अरे दरिद्रता, मेरे बाद किसके पास जा बसोगी? – ‘मृच्छकटिकम्’ में चारुदत्त के उद्गार

शूद्रकविरचित ‘मृच्छकटिकम्’ संस्कृत साहित्य की एक चर्चित नाट्यकृति है । इस कृति के बारे में कुछएक परिचयात्मक शब्द मैंने अन्यत्र (11 फरवरी 2009 की पोस्ट में) लिखे हैं । नाटक का पहले कभी संपन्न रह चुका नायक चारुदत्त अपनी अति उदारशीलता के कारण कालांतर में निर्धनप्राय हो जाता है । किसी अवसर पर मैत्रेय नामक उसका घनिष्ठ विदूषक मित्र जब उससे मिलने आता है तो देखता है कि चारुदत्त चिंताग्रस्त है । वह चारुदत्त की आर्थिक स्थिति से सुपरिचित है और समझ जाता है कि अपनी निर्धनता को लेकर वह चिंतित है । सहानुभूतिपूर्वक वह मित्र चारुदत्त को ढाढ़स बंधाता है । तब अपनी चिंता का असल कारण समझाते हुए चारुदत्त विदूषक के समक्ष यह उद्गार प्रकट करता है:

दारिद्र्य! शोचामि भवन्तमेवमस्मच्छरीरे सुहृदित्युषित्वा ।
विपन्नदेहे मयि मन्दभाग्ये ममेति चिन्ता क्व गमिष्यसि त्वम् ॥

(दारिद्र्य! शोचामि भवन्तम् एवम् अस्मत् शरीरे सुहृद् इति उषित्वा वपन्न-देहे मयि मन्द-भाग्ये मम इति चिन्ता क्व गमिष्यसि त्वम् ।)
(शूद्रकरचित मृच्छकटिकम्, प्रथम अंक, श्लोक 38)
अर्थः- हे दरिद्रता! मैं तुम्हारे बारे में यही सोचता हूं और यही मरी चिंता है कि मेरे शरीर में एक सुहृद् – मित्र – की भांति दीर्घकाल तक रह चुकने के बाद मेरे देहावसान होने पर तुम कहां जाओगे ?

मुझे चारुदत्त के वचनों में जीवन के गंभीर यथार्थ के दर्शन होते हैं । मानव समाज में संपन्नता एवं निर्धनता सहअस्तित्व के साथ दिखाई देते हैं। दोनों के बीच का अंतर देश-काल के अनुसार न्यूनाधिक हो सकता है, किंतु वह समाप्त नहीं होता है । ऐसा कभी नहीं हुआ है कि दुनिया के किसी समाज में आर्थिक समानता रही हो । हकीकत तो यह है कि किसी एक व्यक्ति या समुदाय की निर्धनता पर ही दूसरे/देसरों की संपन्नता टिकी रहती है । संपन्न व्यक्ति कभी भी यह नहीं चाहता कि अन्य सभी उसकी तरह संपन्न हों (दो-एक अपवाद हो सकते हैं) । वस्तुतः उस व्यक्ति की सुखानुभूति काफी हद तक दूसरों की असंपन्नता पर निर्भर करती है । हम दिखावा ही तब करते हैं जब दूसरों में उतनी सामर्थ्य नहीं पाते हैं ।

ऐसी कोई व्यवस्था संभव नहीं है कि संपन्नता सभी में बराबर बंट सके । इसलिए कुछ लोगों को कंगाल, दरिद्र, विपन्न या निर्धन – आप जिस नाम से भी पुकारें – रहना ही है । चारुदत्त इस निर्धनता को एक अमूर्त सत्ता के तौर पर देखता है और कहता है कि उसे किसी न किसी के घर में अपना बसेरा तलाशना ही होता है । आज वह मेरे घर में है । मैंने उसकी उपस्थिति को उसी सहजता के साथ स्वीकारा है जैसे वह मेरी मित्र हो । अभी गरीब होने/रहने का भार मैं उठा रहा हूं, वह कहता है, किंतु मेरी मृत्यु के बाद किसी और को गरीबी वहन करनी होगी । मैं नहीं चाहता कि किसी और के घर यह जा बैठे । लेकिन इसे तो किसी न किसी को पकड़ना ही होगा । यही सोचकर मुझे कष्ट होता है । इस प्रकार के मनोभाव चारुदत्त के उक्त वचन में निहित हैं । – योगेन्द्र जोशी

3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    सितम्बर 26, 2010 @ 21:49:57

    मानव समाज की सबसे बड़ी अनुपलब्धि यही रही कि कोई समानता लाने वाली व्यवस्था स्थापित ही नहीं हो पायी।

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  2. शरद कोकास
    सितम्बर 28, 2010 @ 21:04:17

    मृच्छ्कटिकम मे यह एक दर्शन तो है जो गुप्त काल के रचे गए बहुत से भ्रमों को दूर करता है ।

    प्रतिक्रिया

  3. salim raza (m.a)translation study
    दिसम्बर 15, 2011 @ 11:23:40

    umid karta hoon aagay bhi main aap se aisee jankari milti rah gee
    khas tor par prachin natak

    प्रतिक्रिया

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