों और धर्म ग्रंथों का सृजन हुआ है जो इंसानों को सदा से ही आपस में लड़ाते रहे हैं. प्रत्येक धर्म अपने धर्म ग्रंथों के द्वारा अपने को ही सही ठहराता है. यूं तो कहा जाता है कि हर धर्म हमें आपस में प्रेम करना सीखाता है लेकिन इतिहास साक्षी है कि धर्मों ने ही सबसे ज्यादा इंसानी खून बहाया है. हमें रुककर जरूर सोचना चाहिए की क्या ईश्वर और धर्म इंसान के लिए वाकयी आवश्यक हैं.

    प्रतिक्रिया

  24. krishna singh
    अक्टूबर 12, 2012 @ 21:52:44

    joshi jee namaskar,wase aap bodhi lag rahe hai.baudh dharam wahi log grahan kiye thhe jo hindu dharam ke chauthhe barn se aate hai.usme kafi log sankuchit mansikta ke hai jo man garahant baten bolte aur likhte rahte hai.is liye define karna jaruri hai. har yug mey aadharmee log janam liye chhahe wah treta ho ya dwapar usko (adharam) ko khatam karne ke liye eshwar ka awatar hota hai.chhahe wah esa masih, budh,mohamad sahab,ram ya krishn ke ya kisi aur rup mey hin kyon na ho use hindu granth mey sakar(sagun) rup kahte hai ,us rup ka aant hota hai jaisa ki sabhi ka huaa. brambha bisnu aur mahesh ko nirgun rup kahte hai jiska nash nahi hota is liye aap ke jaise logo ka aabadi nahi badega tab tak ishwar awtar kyon lega, namaskar.

    प्रत्युत्तर में –
    आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद। आपको पूरा अधिकार है मेरी बात से असहमत होने का। यों इस तथ्य को समझ सकते हैं कि इस धरती पर जो हिन्दू नही है वह हिन्दूओं की सब नहीं तो कई बातों को नहीं स्वीकरेंगे। बातें ही मनते होते तो क्यों इसाई, मुस्लिम, नास्तिक, इत्यादि होते!! दुनिया की करीब 675 करोड़ जनसंख्या में हिंदुओं की संख्या लगभग 100 करोड़ हैं। उनमें मैं न भी गिना जाऊं तो आश्चर्य नहीं। वैसे मैं जन्मना हिन्दू हूं और अपने को अभी भी हिन्दू समझता हूं, क्योंकि किसी ने मुझे बहिष्कृत नहीं किया है। मैं हिन्दू हूं, क्योंकि इसी में मतों की विविधता स्वीकार्य है, जहां तक मैं समझ पाया हूं। हिन्दू चिंतकों ने अपने-अपने दर्शन प्रस्तुत किये हैं जो परस्पर एक जैसे नहीं हैं। हिन्दुओं के अनुसार तो महात्मा बुद्ध स्वयं भगवत्‌ अवतार थे – हिन्दू थे!! अस्तु मतभेद के लिए क्षमा चाहता हूं। शुभकामना। – योगेन्द्र जोशी

    प्रतिक्रिया

  25. Sanjay J
    दिसम्बर 23, 2012 @ 14:15:06

    शुभ-कामना सहित आपसे निवेदन है आप कोशिश कर आपे आस-पास जो सेन्टर हो ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय का, तो वहां जाकर गीता के रहस्य के विषय में सुने। अवश्य आपको सारे उत्तर सहज प्राप्त हो जायेंगे।

    प्रतिक्रिया

  26. banti
    दिसम्बर 30, 2012 @ 19:15:24

    समस्त भद्र गण कृपया शुरुआत में दी गयी टिपण्णी को ध्यान में रखें और फ़िर comment करें..
    योगेन्द्र जी कि जिज्ञासा निश्चित रूप से स्वाभाविक है..
    इस पर लोगों का मतभेद भी उतना ही स्वाभाविक होगा.
    पर इसके लिए योगेन्द्र जी अथवा किसी और के विचारों पर कोई भी दोष देना उचित न होगा.
    अतः अपना मंतव्य जरूर प्रकट करें मगर व्यक्तिगत होने अथवा भावुक होने की जरूरत नहीं है..

    टिप्पणी –
    “मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना तुण्डे तुण्डे सरस्वती”। मनुष्य प्रायः पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रहता है। जिस विचार का वह एक बार पक्षधर हो जाता है उससे भिन्न मत को वह सुनना भी नहीं चाहता, उसे स्वीकारने का तो सवाल ही नहीं। पूर्व में किसी के द्वारा कथित बात की व्याख्या कुछ हटकर भी संभव है ऐसा वह नहीं मानता । – योगेन्द्र

    प्रतिक्रिया

  27. chandrasekhar
    जनवरी 19, 2013 @ 06:36:00

    jaisi jaisi jiski soch………

    प्रतिक्रिया

  28. Abhyuday Singh
    अप्रैल 12, 2013 @ 04:40:10

    Whenever Bharat feels guilty for their own dharma, abhyuthanamdharmasya manifests

    प्रतिक्रिया

  29. Rajesh
    मई 20, 2013 @ 14:00:39

    दुनिया बनाने वाले , कौन है , कहासे आए , कबतक रहेंगे , कब जाएँगे !
    यह सब बकवास बाते है, विश्व मे किसी एक तापमान पर , एक जीव की उत्तपत्ति होती है !
    इसी तरह मनुष की उत्तपत्ति हुई है, और दूसरे जिवो की भी , यही सत्य है !
    जन्मे मनुष ने ही क्रांति की है , इसलिए अ जन्मे की बात करना मूर्खता है, पढ़े वर्ग के लिए!

    धन्यवाद !

    राजेश जी. नागदेवे.

    प्रतिक्रिया

  30. प्रवीण पाण्डेय
    जुलाई 21, 2013 @ 11:53:18

    भाव सृष्टि रचते हैं, प्रार्थना भाव संघनित करती है, आर्द्र और पीड़ित स्वर ईश्वर को अवतरित करा लें, इसमें कोई विशेष संशय क्यों हो सकता है।

    प्रतिक्रिया

    • योगेन्द्र जोशी
      जुलाई 21, 2013 @ 21:37:17

      माफ़ करें आपकी बात मैं समझ नहीं सका। जो कुछ भी मंतव्य रहा हो, उसके लिए
      धन्यवाद।

      प्रतिक्रिया

    • sachdechetana
      अगस्त 18, 2016 @ 08:21:38

      अपना शुद्ध रूप नेति-नेति शब्दों से ही व्यक्त होता है। यह सब परमात्मा का है यह बात आधी अधूरी सत्य है। यां फिर झूठ ही समझे। जीनका ध्यान परीपक्व हो गया, वे जान गए यह सब परमात्मा का नही, यह सब परमात्मा ही है, जीसका प्रमाण वर्तमान ही जीवनका सत्य है। जहां मनुष्य को चाहिए भाषा को बरोबर से लिखै और समझे। धन्यवाद। शुभ प्रभात।

      प्रतिक्रिया

  31. Ashish Sachdeva
    अगस्त 28, 2013 @ 08:49:53

    पूर्णतया असहमत , सबको आपने हिस्से से और अपने हिसाब से , या अपने अनुभव से लिखने का हक निस्संदेह है.. लेकिन ये ही ईश्वर का सत्य स्वरूप भी है.. किसी को किसी रूप में , और किसी को किसी और रुप में या किसी को बिल्कुल ना दिख पड़ने वाला वो अगम्य निराकार होकर भी साकार ईश्वर , हर श्वास के साथ , साथ रहने वालि सत्ता है.. जिस पर किसी का अधिकार नहि सिवाय उनके जो ईश्वर स्वरूप हो जाएँ… कृष्णा ने यही किया और यही दिखाया… और जो कोइ एक उस ईश्वर को आत्मसात कर ले… उसी का स्वरूप हो जाएँ .. येहि कृष्णा ने कहा.. वोह ईश्वर स्व्यं आया और गीता के रुप मैं एक मार्ग छोड़ गया … !!

