‘सहसा विदधीत न क्रियाम्’ – नीतिवचन संस्कृत काव्य किरातार्जुनीयम् से

किरातार्जुनीयम् प्रसिद्ध प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में से एक है । इसे एक उत्कृष्ट श्रेणी की काव्यरचना माना जाता है । इसकी रचना महाकवि भारवि द्वारा की गयी थी जिनका काल छःठी-सातवीं शताब्दि बताया जाता है । यह काव्य किरातरूपधारी शिव एवं पांडुपुत्र अर्जुन के बीच के धनुर्युद्ध तथा वाद-वार्तालाप पर केंद्रित है ।

उक्त महाकाव्य में वर्णित कथा कुछ यों हैः जब युधिष्ठिर कौरवों के साथ संपन्न द्यूतक्रीड़ा में सब कुछ हार गये तो उन्हें अपने भाइयों एवं द्रौपदी के साथ 13 वर्ष के वनवास पर जाना पड़ा । उनका अधिकांश समय द्वैतवन में बीता । वनवास के कष्टों से खिन्न होकर और कौरवों द्वारा की गयी साजिश को याद करके द्रौपदी युधिष्ठिर को अक्सर प्रेरित करती थीं कि वे युद्ध की तैयारी करें और युद्ध के माध्यम से कौरवों से अपना राजपाठ वापस लें । भीम भी द्रौपदी की बातों का पक्ष लेते हैं । भविष्य के संभावित युद्ध की तैयारी के लिए महर्षि व्यास उन्हें सलाह देते हैं कि अर्जुन तपस्या के बल पर शिव को संतुष्ट करें और उनसे अमोघ आयुध प्राप्त करें । महर्षि व्यास एक यक्ष को अर्जुन के साथ भेजते हैं जो उन्हें हिमालय के उस स्थल पर छोड़ आता है जहां अर्जुन को तप करना है । एक जंगली सुअर को तुमने नहीं मैंने मार गिराया इस दावे को लेकर अर्जुन का किरात (वनवासी एक जन जाति) रूपधारी शिव के साथ पहले विवाद फिर युद्ध होता है, और अंत में शिव अपने असली रूप में प्रकट होकर आयुधों से अर्जुन को उपकृत करते हैं ।

इस पूरे प्रकरण के आरंभ में द्रौपदी की बातों के समर्थन में भीम द्वारा युधिष्ठिर के प्रति कुछएक नीतिवचन कहे गये हैं । उन्हीं में से दो नीचे उद्धरित हैं:

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥३०॥

(महाकवि भारवि द्वारा रचित किरातार्जुनीयम्, द्वितीय सर्ग)
(क्रियां सहसा न विदधीत, अविवेकः आपदां परम् पदम्, विमृश्यकारिणं हि गुणलुब्धाः सम्पदः स्वयम् एव वृणुते ।)

किसी कार्य को बिना सोचे-विचारे अनायास नहीं करना चाहिए । विवेकहीनता आपदाओं का परम या आश्रय स्थान होती है । अच्छी प्रकार से गुणों की लोभी संपदाएं विचार करने वाले का स्वयमेव वरण करती हैं, उसके पास चली आती हैं ।

अभिवर्षति यो९नुपालयन्विधिबीजानि विवेकवारिणा ।
स सदा फलशालिनीं क्रियां शरदं लोक इव अधितिष्ठति ॥३१॥

(यथा पूर्वोक्त)
(यः विधिबीजानि विवेकवारिणा अनुपालयन् अभिवर्षति सः सदा फलशालिनीं क्रियां लोकः शरदम् इव अधितिष्ठति ।)

जो कृत्य या करने योग्य कार्य रूपी बीजों को विवेक रूपी जल से धैर्य के साथ सींचता है वह मनुष्य फलदायी शरद ऋतु की भांति कर्म-साफल्य को प्राप्त करता है ।

इन श्लोकों में जो भाव व्यक्त किए गये हैं वे कुछ हद तक इस दोहे में निहित हैं:
“बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय
काम बिगाड़े आपनो जग में होत हंसाय ।”

कोई भी कार्य उसके संभावित परिणामों पर सावधानी से विचार करने के बाद ही संपन्न करना चाहिए, न कि जल्दीबाजी में जैसा कि आदमी कभी-कभी कर बैठता है । हड़बड़ी में काम बिगड़ जाते हैं, यह सुविख्यात है । जल्दीबाजी के परिणाम यदि गंभीर रूप से हानिकर न हों तो कोई बात नहीं । लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि सुधार करने या परिणाम पलटने के उपाय बचते ही नहीं, और केवल पश्चाताप करने को रह जाता है । मुझे अपने अध्यापन-काल की एक घटना याद आती है । वर्षों पहले छात्रावास में रहने वाली एक छात्रा अन्य छात्रा के व्यवहार से क्षुब्ध हो गई और उसने सल्फास की गोली खाकर आत्महत्या का कदम उठाया था । आनन-फानन में उसे अस्पताल में भरती कराया गया । घोर पीड़ा से वह तड़प तो रही ही थी, उसे अपनी गलती का एहसास भी हो गया था । चिकित्सकों से उसने बचा लेने ही गुहार लगाई । किंतु तब तक काफी देर हो चुकी थी । कुछ घंटों के बाद उसने दम तोड़ किया । आत्महत्या के अधिकांश मामले आवेश में किए गये कृत्य होते हैं ।

प्रथम श्लोक में कहा गया है कि संपदाएं गुणी व्यक्ति का वरण करती हैं । मेरे विचार से यहां गुण शब्द एक विशेष अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । नीतिकार का इशारा उन गुणों से है जिनके माध्यम से व्यक्ति किसी कार्य के लिए समुचित अवसर तलाशता है, उसे कब और कैसे सिद्ध करें इसका निर्णय लेता है और तदर्थ संसाधन जुटाता है । यहां गुण शब्द का अर्थ सद्गुणों से नहीं है । परिणामों का सही आकलन करके कार्य करने का कौशल ही गुण है ।

दूसरे श्लोक में नीतिकार ने कार्य को फसली बीज की, बुद्धिमत्ता को पौधे को सींचने हेतु जल की, फलप्राप्ति को शरद-ऋतु में तैयार फसल की उपमा दी है । – योगेन्द्र जोशी

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