ऋग्वैदिक सूक्ति – आनोभद्राक्रतवोयन्तुविश्वतः (सद्विचार सभी दिशाओं से हमारे पास आवें।)

“आनो॑भ॒द्राक्रत॑वोयन्तुविश्वतः”

यह सूक्ति कइयों के लिए सुपरिचित होगी । यह ऋग्वेद की एक ऋचा का अंशमात्र है और इसका अर्थ सामान्यतः कुछ इस प्रकार लिया जाता हैः
“उत्तम विचार हमें चारों ओर से प्राप्त हों।” (देखें ‘संस्कृत सूक्ति रत्नाकर, वासुदेव द्विवेदी शास्त्री, सार्वभौम संस्कृत प्रचार संस्थानम्, वाराणसी)।

ऋग्वेद की संबंधित ऋचा का मूल पाठ यों हैः

आनोभद्राक्रतवोयन्तुविश्वतोदब्धासोअपरीतासउद्भिदः ।

देवानोयथासदमिद्वृधेअसन्नप्रायुवोरक्षितारोदिवेदिवे ॥

(आ नः भद्राः क्रतवः यन्तु विश्वतः अदब्धासः अपरि-इतासः उद्‌-भिदः । देवाः नः यथा सदम् इत् वृधे असन् अप्र-आयुवः रक्षितारः दिवे-दिवे ॥)
(ऋग्वेदसंहिता, मण्डल १, सूक्त ८९, ऋचा १)

इस ऋचा के बारे में जिज्ञासा होने पर मैंने ऋग्वेदसंहिता के सायणाचार्यकृत भाष्य एवं पं० रामगोविन्दत्रिवेदीकृत मन्त्रानुवाद (चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी) की सहायता ली । ग्रंथ में हिंदी-मंत्रानुवाद इस प्रकार दिया गया हैः
“कल्याणवाही, अहिंसित, अप्रतिरूद्ध और शत्रुनाशक समस्त यज्ञ चारों ओर से हमें प्राप्त हों या हमारे पास आवें । जो हमें न छोड़कर प्रतिदिन हमारी रक्षा करते हैं वे ही देवता सदा हमें परिवर्द्धित करें ।”

यह सरल अर्थ प्रचलित अर्थ से किंचित् भिन्न हैं । वास्तव में क्रतु (बहुवचन क्रतवः) शब्द के अर्थ शब्दकोश में यज्ञ तो दिया ही गया है, किंतु इसके अतिरिक्त प्रज्ञा, बुद्धि, शक्ति, योग्यता भी दिए गये हैं । जब शब्दों के एकाधिक अर्थ हों तो किसी कथन के सर्वाधिक उपयुक्त भावार्थ खोजना कठिन हो जाता है । आम तौर पर यज्ञ का तात्पर्य लोग अग्निकुंड में प्रज्वलित अग्नि में हव्य सामग्री की आहुति देने से लेते हैं । मैं नहीं समझता हूं कि उक्त वैदिक मंत्र में यही अर्थ निहित हैं, क्योंकि तब ‘समस्त यज्ञ चारों ओर से हमें प्राप्त हों …’ के मतलब केवल शाब्दिक मात्र लगते हैं; गंभीर व्याख्या कुछ और होनी चाहिए । वस्तुतः यज्ञ के अर्थ अपने आप में बहुत व्यापक हैं । शास्त्रों में पंचमहायज्ञों की चर्चा हैः

(१) ब्रह्मयज्ञ – लोगों में ज्ञान बांटना या उन्हें शिक्षित करना ।
(२) पितृयज्ञ – पितरों यानी पूर्वजों का तर्पण, स्मरण करना ।
(३) देवयज्ञ – होम करना, अर्थात् प्रज्वलित अग्नि में घी तथा सुगंधित अन्य पदार्थों की आहुति देना । अग्नि को अदृश्य देवों का प्रतिनिधि माना गया है जिसके माध्यम से उन्हें हव्य प्राप्त होता है ।
(४) भूतयज्ञ – प्राणियों को ‘बलि’ अथवा भोज्य पदार्थ प्रदान करना । यह अपेक्षा की जाती है कि गृहस्थ स्वयं भोजन करने से पहले उसका एक अंश पशु-पक्षियों के समर्पण हेतु अलग रखे ।
(५) नृयज्ञ – द्वार पर आये अतिथि का सत्कार करना ।