    प्रतिक्रिया

    • SUMITRA GUPTA
      अप्रैल 10, 2014 @ 17:39:45

      ॐ मैं नहीं मानता—-
      अक्सर लोगों के मुख से सुनने मिलता है,कि मैं नहीं मानता कि भगवान होते हैं या भगवान हैं अथवा मैं तो नास्तिक हूँ,मतलब भगवान तो हैं पर मैं उनको नहीं मानता।मेरा ये लेख उनको ही ध्यान में रखकर लिखने का एक छोटा सा प्रयास है।समझ पाओ तो समझ लीजिये,वरना प्रभु मर्जी, आपको जैसी मति मिली।अच्छा भाई मेरे,आप ये बताइये,आप हैं या नहीं,या आप कौन है? कहाँ से आये हो और कहाँ चले जाओगे। क्योंकि—
      तात-मात तुम्हारे गये,तुम भी भये तैयार।
      आज काल में ही चलो,दया होय हुसियार।।
      अतः– वृथा इसे ना गवाइये,ये स्वांसा अनमोल।
      स्वांसा तन से निकल जाये,रहे चाम को खोल।।
      तो यह तो सत्यता है ना हम सभी के जीवन की कि इस शरीर को छोड़कर हम सभी को कहीं ना कहीं जाना होता है और पुनः फिर आना भी पड़ता है,अन्य रूप में।और ना जाने कितने जीवन जी कर आये हैं, अलग-अलग योनियों में,और ना जाने कितनी योनियों में अभी तो जाना होगा।क्योंकि–
      चौरासी में घूम के,इस तन पर अटकी आय।
      अबकी पासा ना परो,फिर चौरासी जाय।।
      अब विषय है कि आप भगवान को नहीं मानते।मैं आपसे पूछती हूँ,दियासलाई की तीली में आग दिखती है क्या?आप और मैं यही कहेंगें कि नहीं,लेकिन आप हम सभी जानते हैं कि उसमें आग भी होती है और रोशनी भी।कैसे प्रगट होती है?ये भी हम आप सभी जानते हैं जब तीली के सिरे पर लगा मसाला माचिस पे लगे मसाले से घर्षण किया जाता है।हम जब शास्त्रों का पठन-पाठन करते हैं,सन्तों के द्वारा,
      भक्तों के द्वारा उनके अनुभव सुनते हैं, जिन्होंने प्रभु को पाया दर्शन किया, तो वही तो सत्यता है परमात्मा की।अब आप कहेंगें कि हम क्यों माने उनके अनुभव को?तो भाई,जिसके बारे में जानना होता है तो उस विषय को पढ़ना तो पढ़ेगा ही अन्यथा उसके बारे में जानकारी कैसे होगी?
      अच्छा अब आपसे पुनः पूछती हूँ,कि क्या दूध में घी है?आप कहेंगें हाँ-हाँ।पर दूध में घी तो दिखता ही नहीं फिर आप कैसे कह सकते हैं कि दूध में घी है।भाई मेरे, जरूरी नहीं जो हमें नहीं दिख रहा वो है ही नहीं। जिस तरह विशेष प्रक्रिया से मंथन करके दूध में से घी निकाला जाता है ,उसी तरह विशेष प्रक्रिया रूप पठन-पाठन स्मरण, ध्यान के माध्यम से,प्रभु दर्शन,अनुभव,उनका सानिध्य,यहाँ तक की तदाकार हो जाना, किया जा सकता है। इतनी अद्भुत सौन्दर्ययुक्त सृष्टि,इतनी विविधताओं को देखकर भी ऐसा कहना कि भगवान को मैं नहीं मानता ,बड़ी मूर्खतापूर्ण बात लगती है इस मानव बुद्धि की।
      अच्छा अब आप बताइये,मिश्री मीठी होती है,नीबू खट्टा होता है,करेला कड़ुवा होता है ये कैसे पता?आप कहेंगें कि लोगों के अनुभव से और हमने भी चाखा है,
      जिससे पता है।यानि आपने सुना भी है और चाखा भी है।तो भाई मेरे, परमात्मा के बारे में पढ़ोगे सुनोगे तभी तो चाखोगे, तभी तो अनुभव करोगे, तभी तो देख पाओगे। उनके परमानन्द को, उनके रूप माधुर्य को,उनकी आलौकिकता को।एक बात बताऊँ प्रभु के अस्तित्व का बखान करने में मुझे बहुत आनन्द आ रहा है।उनको धन्यबाद है जिन्होंने भगवान के होने,ना होने पर प्रश्नचिन्ह लगाये।
      कई लोग ऐसा भी कहते सुने गये हैं,किसने देखा है भगवान को,किसने देखीं उनकी लीलाओं को,ये सभी काल्पनिक हैं। तरस आता है उनकी क्षुद्र मतियों पर।सभी चीजों का सभी रूपों का सभी लीलाओं का प्रमाण होने पर भी,वे ऐसी अनर्गल बात करते हैं।जब वे स्वंय ही सत्यता से अनभिज्ञ होगें तो वे अपनी सन्तति को क्या ज्ञान दे
      पायेंगें।खैर,किसी के मानने या ना मानने से परमात्म सत्ता को कोई फरक नहीं पड़ने वाला।वे तो थे,हैं और सदैव रहेगें।हम सब भी उनका अंश हैं, सो हमेशा रहेगें तो, लेकिन अनगिनत परिवर्तन, अनगिनत रूपों को धारण करते हुये और फिर उनकी कृपा से,उन हीं में समाहित हो जायेगें।कहा भी है—
      माया सगी ना मन सगा,सगा ना यह संसार।
      बन्दे या जीव का, सगा जो सिरजन हार।।
      और भी- धन यौवन यों जात है, जैसे उड़त कपूर।
      रे मूरख गोपाल भज,क्यों चाटत जग धूर।।
      अन्त में, मैं इतना ही कहूँगी,कि हमको यह जानने का प्रयास तो करना ही चाहये कि हम कौन है?कहाँ से आयें हैं?और कहाँ चले जाना है?बस सोई प्रभु को पाने के लिये,उनको ढूँढने के लिये सोचने लगेंगें,क्योंकि खुद की खोज में ही तो खुदा बसा हुआ है।फिर आप यह भी नहीं कहोगे कि मैं नहीं मानता भगवान को।आप स्वंय ही देखो भगवान शब्द में छिपा हुआ भाव,जो प्रत्यक्ष ही सृष्टि में दृष्टिगोचर है।जैसे- भ से भूमि,ग से गगन,व से वायु अ से अग्नि और न से नीर।श्रीमद्भगवद्गीता जी मैं भी भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है–
      भूमिरापो$नलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
      अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।।(अध्याय–7का 4)
      और भी कहते भगवान हैं –
      वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
      भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।(अध्याय—-7,का 26)
      अर्थात्—हे अर्जुन!श्रीभगवान होने के नाते मैं जो कुछ भूतकाल में घटित हो चुका है,
      जो वर्तमान में घटित हो रहा है और जो आगे होने वाला है,वह सब कुछ जानता हूँ।मैं समस्त जीवों को भी जानता हूँ,किन्तु मुझे कोई नहीं जानता।पर मैं जिस पर कृपा करूँ तो उसे मुझे जानने में तनिक भी देर नहीं लगती।
      सन्त श्री तुलसीदासजी ने भी अपने रामचरित मानस में कहा है–
      क्षिति जल पावक गगन समीरा,पंच तत्व यह रचित शरीरा।।
      अरे भाइयो मेरे, हमारे ग्रन्थों में ज्ञान का, आनन्द का अमृत भरा पड़ा है,जरा खोलकर,पढकर, सुनकर और चखकर तो देखो।सभी धर्म,जाति वालों ने इन्हीं सनातन ग्रन्थों से मन्थन करके ज्ञानार्जन किया है और अपने तरह-तरह के धर्मों को स्थापित किया है।तो फिर हम आप सब क्यों अछूते रह जायें व्यर्थ की बकवास करके। जब जागो तभी सबेरा।सभी जन क्या? समूची दृश्य-अदृश्य सृष्टि में ही वह परमसत्ता है,और समूची सृष्टि ही वह स्वंय परमात्मा है, शायद ये कहना भी अनुचित ना होगा।
      विशेष-प्रभु प्रेरणा से जो कुछ भी लिख पायी,सो आपके सामने प्रस्तुत है।इस लेख को पढ़कर प्रभु को ना मानने वालों की संख्या कुछ कम हो सके तो मैं अपने आपको धन्य मानूँगी और मेरा लिखना भी सार्थक हो जायेगा।बड़ा है ऐसा सोचकर, पढ़ना ना छोड़िये।दिल की गहराई से पढ़िये और महसूस करिये सत्यता को।
      जय अंखड ज्ञानप्रकाशक,सर्वव्यापक परमेश्वरी-परमेश्वर को 09987648582
      ॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉॉ

      प्रतिक्रिया

      • sachdechetana
        अगस्त 18, 2016 @ 06:09:16

        धन्यवाद शुभ प्रभात बहोत बढीया लिखा है आपको सत्त सत्त नमस्कार हे महानिदेर्शक ईश्वर स्व्यं आता भी है और स्वयं ही जाता भी है खामखा ही यां व्यर्थ ही ईश्वर सत्य को नही जानता ईश्वर अंश जीव अविनाशी और अपने चेतन अमल से सहज सुख मे नही रहता ! आश्चर्य भी और ? प्रश्न भी होता है उन बे.. .. पता नही क्या लिखे जीनको अपने आपका ही पता न हो वे सच मे कौन है ? बाकी यह सत्य को कोई भी झुठला नही सकता के हरेक स्वरूप वोही ईश्वर स्वयं आता है और नामरुप शरीर छोड़कर जाता है धैर्यवान रहना ही समझदारी है आत्म ध्यान करना प्राप्ति हेतू सर।

      • विशाल
        अगस्त 30, 2016 @ 04:26:48

        सहमत हूँ आप से,,, शुक्रिया बहुत अच्छा लगा पड़ कर।

    • sachdechetana
      अगस्त 18, 2016 @ 06:04:25

      वोह ईश्वर स्व्यं आता भी है और स्वयं ही जाता भी है खामखा ही यां व्यर्थ ही ईश्वर सत्य को नही जानता ईश्वर अंश जीव अविनाशी और अपने चेतन अमल से सहज सुख मे नही रहता ! आश्चर्य भी और ? प्रश्न भी होता है उन बे.. .. पता नही क्या लिखे जीनको अपने आपका ही पता न हो वे सच मे कौन है ? बाकी यह सत्य को कोई भी झुठला नही सकता के हरेक स्वरूप वोही ईश्वर स्वयं आता है और नामरुप शरीर छोड़कर जाता है धैर्यवान रहना ही समझदारी है आत्म ध्यान करना प्राप्ति हेतू सर।

      प्रतिक्रिया

  32. m.gulbahar gauri
    अगस्त 28, 2013 @ 12:56:40

    हजरत मुहम्मद साहब के दोस्त (असहाबी) एक बार एक बस्ती से गुज़र रहे थे रास्ते मे एक आदमी से मुलाकात हुई उन्होने उससे कहा भाई नमाज पढा करो अच्छे सदकम॔ किया करो अल्लाह खुश होगा तो उस आदमी ने पूछा कहाँ है अल्लाह मुझे तो नज़र नही आ रहा है और उस आदमी ने सवाल किया कि अगर आप अल्लाह के होने की दलील मुझे देदो तो मै नमाज़ भी पढूगा और सदकम॔ भी करूगा असहाबी पर उसके सवाल का जवाब नही दे पाया ॥ असहाबी ने इसका जिक्र आप मुहम्मद साहब से किया तो आपने असहाबी से कहा कि अगर वो आदमी आपको दोबारा मिले तो उसे हमारे पास ले आना उसे उसके सवाल का जवाब मिल जायेगा असहाबी उसे साथ लेकर आप मुहम्मद साहब के पास पहूचे आप ने उससे कहा क्या सवाल है आपका आदमी ने सवाल दोहराया तो आपनेउसके जवाब मे कहा ॥॥कि आदमी का अपने मकसद मे नाकामयाब होना ही अल्लाह के होने की दलील है ॥॥मतलब अरबो रूपया होने के बावजूद भी जब हम अपने बीमार,घायल बच्चे को मौत से नही बचा पाते तो आखिर मे क्यो कहते है कि अल्लाह की एसी ही मरजी थी या ईशवर की एसी ही इच्छा थी या देव ईच्छा महान और ये दुनिया के हर ध॔म को मानने वाले लोग मजबूर होकर सिफ॔ऊपर वाले शरन मे जाते है

    प्रतिक्रिया

  33. doesnt matter
    अगस्त 29, 2013 @ 14:54:11

    Sbse phle to aap y maane ki manushaya AAJ hi swarthi nhi hua wo to paida hi swarthi hua tha karodo salo phle kyuki shudh swarth hi jiwan ke liye jaruri h…duusra Avatar ki Dharna badaliye Jab Jab ek garib ko dekh Aap,ke man m daya bhawna,Aati h Tab Tab bhagwan Apke bhitar Avatar lete h Nhi ati Day to alag baat h anyatha Krishna ke khe hue wachan Sidh Hogye usi shan haroj hote h aapme mujme
    Tisra Positive baate b giniye sirf bura h nhi h acha to hmesa durlabh h pr h uske bina aap b sambhav nhi the web par gandi sites h to ye bhi to ek h…aur dekho yehi behtar aur bhari padi ..lo jeet gyi achai aur ho gya Avatar:)

    प्रतिक्रिया

  34. Shekhar Sharma
    दिसम्बर 17, 2013 @ 18:07:35

    जो आप ने कहा वह सत्य नही है। जहा हमारी सोच समाप्त होती है वहा अवतारी पुरूषो की सोच शुरू होती है। उनके क्या विचार रहे होंगे कोई नही जानता। यदि प्रमात्मा रचियता है तो वह अपने अनुसार सही ही कर रहा है। जहा तक आज धर्म के विनाश की बात है जो समय हमेशा अक जैसा नही रहता। यह बदलता रहता है। समय अवश्य बदलेगा और फिर से परिस्थिति समान्य होगी।

