‘अप्सु अन्तः अमृतम् …’ – ऋग्वेद में जल की महत्ता एवं उपासना

ऋग्वेदसंहिता के प्रथम मंडल के पांचवें अध्याय में जल की महत्ता एवं उसकी उपासना से संबंधित कतिपय मंत्र हैं । उनमें से चार मंत्र मुझे विशेष तौर पर प्रासंगिक एवं प्रेरणाप्रद लगे । ये मंत्र हैं:

(उद्धृत ऋचाओं का स्रोत ऋग्वेदसंहिता, मण्डल 1, सूक्त 23)

अपोदेवीरुपह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः । सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः ॥18॥

(अपः देवीः उप-ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः, सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः ।)

शब्दानुसार मंत्र का अर्थ यह निकलता हैः जिस जल का पान हमारी गायें करती हैं उस जलदेवी का मैं आह्वान करता हूं । सिंधुओं अर्थात् नदियों को हवि समर्पित करना हमारा कर्तव्य है ।

यों तो सिंधु एक नदी का नाम है, किंतु संस्कृत में यह शब्द नदी के लिए भी प्रयुक्त होता है जो इस मंत्र में निहित है । हवि का रूढ़ि अर्थ प्रज्ज्वलित यज्ञाग्नि में आहुति के तौर पर दी जाने वाली हव्य सामग्री से है, जिसमें घी, तिल, चंदनकाष्ठ आदि सुगंधित पदार्थ शामिल रहते हैं । परंतु हव्य के और भी अर्थ हैं जिनमें स्वयं जल भी सम्मिलित है । उक्त मंत्र में हवि अग्नि को समर्पणीय सामग्री से भिन्न कुछ और, वस्तुतः जल, होना चाहिए ऐसा मेरा सोचना है । सामान्यतः ऋग्वेदसंहिता की ऋचाओं में निहित भावों को विद्वज्जन भी उसके सायणभाष्य के आधार पर ही समझने का यत्न करने हैं । उस भाष्य से यह स्पष्ट नहीं होता है कि हवि वास्तव में क्या है । संभव है कि नदी तट पर उसे संतुष्ट करने के लिए, उसके निर्बाध बहते रहने की कामना से, सामान्य अर्थ में संपन्न यज्ञ में प्रदत्त हव्य ही यहां पर मंतव्य हो । मुझे लगता है कि जलस्रोतों के जल को निर्बाध सरिताओं की ओर बहने देना ही कदाचित् उसे हवि देना होना चाहिए । हमें नदियों के स्वाभाविक प्रवाह को नहीं रोकना/बदलना चाहिए यही उनके प्रति सम्मान प्रदर्शन और उपसना भाव माना जाना चाहिए ।

अप्स्व९न्तरमृतमप्सुभेषजमपामुतप्रशस्तये । देवाभवतवाजिनः ॥19॥

(अप्सु अन्तः अमृतम् अप्सु भेषजम् अपाम् उत प्रशस्तये, देवाः भवत वाजिनः ।)

शब्दार्थः जल में अमृत है, जल में औषधि है । हे ऋत्विज्जनो, ऐसे श्रेष्ठ जल की प्रशंसा अर्थात् स्तुति करने में शीघ्रता बरतें ।

जल वस्तुतः जीवन है; जीवन का आधार है । जल के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है । जल स्वयं औषधि है; शरीर के दूषित तत्व जल के माध्यम से शरीर के बाहर निष्कासित होते हैं । ऐसे जल की स्तुति में यज्ञ-पुरोहित विलंब न करें । मंत्र में देव शब्द ऋत्विज् के लिए प्रयोग किया गया है, न कि देव के सामान्य अर्थ में । ऋत्विज् यज्ञ में पौरोहित्य कार्य में लगे बाह्मण-देवताओं के लिए प्रयुक्त शब्द है ।

आपःपृणीतभेषजंवरूथंतन्वेमम । ज्योक्चसूर्यंदृशे ॥21॥

(आपः पृणीत भेषजम् वरूथम् तन्वे मम, ज्योक् च सूर्यम् दृशे ।)

शब्दार्थः जल मेरे शरीर के लिए रोगनिवारक औषध की पूर्ति करे । हम चिरकाल तक सूर्य को देखें ।

उक्त मंत्रानुसार जल को औषधीय गुणों से परिपूर्ण माना गया है । यह प्रार्थना व्यक्त की गयी है कि जल मेरे शरीर को रोगों से मुक्त रखने वाले औषधीय तत्व प्रदान करे । आगे यह भी कि हम दीर्घकाल तक नीरोग रहें । लंबे समय तक सूर्य देखने का तात्पर्य यही है कि हमारी आयु लंबी रहे और हम तब तक स्वस्थ बने रहें ।

इदमापःप्रवहतयत्किञ्चदुरितंमयि । यद्वाहमभिदुद्रोहयद्वाशेपेउतानृतम् ॥22॥

(इदम् आपः प्र-वहत यत् किम् च दुः-इतम् मयि, यत् वा अहम् अभि-दुद्रोह यत् वा शेपे उत अनृतम् ।)

शब्दार्थः मैंने अज्ञानवश जो भी अनुचित कार्य किये हों, अथवा जानबूझकर दूसरों के प्रति द्वेष एवं वैर का भाव अपनाया हो, अथवा दूसरों की अनिष्ट की कामना मैंने की हो, उस सब को यह जल मुझसे दूर बहा ले जावे ।

मुझे इस मंत्र के भाव सर्वाधिक गंभीर लगते हैं । इसमें व्यक्ति का अपने अपराधों या अनुचित कार्यों के प्रति प्रायश्चित्त का भाव झलकता है । जानबूझकर अथवा अनजाने में जो भी अपराध मुझसे बन पड़े हों उनके पापों से यह जल मुझे मुक्त करे यह प्रार्थना यहां पर अभिव्यक्त है । दूसरे के प्रति दुर्भाव, उसके बुरे की चाहत से भी मुझे मुक्ति मिले । पाप कर्मों से मुक्ति और सात्विक मनोभावों की प्राप्ति की वांछना इस ऋचा में निहित है । जिस प्रकार हम जल से हाथ-पांव या शरीर धोने के बाद अपने को स्वच्छ अनुभव करते हैं, उसी प्रकार जल द्वारा अपने कलुषित विचारों के शोधन का विश्वास भी हमें हो सकता है ।

मंत्रों के प्रभाव का भौतिक पक्ष कितना सुदृढ़ है, अर्थात् भौतिक स्तर पर वे प्रभावी होते भी हैं कि नहीं, इस पर मैं स्पष्टतः कुछ भी कहने में अक्षम हूं । किंतु उनका मनोवैज्ञानिक पक्ष अवश्य महत्त्व रखता होगा ऐसा मत है मेरा । इस सरीखे मंत्र के बार-बार के उच्चारण के बाद मन साफ होने लगता होगा और हमारे विचारों का परिष्करण होता होगा ऐसा मेरा विश्वास है । – योगेन्द्र

2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    नवम्बर 16, 2010 @ 22:20:22

    अपने अवगुण स्वीकारने से मन सच में साफ होने लगता है।

    प्रतिक्रिया

  2. yogesh kumar gupta
    फरवरी 14, 2011 @ 01:42:11

    AAP KO SHAT SHAT NAMAN.

    प्रतिक्रिया

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