बोधिचर्यावतार ग्रंथ में उल्लिखित सामान्य शिष्टाचार विषयक उपदेश

आचार्य शान्तिदेव द्वारा रचित बोधिचर्यावतार बौद्ध धर्म से संबंधित एवं संस्कृत में लिखित एक पद्यात्मक ग्रंथ है । सौराष्ट्र के मूल निवासी आचार्य शान्तिदेव का समय सातवीं शताब्दि बताया जाता है । कहा जाता है कि वे तत्कालीन राजा कल्याणवर्मा के पुत्र थे और उनका बचपन का नाम शान्तिवर्मा था । दैवी प्रेरणा के वशीभूत होकर उन्होंने राज्य का परित्याग कर दिया था । कालांतर में उन्होंने दीक्षा ग्रहण कर ली और बौद्ध भिक्षु बन गये । उस काल में नालंदा बौद्ध विद्यापीठ महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का केंद्र हुआ करता था । आचार्य का शैक्षिक जीवन वहीं व्यतीत हुआ । इतिहासकार उनके तीन ग्रंथों का उल्लेख करते हैं: बोधिचर्यावतार, शिक्षासमुच्च्य, और सूत्रसमुच्चय । इनमें प्रथम ग्रंथ बौद्ध मतावलंबियों में सर्वाधिक चर्चित माना जाता है ।

बोधिचर्यावतार ग्रंथ में बुद्धत्व प्राप्त करने के मार्ग का वर्णन है । साधक के लिए सबसे पहला कर्तव्य यह है कि वह स्थूल एवं भौतिक स्तर पर स्वयं को स्वच्छ, शिष्ट एवं संयमित रखे । बाद में मनसहित इंद्रियों को वश में करते हुए योग तथा ध्यान के मार्ग में चलना होता है । उक्त ग्रंथ में शिष्टाचार की कई बातें लिखी हैं जिनका उपदेश साधक के प्रति किया गया है । असल में देखा जाये तो ये वे बातें हैं जिन्हें सामान्य मनुष्यों को भी अपने दैनिक जीवन में अपनाना चाहिए । इस ग्रंथ के उन पांच श्लोकों को मैं यहां उद्धृत कर रहा हूं, जो मुझे विशेष रूप से रोचक, प्रासंगिक एवं दैनिक व्यवहार में अपनाने योग्य लगे ।

मुझे बोधिचर्यावतार की जिस प्रति को पढ़ने का अवसर मिला है वह केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ, वाराणसी, द्वारा 1998 में प्रकाशित संस्करण है । उद्धृत श्लोक उसी के लिए गए हैं । (बोधिचर्यावतार, पंचम परिच्छेद, पृष्ठ 91-92)

दन्तकाष्ठस्य खेटस्य विसर्जनमपावृतम् ।
नेष्टं जले स्थले भोग्ये मूत्रादेश्चापि गर्हितम् ॥91॥
(दन्त-काष्ठस्य खेटस्य विसर्जनम् अपावृतम्, अपि च जले स्थले भोग्ये मूत्र-आदेः (विसर्जनम्) गर्हितम् न इष्टं ।)
दातौन एवं कफ थूकने के पश्चात् उसे ढक देना चाहिए । इतना ही नहीं पानी, सार्वजनिक भूमि एवं आवासीय स्थल पर मूत्र आदि का त्याग निंदनीय कर्म है, अतः ऐसा नहीं करना चाहिए ।

दन्तकाष्ठ के तात्पर्य नीम आदि की डंठल से ही नहीं बल्कि उसके साथ के थूक से भी होना चाहिए । आधुनिक युग में इसका स्थान बुरुश ने ले लिया है, जिसे सामान्यतः फेंका नहीं जाता है, अलबत्ता मुंह में भर आए पानी को थूका अवश्य जाता है । हमारे देश में लोग राह चलते कहीं भी थूक देते हैं और यही बात खकारने के बाद मुंह में आए बलगम के साथ भी लागू होती है । खुले एवं चिकनी-सपाट जमीन पर ये साफ देखने में आ जाते हैं और घृणास्पद दृश्य प्रस्तुत करते हैं । व्यक्ति को चाहिए कि इस कार्य हेतु नियत स्थल, झाड़ी, कूड़े-करकट, कच्ची मिट्टी या सड़क से हटकर छिपे स्थान पर थूके । दुर्भाग्य से अपने यहां रास्ते के किनारे जहां-तहां पेशाब करने में भी कई पुरुष जनों को लज्जा नहीं आती है । मैं समझ नहीं पाता कि लोग घर या कार्यस्थल पर निवृत्त होकर क्यों नहीं बाहर निकलते हैं ।

मुखपूरं न भुञ्जीत सशब्दं प्रसृताननम् ।
प्रलम्बपादं नासीत न बाहू मर्दयेत् समम् ॥92॥
(मुख-पूरं स-शब्दं प्रसृत-आननम् न भुञ्जीत, प्रलम्ब-पादं न आसीत बाहू न समम् मर्दयेत् ।)
मुंह में ठूंसकर, चप-चप जैसी आवाज के साथ एवं मुख पूरा फैलाकर भोजन नहीं करना चाहिए । पैर फैलाकर बैठने से भी बचे और दोनों बांहों को साथ-साथ न मरोड़े ।