    प्रत्युत्तर में –
    आपकी टिप्पणियों के लिए धन्यवाद। आप मुझसे सहमत नहीं। यह स्वाभाविक है। मेरे साथ भी यही लागू होता है कि मैं आपसे सहमत नहीं हो सकता। मतभेद मनुष्य समाज में स्वाभाविक रूप से देखने को मिलते हैं। यह दावा करना आसान है कि मैं जो जानता हूं वही सच है। परंतु कौन सच जानता है और कौन नहीं इसका निर्णय कोई नहीं कर सकता। मैं दावा नहीं करता कि मैंने जो लिखा है वह ऐतिहासिक सच है। मैं केवल यह कहता हूं कि जो मुझे पढ़्ने को मिला है उसका अर्थ मुझे वैसा लगा जैसा लिखा है। कहने वाले का मंतव्य वह नहीं रहा जो उसके कथित शब्दों से लगता हो तो कहने वाले ने अधिक स्पष्ट एवं असंदिग्ध शब्दों में अपनी बात क्यों नही कही यह प्रश्न मेरे मन में जरूर उठता है।

    प्रतिक्रिया

  35. SUMITRA GUPTA
    अप्रैल 10, 2014 @ 17:45:11

    ॐ मृत्यु — एक सिलसिला है परिवर्तन का
    परमतत्व परमात्मा ने एक से अनेक होने की इच्क्षा से सृष्टि का निर्माण किया और जन्म और मृत्यु का विधान भी साथ-साथ बनाया इसलिये सृष्टि में जो भी आया है उसका जाना भी निश्चित है। जब कोई भी जन्म लेता है तभी उसकी मृत्यु भी तय हो जाती है।मौत का झपट्टा तो कई पहरों के बीच से भी उठा कर ले जाता है इससे ना राजा बच सका ना रंक, ना देवता ना राक्षस, ना साधु ना सन्यासी।
    जिन्होंने हजारों वर्षों की तपस्या करके अजर अमर होने का वरदान पाया था वे भी नहीं,क्योंकि जन्म और मृत्यु तो एक शाश्वत सत्य है। वैसे मेरा ऐसा मानना है कि मृत्यु एक रूपान्तरण है अर्थात् वस्तु अथवा व्यक्ति का रूप परिवर्तन होना जब कोई मनुष्य मर जाता है तो उसका शरीर यहीं रह जाता है जिसका अपने-अपने धर्मो के अनुसार मनुष्य क्रिया-कर्म करता है कोई जलाकर , कोई बहाकर अथवा कोई दफनाकर, यानि ये शरीर इस संसार के पंच तत्वों में ही विलीन हो जाता है। और इस शरीर में निहित जो परमात्मतत्व है ,निकल कर वह पुनः अपने -अपने कर्मो के अनुसार इस संसार में अन्य किसी रूप में जन्म ले लेता है और समयानुसार पुनः समाप्त हो जाता है इस तरह यह प्रक्रिया अबाध गति से चलती रहती है
    इसी तरह संसार की समस्त जड़-चेतन वस्तुयें भी इसी संसार में विलीन होकर रूप परवर्तित करती रहती हैं। जैसे कुछ राख होकर,कुछ भस्म रूप होकर,कुछ मिट्टी रूप होकर,कुछ जल रूप होकर और कुछ ठोस रूप होकर आदि-आदि।रूप परिवर्तन की यह प्रक्रिया निर्बाध गति से निरन्तर चलती रहती है।इस शरीर में निहित जो परमतत्व है वह पुनः अपने कर्मों के अनुसार इसी संसार में अन्य किसी रूप में जन्म लेकर पुनः-पुनः आता है और समयानुसार पुनःसमाप्त होकर और फिर पुनः अन्य किसी रूप में जन्म ले लेता है।पर हम सभी इस शरीर की मूल्यवानता को ना पहचानकर यूँ ही इसे गँवा रहे हैं।कहा भी है–
    जन्म से लेकर मरण तक,दौड़ता है आदमी
    ,एक रोटी दो लंगोटी,तीन गज कच्ची ज़मीं
    तीन चीजें चार दिन में,जोड़ता है आदमी
    है यहाँ विश्वास कितना?आदमी, की मौत पर
    मौत के हाथों सभी कुछ छोड़ता है आदमी
    तात्पर्य है,मनुष्य जीवन भर खाने कमाने में ही सारा जीवन खपा देता है और जोड़-जोड़कर रखता जाता है और जब मौत आ जाती तब सब कुछ मौत के हाथों में छोड़कर यहाँ से विदा हो जाता है।मगर अन्य किसी रूप में पुनःआ जाता है और दुनियाँ में आवागमन का,परिवर्तन का चक्र यूँ ही चलता रहता है।अतः यह सत्य है कि मृत्यु नाम है एक परिवर्तन का चाहे वह वस्तु का हुआ हो अथवा शरीर का—-दुनियाँ में जीना है,तो मेहमान बनकर जीते रहें,मालिक बनकर ना जीयें।
    सन्त जन अथवा शास्त्रमतानुसार चौरासी लाख योनियों में वह परम तत्व भ्रमण करते-करते अन्त में मनुष्य रूप धारण करता है जो बड़ा ही अनमोल होता है। क्योंकि मनुष्य रूप के माध्यम से ही,जो परमतत्व हमारे शरीर में आया है उन्हीं में मिलाकर आवागमन के चक्र से मुक्त हुआ जा सकता है। प्रभु नाम स्मरण,अभिमान रहित मन बुध्दि,शुभ कर्म और प्रेम-भक्ति से ही उन परमप्रभु परमात्मा को पाया जा सकता है।
    मृत्यु पर आधिपत्य करने के लिये बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने भी प्रयास किया, मगर वे भी सभी असफल ही रहे। वह परमतत्व शरीर में से कब कहां से बाहर निकल जाता है पता ही नहीं चलता। उन्होंने एक परीक्षण भी किया था, एक कांचनुमा बॉक्स में एक मरणासन्न व्यक्ति को रखा लेकिन जब उसके प्राण निकले तो वह तत्व कांच को फोड़ता हुआ बाहर निकल गया और वैज्ञानिक कुछ ना कर पाये
    हिरण्याक्ष ,हिरण्यकश्पु,कंस ,रावण आदि-आदि राक्षसों ने तो स्वंय की मृत्यु ना आये इसके लिये बड़े- बड़े तप करके वरदान भी पाये मगर मृत्यु के पाश से अपने आपको कोई भी ना बचा पायाl वरन् प्रभु ने अवतार ले लेकर उनको उन सभी के वरदानों के अनुसार ही मृत्यु प्रदान की, और उनके आत्मतत्व को अपने में ही समाहित कर लिया । मृत्यु रूपी अजगर तो अपना मुंह खोले हमेशा ही खड़ा रहता है वह किसको कब कहां निगल जायेगा कुछ पता नहीं। कहा भी है—
    क्या भरोसा है इस जिदंगी का, साथ देती नहीं ये किसी का
    सांस रुक जायेगी चलते- चलते,शंमा बुझ जायेगी जलते-जलते
    दम निकल जायेगा-दम निकल जायेगा-दम निकल जायेगा
    दम निकल जायेगा आदमी का,क्या भरोसा है इस जिंदगी का
    विडम्बना तो देखिये, आदमी ऐसे जीता है कि वह कभी मरेगा ही नहीं और मर जाता है तो लगता है कि वो था ही नहीं ।यद्धपि यह भी सत्य है कि वह अन्य रूप में इसी संसार में पुनःआ जाता है और रूपों के परिवर्तन की ,भिन्न-भिन्न योंनियों में आवागमन के परिवर्तन की यह प्रकिया सृष्टि में निरन्तर चलती रहती है। अतः अपना ये अनमोल जीवन सार्थक हो सके,इसके लिये कर्तव्य और कर्म का निर्वहन करते हुये प्रभु नाम ध्यान भी अवश्य करते रहना चाहिये।
    प्रभु कृपा दृष्टि सभी पर सदा बनी रहे।
    जय- जय राधे-श्याम,जय-जय सीता-राम
    09987648582

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  36. SUMITRA GUPTA
    अप्रैल 10, 2014 @ 18:03:11

    kan kan mein hi parmatma hai ya yun kahana chahiye ki kan -kan hi parmatma hai.usake alawa kuchh bhi nahin ..LILA KHELANE KELIYE UNHONE HI MAYA SE ANGINAT ROOP DHARAN KIYE HUYEN HAIN KYONKI LILA TO VIRUDDHATAYEN HONGI TAB HI KHELI JA SAKATI HAI,..PRABHU ROOP KISKE HRIDAY MEIN BAITHKAR KYA BHAV LAYENGE YE PRABHU HI JANE..PAR YE SATY HAI KI ACHCHHA KARY SUKH SHANTI PRADAN KARTA HAI AOR BURA KARY ASHANTI AOR DUKH. ISBAT KO TO MERE BHAI YOGENDRA JOSHI JI NAHI JHUTHLA SAKATE. PARMATMA KE HONE KA SABASE BADA PRAMAN TO KHUD BHAI JOSHI JI HI HAIN..SOCHIYE JARA AP KON HO ,KAHAN SE AAYE HO ,AOR KAHAN CHALE JAOGE,,,.
    DHANYBAD PRABHU KI LILA KO JO APNE HI ANSHON KO MADHYAM BANAKAR KAISI-KAISI LILAYEN KHELRAHI HAI

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  37. VIBHAS
    अप्रैल 26, 2014 @ 14:09:32