आम तौर पर यज्ञ का अर्थ होमयज्ञ से लिया जाता है ।

ये सभी यज्ञ भौतिक स्तर पर करने योग्य प्रतिदिन के कृत्य अथवा कर्मकांड हैं। लेकिन यज्ञ मानसिक भी हो सकता है । मन में शुभ कर्म करने का संकल्प और उसका कार्यान्वयन, अर्थात् सत्कर्म का चिंतन एवं संपादन भी यज्ञ ही है । उक्त ऋचा में कदाचित् वही अर्थ छिपा है । मैं सोचता हूं कि ‘हमारे मन में रहने वाले सद्विचार एवं तदनुसार प्रदर्शित व्यवहार ही हमारे यज्ञ हैं ।’ उस दिशा में वांछित प्रेरणा और सहायता हमें संसार के हर स्थान से, हर मनुष्य से, प्राप्त होवें यह प्रार्थना उक्त मंत्र में व्यक्त है ऐसा मेरा मानना है ।

उल्लिखित ग्रंथ में दिये गये सायण-भाष्य में कहा गया हैः वे यज्ञ असुरों द्वारा अहिंसित, शत्रुओं द्वारा अप्रतिरोधित, और शत्रुनाशक हों । असुरों से क्या अर्थ है, शत्रु कौन हैं, ये बातें विचारणीय हैं । हमारे अपने भीतर की अपनी आसुरी वृत्तियां एवं सत्कर्म से विचलित करने वाले विचार और बाह्य जगत् के वे सभी जो सत्कर्म के विरुद्ध चलते हों और उनके संपादन में व्यवधान डालते हों वे ही असुर हैं, हमारे शत्रु हैं । मन की अवांछित प्रवृत्तियां का विलुप्त होना और बाहर की ऐसी शक्तियों का असफल होना अथवा उनका क्षीण होना ही उनका नाश है । हमारे ‘यज्ञ’ उनको असफल करें यह वांछना व्यक्त है । भाष्य में आगे लिखा हैं: हमारे यज्ञ ऐसे हों कि रक्षक देवगण हमसे दूर न जाते हुए और प्रतिदिन हमारी रक्षा करते हुए सदैव ही हमारा परिवर्धन करें ।
कुल मिलाकर मुझे उक्त ऋचा का यह भावार्थ समझ में आता है:

“कल्याणकारी सत्कर्मों की प्रेरणा हमें सभी दिशाओं, सभी स्थानों के सत्पुरुषों, से प्राप्त होवें । हमारे ‘यज्ञ’ या सत्कर्म हमारे भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों और ऐसी ही प्रवृत्तियों वाले, व्यवधान डालने, एवं शत्रुभाव रखने वाले लोगों को असफल करने, उनकी संख्या घटाने वाले होवें । देवगण हमसे अलग न हों, हमारी प्रतिदिन रक्षा करते हुए सदैव हमें समुन्नति की ओर बढ़ावें ।”

वैदिक चिंतकों का दैवी शक्तियों में अटूट विश्वास रहा है । वे उन्हें अलग-अलग नामों से पूजते थे । वे आसुरी शक्तियों के अस्तित्व को मानते थे । एक प्रश्न जिसका उत्तर मैं नहीं जानता वह हैः दैवी शक्तियां क्या वास्तव में होती हैं ? या वे हमारे मन के सद्भावों के ही प्रतीक हैं ? शायद कोई नहीं जानता । – योगेन्द्र जोशी

3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. aniruddha pande
    सितम्बर 12, 2010 @ 20:40:44

    वेदों में प्रयुक्त कई शब्दों के अर्थो को ले कर बेहद असमंजस है . साधारण शब्दों को छोड़ दे. आप तो सोम को ही ले. “सोम” क्या है ? कोई भी विद्वान विश्वास पूर्वक नहीं कह सकता .जब सोम जैसे महत्वपूर्ण पेय के बारे में ही पता नहीं है तो साधारण शब्दों की क्या बिसात है . उपनिषदों में बार बार जिक्र आता है की देवता अप्रत्यक्ष रूप में कही बात को पसंद करते है . ऐसे में वेदों में शब्दों का अर्थ और भी कठिन हो जाते है . कई शब्दों अर्थ को ले कर भारतीय विद्वान भी एकमत नहीं है .फिर वैदिक काल की संस्कृत और उसका व्याकरण दोनों विद्वानों के ही बस की बात है . आपने बेहद उपयुक्त अर्थ लगाया है वैसा ही कुछ होगा .
    दैवी शक्तियां क्या वास्तव में होती हैं ? ये प्रश्न मैंने बहुतो से पूछा पर कोई भी संतोषप्रद जवाब नहीं मिला .मैंने जितनी भी किताबे पढ़ी .सब संदेह को ही बढाती है .ऐसा लगता ही की किसी दिन खोजते खोजते शायद उत्तर मिलेगा और शायद नहीं भी मिलेगा .

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  2. swamisamvitchaitanya
    अगस्त 19, 2011 @ 15:03:01

    bahut achha prayas hai

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  3. gopal
    मार्च 15, 2015 @ 13:59:00

    दैवी शक्तियां वास्तव में होती हैं जो पवित्र ध्यान से साक्षात भी हो सकती हैं

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