    एक महान भूल
    परमात्मा सर्व व्यापक नहीं है
    यह कितने आश्चर्य की बात है कि आज एक और तो लोग परमात्मा को ‘माता-पिता’ और ‘पतित-पावन’ मानते है और दूसरी और कहते है कि परमात्मा सर्व-व्यापक है, अर्थात वह तो ठीकर-पत्थर, सर्प, बिच्छू, वाराह, मगरमच्छ, चोर और डाकू सभी में है ! ओह, अपने परम प्यारे, परम पावन, परमपिता के बारे में यह कहना कि वह कुते में, बिल्ले में, सभी में है – यह कितनी बड़ी भूल है ! यह कितना बड़ा पाप है !! जो पिता हमे मुक्ति और जीवनमुक्ति की विरासत (जन्म-सिद्ध अधिकार) देता है, और हमे पतित से पावन बनाकर स्वर्ग का राज्य देता है, उसके लिए ऐसे शब्द कहना गोया कृतघ्न बनना ही तो है !!!
    यदि परमात्मा सर्वव्यापी होते तो उसके शिवलिंग रूप की पूजा क्यों होती ? यदि वह यत्र-तत्र-सर्वत्र होते तो वह ‘दिव्य जन्म’ कैसे लेते, मनुष्य उनके अवतरण के लिए उन्हें क्यों पुकारते और शिवरात्रि का त्यौहार क्यों मनाया जाता ? यदि परमात्मा सर्व-व्यापक होते तो वह गीता-ज्ञान कैसे देते और गीता में लिखे हुए उनके यह महावाक्य कैसे सत्य सिद्ध होते कि “मैं परम पुरुष (पुरुषोतम) हौं, मैं सूर्य और तारागण के प्रकाश की पहुँच से भी प्रे परमधाम का वासी हूँ, यह सृष्टि एक उल्टा वृक्ष है और मैं इसका बीज हूँ जो कि ऊपर रहता हूँ |”
    यह जो मान्यता है कि “परमात्मा सर्वव्यापी है” – इससे भक्ति, ज्ञान, योग इत्यादि सभी का खण्डन हो गया है क्योंकि यदि ज्योतिस्वरूप भगवान का कोई नाम और रूप ही न हो तो न उससे सम्बन्ध (योग) जोड़ा जा सकता है, न ही उनके प्रति स्नेह और भक्ति ही प्रगट की जा सकती है और न ही उनके नाम और कर्तव्यों की चर्चा ही हो सकती है जबकि ‘ज्ञान’ का तो अर्थ ही किसी के नाम, रूप, धाम, गुण, कर्म, स्वभाव, सम्बन्ध, उससे होने वाली प्राप्ति इत्यादि का परीच है | अत: परमात्मा को सर्वव्यापक मानने के कारण आज मनुष्य ‘मन्मनाभाव’ तथा ‘मामेकं शरणं व्रज’ की ईश्वराज्ञा पर नहीं चल सकते अर्थात बुद्धि में एक ज्योति स्वरूप परमपिता परमात्मा शिव की याद धारण नहीं कर सकते और उससे स्नेह सम्बन्ध नहीं जोड़ सकते बल्कि उनका मन भटकता रहता है | परमात्मा चैतन्य है, वह तो हमारे परमपिता है, पिता तो कभी सर्वव्यापी नहीं होता | अत: परमपिता परमात्मा को सर्वव्यापी मानने से ही सभी नर-नारी योग-भ्रष्ट और पतित हो गये है और उस परमपिता की पवित्रता-सुख-शान्ति रूपी बपौती (विरासत) से वंचित हो दुखी तथा अशान्त है |
    अत: स्पष्ट है कि भक्तों का यह जो कथन है कि – ‘परमात्मा तो घट-घट का वासी है’ इसका भी शब्दार्थ लेना ठीक नहीं है | वास्तव में ‘गत’ अथवा ‘हृदय’ को प्रेम एवं याद का स्थान माना गया है | द्वापर युग के शुरू के लोगों में ईश्वर-भक्ति अथवा प्रभु में आस्था एवं श्रद्धा बहुत थी | कोई विरला ही ऐसा व्यक्ति होता था जो परमात्मा को ना मानता हो | अत: उस समय भाव-विभोर भक्त यह ख दिया करते थे कि ईश्वर तो घट-घट वासी है अर्थात उसे तो सभी याद और प्यार करते है और सभी के मन में ईश्वर का चित्र बीएस रहा है | इन शब्दों का अर्थ यह लेना कि स्वयं ईश्वर ही सबके ह्रदयों में बस रहा है, भूल है |

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  38. sanjeev kumar
    जनवरी 18, 2015 @ 09:12:41

    WO ISHWAR HAR AUR SE HATH-PAR-MUKH-KAAN AADI WALA HAI ATHARAT WO HI HAR STHAN PAR VIDYAMAN HAI-TO AISA KAUN PRANI HAI JISKE HIRDEY ME WO PRERNA KAR APNE KARYE KO SIDH NA KAR SAKE-YE HI TO IS SHALOK KA MOOL UDESHEY HAI-KI WO JAB,JIS SMAY JO CHATA HAI KISI KE BHI SHAREER KA PARYOG KAR APNA KARYA SIDH KAR LETA HAI
    JAI SHREE KRISHNA

    प्रतिक्रिया

  39. Sham
    जुलाई 28, 2015 @ 23:10:19

    Dharm aur adharm hamse hi shuru hoti hai dosto.
    Har yug me adharm tha.har yug me dekho…
    aur dharm ki stapana ke liye vo ishwer ata tha aur ata rahega.
    Bas hum niti niyam ko bhool gaye hai. Hum yam niyam ko bhool gaye hai.
    Kahi to suna tha ki acchai aur burai ki lakir sidha dil se nikalti hai.
    Saty to ishwer hi hai.

    प्रतिक्रिया

    • योगेन्द्र जोशी
      जुलाई 29, 2015 @ 18:28:13

      धर्म का पालन और अधर्म से विरत रहना मनुष्य के हाथ में है क्या? कौन उसमें दुराचरण की प्रवृत्ति पैदा करता है? क्यों ईश्वर किसी को सद्बुद्धि देता है तो किसी को दुर्बुद्धि? यदि वही अपने सत्कर्मों-कुकृत्यों के लिए उत्तरदायी है तो ईश्वर की इस विषय में भूमिका क्या रह जाती है? इस प्रकार के अनेक प्रश्न हैं जो मेरे मन में उठते हैं जिनका उत्तर मेरी जानकारी में किसी के पास नहीं है।

      प्रतिक्रिया

      • sachdechetana
        अगस्त 18, 2016 @ 07:04:01

        जहाँ अधर्म होता है, वहा धर्म की स्थापना करने मै जरुर आता हुं हर वक्त हर समय वर्तमान मे हि स्वयंसिद्ध जीवन देने हेतु सर। अधर्म फुलफोर्म: अन्न ध्यान राम को वायु मंडल मे भरा भरा प्राण वायु ही समझे। जीतना शरीर मे भरो गे उतना ही जीवन सानदार जानदार और समझदारी पूर्ण बिताओगे और सद्गुण जाग्रत होंगे जीवन मे और ईश्वर कृपा हो जाते ही ईश्वर अंश से ईश्वर शरणागत जीव स्वयं मनुष्य से ईश्वर ही बन जाएं धन्यवाद। शुभ प्रभात।

  40. नीरज
    अक्टूबर 13, 2015 @ 23:03:09

    प्रिय जोशी जी,
    मैं आपके लेखन से सहमत या असहमत नहीं हूँ। परन्तु आपके लेखन कला की सराहना करता हूँ। मैंने कुछ प्रतिक्रियाओं पर भी आपके प्रतियुतर पढे। मेरी अपनी समझ है कि आपके पास एक निश्चित तर्क बुद्धि और समझने समझाने की अच्छी क्षमता है।
    जोशी जी
    आपके इस लेख के बारे में अपनी जानकारी और समझ से कहना चाहूँगा कि कोई भी वक्तव्य किसी ने किसी को किसी समय किस परिस्थिति में कहे और जिसे कहे उसकी मानसिक स्थिति कैसी थी। उसका बुद्धि स्तर कितना था। यह सब जानना जरूरी होता है। हम द्वापर युग की बात को सही या गलत कैसे सिद्ध कर सकते हैं।
    आपने ॠगवेद का वचन तो सुना होगा – shruti bhinna smriti yashche bhinna, na ekomunirasya vacheh pramanam, braham tatva nihamtam guhayaam mahajano yen gatteh sa patha,

    Means listening abilities are different, memory power is different of each person, not even the words of Saint and sages can be used as evidence, as the element of God is very deep, go to the Path where Great people go…

    जहाँ तक आज के युग में कृष्ण जी के होने की बात है तो आप गीता का पूर्ण अध्ययन करेंगे तो पाएगें कि श्री कृष्ण खुद कहते हैं कि जो मुझे देवकी और वासुदेव के घर जन्मा जानते हैं वे नासमझ हैं।
    Some people says consciousness which never dies… it can be awakened by any Awakened one or can be Awakened by only reading scriptures… All that will Awaken the consciousness is actually Lord Krishna.
    In this way lord krishna is still in this yug.

    प्रतिक्रिया

    • योगेन्द्र जोशी
      अक्टूबर 19, 2015 @ 16:56:19

      श्रीमान्‌ नीरज जी, टिप्पणी के लिए धन्यवाद । प्रत्युत्तर में पहले “तर्कोऽप्रतिष्ठः —” के बारे में । उद्धृत श्लोक व्यासरचित ग्रन्थ महाभारत के वनपर्व के अन्तर्गत आरणेयपर्व में वर्णित युधिष्ठिर-यक्ष संवाद (यक्षप्रश्नों) के श्लोकों में से एक है। यह ऋग्वेद-संहिता की कोई ऋचा नहीं है ।

      तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयः विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम्‍।
      धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्था ॥
      (तर्कः अप्रतिष्ठः, श्रुतयः विभिन्नाः, एकः ऋषिः न यस्य मतम्‌ प्रमाणम्‌, धर्मस्य तत्वम्‌ गुहायाम्‌ निहितम्‌‍, महाजनः येन गतः सः पन्था ।)

      (तर्क प्रतिष्ठित नहीं है अर्थात्‌ तर्क के माध्यम से धर्म-अधर्म का निर्णय हो सकता है यह बात सिद्ध नहीं है । श्रुतियों में भी भिन्नता पाई जाती है यानी जो बातें लोगों से, पूर्वजों से, सुनते आ रहे हैं उनमें भी समानता नहीं रहती । कोई एक ऋषि नहीं जिसके मत को प्रमाण-स्वरूप स्वीकारा जाता है । वास्तव में धर्म का तत्व गुहा में छिपा हुआ है अर्थात्‌ वह अति गूढ़ है, आसानी से समझ में नहीं आता है । ऐसे में जिस मार्ग से श्रेष्ठ पुरुष, जिनको समाज में प्रतिष्ठा मिली हो, जिनका आचरण अनुकरणीय हो, जो विवादों से परे हों, आदि-आदि, उसी को धर्म का मार्ग समझना चाहिए, उन्हीं के विचार प्रामाणिक मानना चाहिए ।)

      मेरी दृष्टि में ब्लॉग में लिखित लेख और पुस्तक-पत्रिका आदि में लिखित लेखों के बीच उल्लेखनीय अंतर यह है कि पहले मामले में सही-गलत, प्रिय-अप्रिय, आदि कुछ भी लेखक लिखने के लिए स्वतंत्र होता है । कोई उसको लिखित पाठ की गुणवत्ता/स्वीकार्यता के बारे में नहीं बताता है जब कि दूसरे में उसके मूल्यांकन के बाद ही प्रकाशन होता है । इसलिए पहले में लेखक वह सब कुछ लिखने की छूट का लाभ ले लेता है जिसे कदाचित दूसरे में वह न पा सके। पहले में अन्य जनों से मतभिन्नता की और तदनुरूप टीका-टिप्पणी की पर्याप्त गुंजाइश रहती है । मैं अन्य जनों की टिप्पणियों को सहजता से स्वीकार करता हूं । जिस प्रकार मेरे विचार उनके लिए बाध्य नहीं हो सकते वैसे ही उनके विचार भी मेरे लिए स्वीकार्य हो आवश्यक नहीं है । मैं इसी नियम का पक्षधर हूं ।

      मैं बहुतों से बहुत-सी बातों को लेकर असहमत रहता हूं । मैं समझता हूं हर व्यक्ति अपने-अपने तरीके से वस्तुस्थिति को देखता है, उसकी व्याख्या करता है । ब्लॉग लेखन की यही छूट उसकी विशिष्टता है । मैं यही कहता हूं जिसे मेरी बातें ठीक न लगें वह उन बातों को सहर्ष कूड़ेदान में डाल सकता है । शुभेच्छा ।

      प्रतिक्रिया

      • sachdechetana
        अगस्त 18, 2016 @ 07:11:51

        ईश्वर अंश के लिए ईश्वर स्वयं ही है, जो आते हे और जाते भी स्वयं ही है, भेद रखना यां करना अयोग्यता है। अधर्म होता है, वहा धर्म की स्थापना करने मै जरुर आता हुं हर वक्त हर समय वर्तमान मे हि स्वयंसिद्ध जीवन देने हेतु सर। अधर्म फुलफोर्म: अन्न ध्यान राम को वायु मंडल मे भरा भरा प्राण वायु ही समझे। जीतना शरीर मे भरो गे उतना ही जीवन सानदार जानदार और समझदारी पूर्ण बिताओगे और सद्गुण जाग्रत होंगे जीवन मे और ईश्वर कृपा हो जाते ही ईश्वर अंश से ईश्वर शरणागत जीव स्वयं मनुष्य से ईश्वर ही बन जाएं धन्यवाद। शुभ प्रभात।

  41. Sanjeev Kumar
    दिसम्बर 05, 2015 @ 09:20:37

    वज्र से अधिक कठोर फूल से भी कोमल है परमात्मा,
    कपटी को कभी छोड़े ना सज्जन को माने अपनी ही आत्मा।

    प्रतिक्रिया

  42. Sanjeev Kumar
    दिसम्बर 05, 2015 @ 09:21:26

    प्राणीमात्र को सुख अति प्यारा दुख से सभी जीव डरते हैं,
    तो भी मूरख दुख पाने का करम सदा करते हैं।

    प्रतिक्रिया

  43. Sanjeev Kumar
    दिसम्बर 05, 2015 @ 09:36:59

    अहं भाव से ही सब प्रवृति होती है-धर्म-अधर्म,दुराचरण,सुबुद्धि-दुर्बुद्धि,सत्कर्म-दुष्कर्म आदि।ईश्वर इन सबका द्रष्टा और नियामक है ।अहं स्मृति के रहते ये चक्र चलता रहता है और जैसे ही ये स्मृति सम्पूर्ण नाम-रूपों से मुक्त हो व्यापक्ता को प्राप्त हो स्वयं को हर जगह पाती है तो ईश्वर और उसमे कोई भेद नहीं रहता।

    प्रतिक्रिया

  44. अजय
    फरवरी 01, 2016 @ 07:58:27

    तुने कहा कोई भी उसके अस्तित्व को साबित नही कर सकता। यो प्रश्न अगर तुम आज से 5-6 हजार वर्ष पूछता तो सभी तुझ टर खूब हसते। इतना बडा ब्रह्माण्ड क्या अपने आप बन गया?
    अगर तू ये पूछता है कि सब कुछ परमात्मा ने ही बनाया तो इसका क्या सबूत है? तो तू जिस मोबाईल या कम्प्युटर से ये सब टाईप करता है इसका सबूत दे कि ये सब मानव कृत है; जबकि ना तूने या ना मैने इसे बनाते हुए देखा। सत्य यही है सारी मशीने मानव कृत है क्योकि इन मशीनो की प्लेनिंग व तकीक बिन चेतना या समझ के संभव नही है। प्रकृति अजीव है चेतन हीन सो प्रकृति से ये बन नही सकते।
    अब आप ये देखिएगा कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मे प्लेनिंग है या नही। हाईड्रोजन के बादलो के कणो का मिल कर हिलीयम बनना। फिर हिलीयम से उष्मा व गुरूत्व शक्ति का बनना। बादलो का गठन हो कर तारे का बनना। ग्राहाणुओ से उल्काओ का बनना उल्काओ से ग्रह का बनना। उसके व तारे के गुरूत्व से ग्रह का परिक्रमा करना। आंखो को खोल के देखो मित्र पूरी सृष्टि प्लेनिंग से काम कर रही है। क्या ये सारी प्लेनिंग बिन समझ के अपने आप बन गयी। नही। जिसने इसे बनाया है वो ही परमात्मा है। उसने इसे तरीके से बनाया है परमाणुओ को गति दे कर।
    ओर ये सब जो ओज धर्म के ढिंढिरे पिट रहे है-हिंदु, मुस्लमान , सिख, ईसाई, बोद्ध ये सभी तो धरती पर मानव के 24 घण्टे जो कि पूरे होने वाले है मात्र 2-3 सेकेण्ड पलहे बने है।
    आप आत्म मंथन कर के देखो कि क्या मै गलत हू?
    ****************

    मेरे विचारों से किसी का न कुछ बनता है और न किसी का कुछ बिगड़ता है। जिसको जिस धारणा पर टिकने से सकून मिले वह उसको मानता रहे। मैं नहीं समझ पाता कि धर्म के नाम पर तमाम बातें करने वाले इस बात से क्यों परेशान होते हैं कि दूसरे उसकी बात नहीं स्वीकारते। पाप-पुण्य उसी दूसरे पक्ष के खाते में जायेगा, फल उसी को भुगतना पड़ेगा, भुगते। मनुष्य को पहले अपने कर्तव्य करना चाहिए न कि दूसरों को उपदेश देता फ़िरे।
    मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना तुण्डे तुण्डे सरस्वती। – योगेन्द्र जोशी

    प्रतिक्रिया

  45. Shashi Kant Singh
    फरवरी 01, 2016 @ 09:35:24

    Jaki Rahi Bhavna Jaisi , Prabhu Murti Dekhi Tin Taisi ||

    प्रतिक्रिया

  46. kamar ahmad
    मार्च 30, 2016 @ 15:07:39

    करोडो वर्षों के अथक परिश्रम, अनुसंधान से मनुष्य ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में इतना विकास कर सका है कि एक शक्तिशाली राकेट ‎से चाँद पर जा पहुंचा है, और फिर थोडी और प्रगति करके चाँद की कक्षा में 500 -1000 किग्रा. के उपग्रह या इससे कुछ अधिक ‎वजन के मौसम की जानकारी देने वाले उपग्रह ही वहां तक स्थापित कर सका है, मंगल की परिक्रमा करने के लिए यान प्रक्षेपित ‎कर पाया है। और अपनी इस उपलब्धि पर गर्व करता है। लेकिन जब हम सृष्टि के रचयिता के ज्ञान-विज्ञान को देखते हैं तो हम ‎हैरान हो जाते हैं कि करोडो वर्ष पहले जब इंसान को कुछ भी ज्ञान नहीं था, उस वक्त भी उस परमेश्वर के पास ऐसा ज्ञान और ‎विज्ञान था जिसके बल पर उसने पृथ्वी से भी कई-कई गुणा भारी ग्रह दूर आकाश में इतनी-इतनी दूर स्थापित कर दिये कि ‎इंसान उस दूरी का सही आंकलन भी नहीं कर सकता। यहां तक की इतनी दूर प्रकाश को आने में भी करोडो-अरबों-खरबों साल ‎तक लग जाते हैं। उस परमेश्वर के इस ज्ञान-विज्ञान को देखकर, मन बरबस ही कह उठता है कि धन्य है वो शक्ति जिसने ये ‎सृष्टि बनाई और फिर शीश अपने आप ही सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक (परमेश्वर) के सामने झुक जाता है।
    इंसान और परमेश्वर के ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी दक्षता में कोई तुलना हो ही नही सकती। उदारहण के लिए, इंसान रोशनी देने ‎के लिए एक बल्ब तो बना सकता है लेकिन इतना बडा बल्ब नहीं बना सकता कि पूरी पृथ्वी को रोशनी दे सके, लेकिन सूरज ‎करोडो-अरबों वर्ष से नियमित रूप से इस संसार को गर्माहट और रोशनी दे रहा है और उसमें कहीं कोई खराबी नहीं आयी और ना ‎ही रिपेयर और सर्विसिंग की जरूरत पडी। इंसान पूरी मेहनत से मिट्टी खोदकर एक नहर तो बना सकता है लेकिन एक समुद्र ‎कभी नहीं बना सकता और ना ही समुद्र के पानी को खाली कर सकता है। इंसान हिमालय जैसे पहाड नहीं बना सकता। सोना-‎चाँदी, हीरे-मोती, खनिज, तेल, आदि विविध प्रकार की चीजों से ये धरती भरी पडी है। और ये सब इंसान ने नहीं बनायी। विज्ञान ‎ये कहता है कि हर कार्य के पीछे कुछ ना कुछ कारक (उर्जा, बल, शक्ति) अवश्य होता है, और भौतिक विज्ञान के अनुसार इतने ‎बडे ब्रह्माँड और सृष्टि की रचना के पीछे भी कुछ ना कुछ कारक जरूर है, उसे सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक, प्रकृति, परमेश्वर आप कुछ ‎भी कह सकते हैं। ‎
    रिमोट से चलने वाली चीजें भी इंसान के ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी दक्षता का एक नमूना है, जिस प्रकार रिमोट से चलने वाली ‎चीजें लगता है कि एक ही इशारे पर अपने-आप चल रही हैं परंतु इसके पीछे वो तकनीक बनाने वाला है जिसने रिमोट का ‎आविष्कार किया। अगर रिमोट की ये तकनीक विकसित ना हुई होती तो हमें आज तक इसका पता ना चलता कि कोई वस्तु ‎एक इशारे से भी चल सकती है। बिजली, ऊर्जा का ही एक रूप है, बडी से बडी फैक्टरी और उसकी सारी मशीनें बिजली से ही ‎चलती हैं सिर्फ एक बटन दबाते ही चालू और एक बटन दबाते ही बंद।
    सृष्टि की हर एक चीज को, ग़ौर से देखने पर पता चलता है कि ये सब कुछ इतनी खूबसूरती से बनाया गया है कि बरबस ही ‎इसे बनाने वाले (परमेश्वर) के ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी दक्षता का अहसास हो जाता है, और करोडो-अरबों साल हो गये सृष्टि ‎को बने हुए, लेकिन आजतक भी इसमें (जमीन, आसमान, चाँद, सूरज, सितारे, ब्रह्मांड) कोई कमी या खराबी नहीं आ सकी। ‎इंसान, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी दक्षता में अपने-आपको बहुत कुछ समझता है लेकिन उसके बावजूद, उसकी बनायी चीजों में ‎कुछ ना कुछ खराबी आती रहती है और कोई भी चीज, चाहे कितनी भी बेहतरीन बना दी जाये, उसकी खूब गारंटी दे दी जाये ‎कुछ साल गुजरने के बाद खराब हो ही जाती है। कहां परमेश्वर का ये अथाह ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी दक्षता कि उसकी बनायी ‎किसी भी चीज में करोडो साल गुजरने पर भी कोई खराबी ना आ सकी, और कहाँ ये इंसान और उसका ज्ञान-विज्ञान और ‎तकनीकी दक्षता कि पूरी गारंटी देने के बाद भी कुछ साल में अच्छी से अच्छी चीज खराब हो ही जाती है। और बस परमेश्वर के ‎इसी अथाह ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी दक्षता और उसकी महानता के आगे इंसान नतमस्तक हो जाता है।
    कुरान में कुछ इस तरह से है, ऐ लोगों तुम एक दिन जरूर मरोगे और कोई भी तुम्हें बचा नहीं सकेगा, तुम अगर सुरंग में भी ‎छुप जाओ, चारों तरफ फौज लगाकर किले में भी बंद हो जाओ मौत तुम्हें कहीं नहीं छोडेगी और मौत तुम्हें उसी परमेश्वर के ‎आदेश से आकर रहेगी जिसने तुम्हे जीवन दिया था। और फिर परमेश्वर तुमसे तुम्हारे कर्मों के बारे में सवाल करेगा, जो तुम ‎किया करते थे और फिर उन कर्मों के आधार पर ही फल पाओगे। परमेश्वर और उसका धर्म दोनों ही शाश्वत सत्य हैं। इंसान ‎अपने ज्ञान और तर्को से अपनी बात को सही ठहराने की कोशिश करता है, लेकिन मैं ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकता, क्योंकि ‎धर्म का सच्चा ज्ञान परमेश्वर की कृपा से ही मिलता है। परमेश्वर से दुआ करता हूं कि हमें, सही ज्ञान, सत्य मार्ग, और ‎सतबुद्धि अता फरमाये, जिससे हम सच्चा धर्म अपनाकर उस पर चल सके। मैने अपनी जिंदग़ी में कितने ही लोगों को मरते हुए ‎देखा। कैसे-कैसे ताकतवर, बहादुर, बुद्धिजीवी, विलक्षण प्रतिभाओं के धनी, मौत के मुंह से खुद को बचा ना सके। जिन्होनें अपनी ‎जिंदग़ी में अपने साहस से पहाड तक को खोदकर रास्ते बना दिये, मौत के शिकंजे में फंसकर सिसक भी ना सके। वो बुद्धिजीवी, ‎जिन्हें अपनी प्रतिभा पर बडा विश्वास था, उनकी कोई भी तरक़ीब उन्हें मौत से बचा ना सकी, जिन्होनें अपने सामने किसी की ‎भी ना चलने दी, मौत के सामने उनकी एक ना चली। मौत ने उन्हें इस तरह से झिंझोडा कि बिल्कुल निर्जीव होकर, दुनिया से ‎रूख़सत हो गये। उन्हें कोई भी बचा ना सका। मौत उसी परमेश्वर (प्रकृति) के अधीन है जिसने हम सबको ये जीवन दिया है। ‎परमेश्वर (एक ऐसी शक्ति) जिसने सृष्टि बनाई, चांद-सूरज-सितारे, धरती-आकाश, इंसान, पशु-पक्षी, जीव-जन्तु आदि सब कुछ ‎बनाया और इंसान के सच्चे मार्गदर्शन के लिए अवतार पैदा किये जिन्होनें इंसान को सिर्फ अपने एक सृष्टि-रचयिता परमेश्वर के ‎बताये हुये तरीके से जिंदगी गुजारने का आदेश दिया। ‎
    मौत और ज़िंदग़ी का ये चक्र, इस धरती पर ना जाने कब से चल रहा है, ना जाने कितने जीव (मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड-पौधे ‎आदि), इस धरती पर जन्म लेते हैं, और ना जाने कितने, मौत के मुंह में चले जाते हैं। सचमुच अ}hतिय है वो शक्ति, जिसने ‎जीवन-मृत्यु का ये चक्र रचा है, जाने कब से इस धरती पर ये चक्र चल रहा है, और कब तक चलता रहेगा। उसकी ही ‎इच्छानुरूप, मनुष्य, धरती पर आते रहेंगें और अपनी-अपनी ज़िंदग़ी, पूरी करके मौत के मुंह में समाते रहेंगें। इंसान के लिए, ‎सबसे अबूझ पहेली और आश्चर्यजनक सत्य, मौत का आना ही है, जिसने आज तक किसी को भी नहीं छोडा, कोई भी इसके ‎चंगुल से अपने अपको, बचा ना सका। इतना ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, साधन-सम्पन्नता, सब कुछ होते हुए भी मौत एक ऐसा ‎शाश्वत सत्य है जिससे कोई भी पार ना पा सका।
    ऐ इंसान अगर तुम इस सारी सृष्टि को गौर से देखो तो इसके बनाने वाले की महानता के कायल हो जाओगे। और दिल यह कह ‎उठेगा कि इस अद्भुत सृष्टि को बनाने वाला सचमुच ही महान है। हिंदी की एक कविता बचपन में पढ़ी थी, जिसने सूरज चाँद ‎बनाया, जिसने तारों को चमकाया, जिसने फूलों को महकाया, जिसने सारा जगत बनाया, हम उस ईश्वर के ‎गुण गायें, उसे प्रेम से शीश झुकायें।
    एक अच्छा इंसान भलाई करने वालों को हमेशा याद रखता है। और जिस रब की कृपा से हमें ये अनमोल जीवन और सर्वगुण ‎सम्पन्न शरीर मिला है, हमें उस शक्ति का शुक्रिया अदा करना और उसकी आज्ञा का पालन करना चाहिए। ये अनमोल जीवन ‎इसलिए मिला है कि इसका सदुपयोग करके इसको सार्थक बनाया जाये। ‎

    अगर कहीं लिखने में कोई भी त्रुटि हो गई हो तो माफ करना और हो सके तो इस त्रुटि को सही कर देना। धन्यवाद।

    प्रतिक्रिया

  47. kamar ahmad
    मार्च 30, 2016 @ 15:26:41

    करोडो वर्षों के अथक परिश्रम, अनुसंधान से मनुष्य ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में इतना विकास कर सका है कि एक ‎शक्तिशाली राकेट से चाँद पर जा पहुंचा है, और फिर थोडी और प्रगति करके चाँद की कक्षा में 500 -1000 किग्रा. के ‎उपग्रह या इससे कुछ अधिक वजन के मौसम की जानकारी देने वाले उपग्रह ही वहां तक स्थापित कर सका है, मंगल ‎की परिक्रमा करने के लिए यान प्रक्षेपित कर पाया है। और अपनी इस उपलब्धि पर गर्व करता है। लेकिन जब हम ‎सृष्टि के रचयिता के ज्ञान-विज्ञान को देखते हैं तो हम हैरान हो जाते हैं कि करोडो वर्ष पहले जब इंसान को कुछ भी ‎ज्ञान नहीं था, उस वक्त भी उस परमेश्वर के पास ऐसा ज्ञान और विज्ञान था जिसके बल पर उसने पृथ्वी से भी ‎कई-कई गुणा भारी ग्रह दूर आकाश में इतनी-इतनी दूर स्थापित कर दिये कि इंसान उस दूरी का सही आंकलन भी ‎नहीं कर सकता। यहां तक की इतनी दूर प्रकाश को आने में भी करोडो-अरबों-खरबों साल तक लग जाते हैं। उस ‎परमेश्वर के इस ज्ञान-विज्ञान को देखकर, मन बरबस ही कह उठता है कि धन्य है वो शक्ति जिसने ये सृष्टि बनाई ‎और फिर शीश अपने आप ही सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक (परमेश्वर) के सामने झुक जाता है।
    इंसान और परमेश्वर के ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी दक्षता में कोई तुलना हो ही नही सकती। उदारहण के लिए, ‎इंसान रोशनी देने के लिए एक बल्ब तो बना सकता है लेकिन इतना बडा बल्ब नहीं बना सकता कि पूरी पृथ्वी को ‎रोशनी दे सके, लेकिन सूरज करोडो-अरबों वर्ष से नियमित रूप से इस संसार को गर्माहट और रोशनी दे रहा है और ‎उसमें कहीं कोई खराबी नहीं आयी और ना ही रिपेयर और सर्विसिंग की जरूरत पडी। इंसान पूरी मेहनत से मिट्टी ‎खोदकर एक नहर तो बना सकता है लेकिन एक समुद्र कभी नहीं बना सकता और ना ही समुद्र के पानी को खाली ‎कर सकता है। इंसान हिमालय जैसे पहाड नहीं बना सकता। सोना-चाँदी, हीरे-मोती, खनिज, तेल, आदि विविध प्रकार ‎की चीजों से ये धरती भरी पडी है। और ये सब इंसान ने नहीं बनायी। विज्ञान ये कहता है कि हर कार्य के पीछे कुछ ‎ना कुछ कारक (उर्जा, बल, शक्ति) अवश्य होता है, और भौतिक विज्ञान के अनुसार इतने बडे ब्रह्माँड और सृष्टि की ‎रचना के पीछे भी कुछ ना कुछ कारक जरूर है, उसे सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक, प्रकृति, परमेश्वर आप कुछ भी कह सकते ‎हैं। ‎
    रिमोट से चलने वाली चीजें भी इंसान के ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी दक्षता का एक नमूना है, जिस प्रकार रिमोट से ‎चलने वाली चीजें लगता है कि एक ही इशारे पर अपने-आप चल रही हैं परंतु इसके पीछे वो तकनीक बनाने वाला है ‎जिसने रिमोट का आविष्कार किया। अगर रिमोट की ये तकनीक विकसित ना हुई होती तो हमें आज तक इसका पता ‎ना चलता कि कोई वस्तु एक इशारे से भी चल सकती है। बिजली, ऊर्जा का ही एक रूप है, बडी से बडी फैक्टरी और ‎उसकी सारी मशीनें बिजली से ही चलती हैं सिर्फ एक बटन दबाते ही चालू और एक बटन दबाते ही बंद।
    सृष्टि की हर एक चीज को, ग़ौर से देखने पर पता चलता है कि ये सब कुछ इतनी खूबसूरती से बनाया गया है कि ‎बरबस ही इसे बनाने वाले (परमेश्वर) के ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी दक्षता का अहसास हो जाता है, और करोडो-अरबों ‎साल हो गये सृष्टि को बने हुए, लेकिन आजतक भी इसमें (जमीन, आसमान, चाँद, सूरज, सितारे, ब्रह्मांड) कोई ‎कमी या खराबी नहीं आ सकी। इंसान, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी दक्षता में अपने-आपको बहुत कुछ समझता है ‎लेकिन उसके बावजूद, उसकी बनायी चीजों में कुछ ना कुछ खराबी आती रहती है और कोई भी चीज, चाहे कितनी भी ‎बेहतरीन बना दी जाये, उसकी खूब गारंटी दे दी जाये कुछ साल गुजरने के बाद खराब हो ही जाती है। कहां परमेश्वर ‎का ये अथाह ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी दक्षता कि उसकी बनायी किसी भी चीज में करोडो साल गुजरने पर भी कोई ‎खराबी ना आ सकी, और कहाँ ये इंसान और उसका ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी दक्षता कि पूरी गारंटी देने के बाद भी ‎कुछ साल में अच्छी से अच्छी चीज खराब हो ही जाती है। और बस परमेश्वर के इसी अथाह ज्ञान-विज्ञान और ‎तकनीकी दक्षता और उसकी महानता के आगे इंसान नतमस्तक हो जाता है।
    कुरान में कुछ इस तरह से है, ऐ लोगों तुम एक दिन जरूर मरोगे और कोई भी तुम्हें बचा नहीं सकेगा, तुम अगर ‎सुरंग में भी छुप जाओ, चारों तरफ फौज लगाकर किले में भी बंद हो जाओ मौत तुम्हें कहीं नहीं छोडेगी और मौत ‎तुम्हें उसी परमेश्वर के आदेश से आकर रहेगी जिसने तुम्हे जीवन दिया था। और फिर परमेश्वर तुमसे तुम्हारे कर्मों ‎के बारे में सवाल करेगा, जो तुम किया करते थे और फिर उन कर्मों के आधार पर ही फल पाओगे। परमेश्वर और ‎उसका धर्म दोनों ही शाश्वत सत्य हैं। इंसान अपने ज्ञान और तर्को से अपनी बात को सही ठहराने की कोशिश करता ‎है, लेकिन मैं ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकता, क्योंकि धर्म का सच्चा ज्ञान परमेश्वर की कृपा से ही मिलता है। ‎परमेश्वर से दुआ करता हूं कि हमें, सही ज्ञान, सत्य मार्ग, और सतबुद्धि अता फरमाये, जिससे हम सच्चा धर्म ‎अपनाकर उस पर चल सके। मैने अपनी जिंदग़ी में कितने ही लोगों को मरते हुए देखा। कैसे-कैसे ताकतवर, बहादुर, ‎बुद्धिजीवी, विलक्षण प्रतिभाओं के धनी, मौत के मुंह से खुद को बचा ना सके। जिन्होनें अपनी जिंदग़ी में अपने ‎साहस से पहाड तक को खोदकर रास्ते बना दिये, मौत के शिकंजे में फंसकर सिसक भी ना सके। वो बुद्धिजीवी, ‎जिन्हें अपनी प्रतिभा पर बडा विश्वास था, उनकी कोई भी तरक़ीब उन्हें मौत से बचा ना सकी, जिन्होनें अपने सामने ‎किसी की भी ना चलने दी, मौत के सामने उनकी एक ना चली। मौत ने उन्हें इस तरह से झिंझोडा कि बिल्कुल ‎निर्जीव होकर, दुनिया से रूख़सत हो गये। उन्हें कोई भी बचा ना सका। मौत उसी परमेश्वर (प्रकृति) के अधीन है ‎जिसने हम सबको ये जीवन दिया है। परमेश्वर (एक ऐसी शक्ति) जिसने सृष्टि बनाई, चांद-सूरज-सितारे, धरती-‎आकाश, इंसान, पशु-पक्षी, जीव-जन्तु आदि सब कुछ बनाया और इंसान के सच्चे मार्गदर्शन के लिए अवतार पैदा ‎किये जिन्होनें इंसान को सिर्फ अपने एक सृष्टि-रचयिता परमेश्वर के बताये हुये तरीके से जिंदगी गुजारने का आदेश ‎दिया। ‎
    मौत और ज़िंदग़ी का ये चक्र, इस धरती पर ना जाने कब से चल रहा है, ना जाने कितने जीव (मनुष्य, पशु-पक्षी, ‎पेड-पौधे आदि), इस धरती पर जन्म लेते हैं, और ना जाने कितने, मौत के मुंह में चले जाते हैं। सचमुच अ}hतिय ‎है वो शक्ति, जिसने जीवन-मृत्यु का ये चक्र रचा है, जाने कब से इस धरती पर ये चक्र चल रहा है, और कब तक ‎चलता रहेगा। उसकी ही इच्छानुरूप, मनुष्य, धरती पर आते रहेंगें और अपनी-अपनी ज़िंदग़ी, पूरी करके मौत के मुंह ‎में समाते रहेंगें। इंसान के लिए, सबसे अबूझ पहेली और आश्चर्यजनक सत्य, मौत का आना ही है, जिसने आज ‎तक किसी को भी नहीं छोडा, कोई भी इसके चंगुल से अपने अपको, बचा ना सका। इतना ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, ‎साधन-सम्पन्नता, सब कुछ होते हुए भी मौत एक ऐसा शाश्वत सत्य है जिससे कोई भी पार ना पा सका।
    ऐ इंसान अगर तुम इस सारी सृष्टि को गौर से देखो तो इसके बनाने वाले की महानता के कायल हो जाओगे। और ‎दिल यह कह उठेगा कि इस अद्भुत सृष्टि को बनाने वाला सचमुच ही महान है। हिंदी की एक कविता बचपन में ‎पढ़ी थी, जिसने सूरज चाँद बनाया, जिसने तारों को चमकाया, जिसने फूलों को महकाया, जिसने सारा ‎जगत बनाया, हम उस ईश्वर के गुण गायें, उसे प्रेम से शीश झुकायें।
    एक अच्छा इंसान भलाई करने वालों को हमेशा याद रखता है। और जिस रब की कृपा से हमें ये अनमोल जीवन ‎और सर्वगुण सम्पन्न शरीर मिला है, हमें उस शक्ति का शुक्रिया अदा करना और उसकी आज्ञा का पालन करना ‎चाहिए। ये अनमोल जीवन इसलिए मिला है कि इसका सदुपयोग करके इसको सार्थक बनाया जाये। ‎
    कानून की एक ही डिग्री लेकर भी, वकील अपनी-अपनी इच्छा के अनुरूप काम करते हैं। अपनी फीस लेकर कोई दोषी ‎को सजा दिलाने की कोशिश करता है और कोई दोषी को बचाने की कोशिश करता है। दोषी को सजा दिलाने वाले और ‎उसको बचाने वाले कभी बराबर नहीं हो सकते। उसी तरह अंधा आदमी और आँखों वाला कभी भी बराबर नहीं हो ‎सकते। क्योंकि अंधा आदमी, इस संसार को देख ही नहीं सकता जिसमें वो रहता है, सिर्फ अपनी कल्पनाओं के ‎सहारे, कुछ सोच सकता है। क्या उसकी कल्पनाओं से दुनिया की वास्तविकता का पता चल सकता है, कभी नहीं। ‎
    बिल्कुल ठीक इसी प्रकार, सच बोलने वाला और झूठ बोलने वाला भी कभी बराबर नहीं हो सकता और परमेश्वर को ‎मानने वाला और परमेश्वर को ना मानने वाला, भी कभी बराबर नहीं हो सकता। क्योंकि जो परमेश्वर में, विश्वास ‎करता है, वह, उसकी हर बात पर विश्वास करता है, और जिसको परमेश्वर में विश्वास ही नहीं, वह उसकी बात पर ‎क्या विश्वास करेगा। जिस प्रकार अपने माँ-बाप का सम्मान करने वाला, उनकी हर बात का सम्मान करता है, उसी ‎प्रकार विश्वास करने वाला, हर बात का विश्वास करता है, परंतु जिसको विश्वास ही नहीं, उसे कैसे विश्वास दिलाया ‎जा सकता है। ‎

    यें मेरे अपने विचार हैं, इन विचारों में किसी भी त्रुटि के लिए माफी चाहता हूं।

    प्रतिक्रिया

  48. विशाल
    अगस्त 30, 2016 @ 04:14:07

    प्रिये लेखक जिस तरह आप बातें कर रहे हैं मैं आप को सही तरीके से समझ पा रहा हूँ असल मई यह है आप थोड़े से भटक गये हैं आप के मन मई अशांति सी है इस लिए आप का यह कहना आप के स्वाम के समझ से बहार है मैं आप को एक छोटी सी राइ देता हूँ अगर आप अपने खुद को संतुस्ट रखना चाहते है तो कृपया पवित्र भगवत गीता मन लगा कर पढ़े धर्म के विरुद्ध न पढ़े, क्योकि किसी बी अच्छे वाकिये पे विररुद्ध रह कर उस पे बहस करना ठीक नहीं होता वह अच्छा बी बुरा है लगता है, मनो, कला अक्षर भैंस बराबर।

    प्रतिक्रिया

    • योगेन्द्र जोशी
      अगस्त 30, 2016 @ 07:09:15

      प्रत्युत्तर में –
      टिप्पणी एवं राय के लिए धन्यवाद। प्रायः हर मनुष्य उस व्यक्ति को भटका मानता है जिसकी बातों से वह स्वयं असहमत होता है। अतः आपके कथन पर मुझे आश्चर्य नहीं।

      प्रतिक्रिया

  49. स्फोटाचार्य आशीष आनन्द
    सितम्बर 01, 2016 @ 16:39:01

    इसे पूरा पढ़ें । यदि आप ऐसा दुनियाँ चाहते हैं-तो इसे लाइक करें और शेयर करें।
    “ना होगी गरीबी बीमारी, अलौकिक होंगे नर व नारी।
    प्रेम लीला ही जग में होगा, ना होगी कोई तैयारी।।
    हे तथाकथित ब्रह्मस्वरूप जीवात्मा, आत्मैक्य ! हे आर्य इश्लामादि हे आत्मा, रूह, सोलादि ! सुनो ! सुनो ! लगभग सोलह खरब वर्ष से सभी कल्पों में, सभी युगों में, सभी कल्पों एवं सभी मन्वन्तरों में, यहाँ तक कि सृष्टि के निर्माण के समय से हि त्रिदेवो में वैमनष्यता है, अशांति है! परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्र ने पिता की अवमानना की, श्रापित हुआ! भगवान ब्रह्मा भी श्रापित हुए ! भगवान ब्रह्मा के पुत्र सहिंता के निर्माता राजा दक्ष ने भगवान शंकर का विरोध कर अपनी पुत्री को आत्महत्या करने पर मजबूर किया और भगवान शंकर को रुद्रता पर उतारू होने को विवश किया ! भगवान विष्णु लाचार क्यों ? आखिर सनातन से ही यह त्रिदेवीय परंपरा चली आ रही है और सनातन से महर्षि मानवों को उपदेश एवं ज्ञान देते चले आये हैं। सबों ने उनकी आराधना की ! पृथ्वी पर शांति स्थापित करने का प्रयास किया, परन्तु उसके विपरीत ही होता चला गया ! वह तो कलियुग नहीं था तो भी उतना दुःख और अशांति क्यों हुई, वैमनष्यता क्यों हुई?
    यही तो रहस्य है इस ब्रह्माण्ड का, जिसके कारण अभी तक शांति स्थापित नहीं हुआ है ! अभी तक किसी संतो या भक्तो ने त्रिदेव आदि के दुखो को दूर करने का नहीं सोचा ! न ही ईश्वरस्वरुप के परम सत्य को जान सका ! महर्षि भृगु जैसे महायोगी को भी विष्णु को लात मारकर ईश्वर होने की प्रमाणिकता खोजनी पड़ी थी अर्थात उन्होंने भी ईश्वर का ज्ञान(आत्मज्ञान) प्राप्त नहीं किया ! केवल अपने और जीव के कल्याण के लिए ही पूजा, यज्ञ , हवन, आदि होता रहा, परन्तु स्थिति जस-की-तस बनी हुई है! श्री राम आये मार-काट कर धर्म की स्थापना कर चले गए फिर ज्यो का त्यों क्यों हो गया, श्रीकृष्ण आये मार-काट कर “यदा-यदा हि धर्मस्य …..” कहकर धर्म की स्थापना कर चले गए पुनः वैसा ही हो गया ! भगवान श्रीकृष्ण ने “यदा-यदा” क्यों कहा? सर्वदाहि धर्मस्य क्यों नहीं कहा ? यदि इसे आप लीला भी कहे तो यह स्पष्ट है कि जब रचना / लीला / आदर्श ही वैमनष्यताओ से भरी एवं मार-धार से भरपूर है तो उससे सृजन, पथप्रदर्शन अथवा जीवन शांतिमय कैसे हो सकती है ! गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी लिखा है कि “ईश्वर एवं माया के संवाद-विवाद में सृष्टि का प्रकटीकरण हुआ है !” मैंने इसे सत्य ही देखा– “हे माँ शक्तिरूप प्रकृति प्रबल परा में समाई तू, है यह लीला ब्रह्मवत्सल की प्रकृति बनकर आई तू !” हे ब्रह्मस्वरुप मानव शांतिमय जीवन एवं सृजन के लिए तो शांतिमय एवं प्रेममय लीला हि सर्वोपरि हो सकता है ! इसलिए हमसब मिलकर “सत्यधर्म” द्वारा आयोजित इस महायज्ञ में शामिल होकर ईश्वर से प्रार्थना करे या प्रेम की लड़ाई लड़े कि इस सृष्टि का प्रकटीकरण केवल संवाद में ही हो ताकि वैमनाश्यताओ का जन्म ही न हो सके , शंकर और माता सती का मिलन हो सके और तभी मानव एवं ब्रह्माण्ड का कल्याण संभव है ! अब ईश्वर ने “सत्यधर्म” के द्वारा “सर्वदाहि धर्मस्य “ कह कर “दिव्ययुग” की स्थापना का संकेत सन्देश दिया है, क्योंकि ईश्वर ने “अनंता” के द्वारा अध्यात्म की रहस्यों की गुत्थी को सुलझाकर जीवात्मा हेतु ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया है और “महाब्रह्माण्डीय चेतना परब्रह्म महायज्ञ (आत्मज्ञान यज्ञ)” (भावनात्मक एवं हवानात्मक ) न भूतो महायज्ञ का आयोजन किया गया है ! इस महायज्ञ में आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक कसौटी से अभिभूत “आर्गुमेंटल दिव्यदृष्टि” द्वारा वह एक “सर्वशक्तिमान” का यथार्थ आत्मदर्शन एवं आत्मज्ञान आलोकित किया जाएगा जिससे जीवात्मा (मानव) अन्तः एवं बाह्य दोनों में इस परमसत्ता के दिव्यस्वरूपो का आत्मदर्शन, आत्मानुभूति एवं महानशांति की अनुभूति प्राप्त कर सकेंगे , जो इस ब्रह्माण्ड का सर्वप्रथम घटना होना है ! अतः आप सब के सर्वांगीण सहयोग की पूर्ण आवश्यकता है ! आत्मैक्यता को प्राप्त करने, त्रिदेवो का दुःख दूर करने, सम्पूर्ण मानव जाति को अलौकिक बनाने तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में शांति स्थापना करने तथा “दिव्ययुग” की स्थापना हेतु दिव्यनेता के बनने का मार्ग प्रशस्त करें एवं महाशांति, महासुख एवं महानंद को प्राप्त करें ! इस महायज्ञ का मूल लक्ष्य — आध्यात्मिक क्रांति, भारत को विश्व गुरु सिद्ध करना , विज्ञान-अध्यात्म की समता को पूर्णसिद्ध करना , सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में शांति स्थापना हेतु मानक से निवेदन नहीं बल्कि ईश्वर से लड़ाई लड़ना ताकि सृष्टि का प्रकटीकरण ईश्वर-माया के संवाद-विवाद में नहीं अपितु सिर्फ और सिर्फ संवाद में हो ! स्वामी विवेकानंद, महागुरु श्रीअरविंद एवं भगवान रजनीश की सद्ईच्छा की पूर्ति करना, अन्य संतो के अधूरे कार्य को पूरा करना, ईश्वरीय पहेलियों को सुलझाकर जनमानस को आर्गुमेंटल दिव्यदृष्टि द्वारा ईश्वर का दर्शन कराना ! तत्पश्चात् “सत्यधर्म ” के शाश्वत सनातन ज्ञान से आत्मैक्यता को हृदयंगम कर चतुर्युग से मुक्ति एवं अलौकिक जीवन स्थापित करना।
    “ना होगी गरीबी बीमारी, अलौकिक होंगे नर व नारी।
    प्रेम लीला ही जग में होगा, ना होगी कोई तैयारी।।
    विनीत – स्फोटाचार्य

    प्रतिक्रिया

    • योगेन्द्र जोशी
      सितम्बर 10, 2016 @ 18:48:11

      प्रत्युत्तर में –
      “ना होगी गरीबी बीमारी, अलौकिक होंगे नर व नारी।
      प्रेम लीला ही जग में होगा, ना होगी कोई तैयारी।।”
      यह कामना मनुष्य अनादि काल से करता आया है। परंतु आज तक वस्तुस्थिति में उतार-चढ़ाव होते रहे हैं, किंतु कुल मिलाकर चीजें जस की तस हैं। आगे की कुछ हो पायेगा इसकी संभावना मुझे तो नहीं नहीं दिखती। धन्य हैं वे जो उसकी संभावना देखते हैं।

      प्रतिक्रिया

  50. करण वैष्णव
    सितम्बर 10, 2016 @ 15:38:20

    उत्तर यही है ।
    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
    परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
    धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥

    प्रतिक्रिया

  51. SHIVAAY
    अक्टूबर 11, 2016 @ 11:55:44

    जब भगवान् देखना हो बता देना
    और अब किसी से ऐसो बात मत कहना
    ॐ नमः
    शिवाय्

    प्रतिक्रिया

    • योगेन्द्र जोशी
      अक्टूबर 11, 2016 @ 12:35:19

      क्षमा करें, मैं समझ नहीं पा रहा कि आपको यह अधिकार किस सामाजिक संस्था या न्यायालय ने दिया है कि आप अपना “आदेश” मुझ पर थोपें।

      आपको पूरा अधिकार है कि आप मुझसे १०१ प्रतिशत असहमत हों। किंतु वही अधिकार मुझे भी मिला है।

      यदि मेरे कथनों में वैधानिक दृष्टि से कुछ भी आपत्तिजनक हो तो आप सक्षम अधिकारियों से शिकायत कर सकते हैं। “वर्ड्प्रेस” संस्था से तो शिकायत कर ही दीजिये।

      जहां तक भगवान् के दर्शन का सवाल है लगता है आपको उनके दर्शन हो चुके हैं। उनके दर्शन के बाद भी मुझ जैसे तुच्छ जीव की बातों से आप विचलित हो रहे हैं। यह तो आश्चर्यजनक है।

      मेरे भगवद्दर्शन की चिन्ता आपको नहीं करनी चाहिए। दुनिया की करीब ७ अरब की जनसंख्या में अनेक होंगे जो भगवद्दर्शन से वंचित होंगे: उन्हें दर्शन करा दें तो उनका उपकार ही होगा और आपको पुण्यलाभ होगा!

      अनेकशः धन्यवाद।

      प्रतिक्रिया

  52. kalki
    अक्टूबर 22, 2016 @ 21:34:36

    Me aa chuka Hu “””kaliyug ka ant karne …me bhgwan kalki “””incarnation of lord Vishnu …is Dharti pr jald Ki pralay aane wala h

    प्रतिक्रिया

    • योगेन्द्र जोशी
      अक्टूबर 23, 2016 @ 17:55:01

      प्रत्युत्तर में टिप्पणी:
      प्रलय आने वाला है यह तो बन रही परिस्थितियां संकेत दे रही हैं यह में अनुभव कर रहा हूं। सीमित संसाधनों वाली इस धरा पर निरंतर तकनीकी विकास होता रहेगा यह एक वैज्ञानिक के नाते मैं नहीं स्वीकार सकता। चरम पर पहुंचने के बाद देत-सवेर अवनति आरभ होनी ही है।
      प्रलय वस्तुतः कौन लायेगा यह आपको शायद मालूम हो; मैं नहीं जानता।

      प्रतिक्रिया

  53. sachdechetana
    अक्टूबर 27, 2016 @ 07:21:40

    सभी स्नेही मानसप्रेमी साधकजनों को हमारी स्नेहमयी राम राम |

    जय सियाराम जय सियाराम जय सियाराम जय जय सियाराम

    श्रीरामचरितमानस – बालकाण्ड दोहा संख्या 49 से आगे …

    चौपाई :

    संभु समय तेहि रामहि देखा । उपजा हियँ अति हरषु बिसेषा ॥
    भरि लोचन छबिसिंधु निहारी । कुसमय जानि न कीन्हि चिन्हारी ॥
    जय सच्चिदानंद जग पावन । अस कहि चलेउ मनोज नसावन ॥
    चले जात सिव सती समेता । पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता ॥
    सतीं सो दसा संभु कै देखी । उर उपजा संदेहु बिसेषी ॥
    संकरु जगतबंद्य जगदीसा । सुर नर मुनि सब नावत सीसा ॥
    तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा । कहि सच्चिदानंद परधामा ॥
    भए मगन छबि तासु बिलोकी । अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी ॥

    भावार्थ:-श्री शिवजी ने उसी अवसर पर श्री रामजी को देखा और उनके हृदय में बहुत भारी आनंद उत्पन्न हुआ। उन शोभा के समुद्र (श्री रामचंद्रजी) को शिवजी ने नेत्र भरकर देखा, परन्तु अवसर ठीक न जानकर परिचय नहीं किया ॥ जगत्‌ को पवित्र करने वाले सच्चिदानंद की जय हो, इस प्रकार कहकर कामदेव का नाश करने वाले श्री शिवजी चल पड़े। कृपानिधान शिवजी बार-बार आनंद से पुलकित होते हुए सतीजी के साथ चले जा रहे थे ॥ सतीजी ने शंकरजी की वह दशा देखी तो उनके मन में बड़ा संदेह उत्पन्न हो गया। (वे मन ही मन कहने लगीं कि) शंकरजी की सारा जगत्‌ वंदना करता है, वे जगत्‌ के ईश्वर हैं, देवता, मनुष्य, मुनि सब उनके प्रति सिर नवाते हैं॥ उन्होंने एक राजपुत्र को सच्चिदानंद परमधाम कहकर प्रणाम किया और उसकी शोभा देखकर वे इतने प्रेममग्न हो गए कि अब तक उनके हृदय में प्रीति रोकने से भी नहीं रुकती ॥

    दोहा :

    *ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद* ।
    *सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद* ॥50॥

    भावार्थ:- *जो ब्रह्म सर्वव्यापक, मायारहित, अजन्मा, अगोचर, इच्छारहित और भेदरहित है और जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वह देह धारण करके मनुष्य हो सकता है ?* ॥50॥

    प्रतिक्रिया

  54. Ram Krishna
    नवम्बर 25, 2016 @ 21:01:58

    It is better to reject GOT than accept in wrong way. It is very vast topic. Can’t explain with such discussion. There are so many scientific way to know about what is going on behind the scene. There is always something. If you have scientific thinking then it is very nice. Blind faith is bad thing.

    प्रतिक्रिया

  55. राजकुमार खरवार रामकोला बाड न०४कुशीनगर(u.p.)
    नवम्बर 26, 2016 @ 02:06:45

    आप कैसे सोच सकते है।
    आप गीता का पुन:और बार बार पढे़।
    सायद आप का जवाब मिलेगा।
    इस जीवन मे आपने गीता पढी़।
    और उसपर बिचार किया ये ही
    गीता के लिए बड़ी बात है।

    प्रतिक्रिया

  56. Shivam Sharma
    दिसम्बर 07, 2016 @ 10:19:45

    Krishna ki bhavishyawani aaj sacch ho rhi h
    Kalyug ke 4 parts hai or abi 1 part hai.. Kalki puraan me likha h 4th part me vishnu ka 10th avtaar kalki janam lega… Please pehle ek details ko check kia kro fir post kia kro.. Brahma is science… Or tum science ka gyaan dene se pehle hrr cheez ka pta kro.. Shayad kuch smj aaye… Jai Shree raam

    प्रतिक्रिया

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