अंग्रेजी में एक शब्द है टेबल-मैनर्स, अर्थात् भोजन-स्थान पर  सामान्यतः निभाए जाने वाले शिष्टाचार । उपरिकथित वस्तुतः वे ही शिष्टाचार हैं । कुछ तौर-तरीके साथ बैठे लोगों को खलते हैं अतः उनसे बचना चाहिए । इसी प्रकार मनुष्य को उठने-बैठने के श्लील तरीके व्यवहार में लेना चाहिए । कुछ लोगों की आदत होती है अपने हाथों से बांहों को सहलाते रहना और आस्तीनों को बार-बार ऊपर चढ़ाना । सभ्य लोगों द्वारा इसे अच्छा नहीं समझा जाता है । इसी प्रकार अन्य जन कुर्सी में बैठे हुए घुटने हिलाते रहते हैं । मैं समझता हूं कि यह भी एक त्याज्य आदत है । उक्त श्लोक इन्हीं बातों पर जोर डालता है ।

नैकयान्यस्त्रिया कुर्याद् यानं शयनमासनम् ।
लोकाप्रासादकं सर्वं दृष्ट्वा पृष्ट्वा च वर्जयेत् ॥93॥
(एकया अन्य-स्त्रिया यानं शयनम् आसनम् न कुर्याद्, सर्वं दृष्ट्वा पृष्ट्वा च लोक-अ-प्रासादकं वर्जयेत् ।)
अकेली परायी स्त्री के साथ-साथ वाहन पर बैठने, लेटने और आसन ग्रहण करने का कार्य न करे । गौर से देखकर तथा औरों से पूछकर उन बातों से बचे जो आम लोगों को अप्रिय लगती हों ।

हमारे समाज में परायी स्त्रियों के दैहिक नैकट्य से बचने की परंपरा रही है । महिलाओं से हाथ मिलाना तो दूर, किसी भी तरीके से छूना असभ्य व्यवहार समझा जाता है । यह बात और है कि आज पाश्चात्य समाजों के प्रभाव में स्वागतार्थ उनसे हाथ मिलाना आम बात बन चुकी है । लेकिन आम महिलाएं अभी भी इस नवीन आचरण से बचती हैं । निकट संबंधियों-मित्रों के घर की महिलाओं से अकेले में वार्तालाप कुछ हद तक स्वीकार्य है, किंतु इसे भी कभी-कभी शंका की दृष्टि से देखा जाता है । बहरहाल अब कई जनों की नजर में यह पिछड़ेपन की निशानी है । अपने-अपने खयालात हैं !

नाङ्गुल्या कारयेत् किञ्चिद् दक्षिणेन तु सादरम् ।
समस्तेनैव हस्तेन मार्गमप्येवमादिशेत् ॥94॥
(न तु किञ्चिद् अङ्गुल्या कारयेत्, अपि एवम् सादरम् समस्तेन दक्षिणेन एव हस्तेन मार्गम् आदिशेत् ।)
(रास्ते के बारे में पूछने वाले पथिक को)े उंगली के इशारे से संकेत नहीं देना चाहिए, बल्कि समूचे दाहिने हाथ को धीरे-से समुचित दिशा की ओर उठाते हुए आदर के साथ रास्ता दिखाना चाहिए ।

कहने का असल तात्पर्य यह है कि रास्ता पूछने वाले  के प्रति आदर भाव व्यक्त करतेे हुए प्रत्युत्तर दिया जाना चाहिए । हर समाज में सम्मान दर्शाने के अपने-अपने तरीके होते हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि ग्रंथ-लेखक के काल में उंगली से अथवा झटके के साथ हाथ उठाकर इशारा करना अशिष्ट माना जाता था । आधुनिक काल में भी शिष्ट व्यवहार सुपरिभाषित है, किंतु लोगों में उसके प्रति इतनी प्रतिबद्धता नहीं रह गयी है कि रोजमर्रा के जीवन में तदनुरूप बरताव करें ।

न बाहूत्क्षेपकं कञ्चिच्छब्दयेदल्पसम्भ्रमे ।
अच्छटादि तु कर्तव्यमन्यथा स्यादसंवृतः ॥95॥
(अल्प-सम्भ्रमे न कञ्चित् बाहु-उत्क्षेपकं शब्दयेत्, अच्छट-आदि तु कर्तव्यम् अन्यथा असंवृतः स्यात् ।)
उतावली में भी जोर-जोर से हाथ उठाकर तथा ऊंची आवाज देकर किसी को न पुकारे । चुटकी या उसी प्रकार की हल्की आवाज देनी चाहिए । ऐसा न करने पर व्यक्ति का असंयमित होना समझा जाना चाहिए ।

इस श्लोक के अनुसार जोर-शोर से किसी को पुकारना सभ्य व्यवहार नहीं माना जाएगा । वास्तव में जब तक कोई आपात स्थिति न आ पड़े, वैकल्पिक मार्ग चुनना चाहिए, जिसमें अपेक्षया शांति नजर आये । ये बातें मूलतः बौद्ध साधकों को संबोधित करके कही गयी हैं । उनसे यही अपेक्षा की जाती है कि वे शोर मचाते और जोरों से हाथ हिलाते किसी को न पुकारें । साधक को यथाशीघ्र संबंधित व्यक्ति के निकट पहुंचना चाहिए और तब हल्की आवाज में उसे पुकारना चाहिए । मेरी समझ में पहले कही गयी बातों की तुलना में यह सलाह कम अहम है ।

कुल मिलाकर शिष्ट व्यवहार संयमित, अनुशासित और संवेदनशील आचरण का द्योतक है । – योगेन्द्र जोशी

2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    दिसम्बर 11, 2010 @ 08:03:02

    मध्यमार्ग में किसी भी तरह की अति वर्जित है।

    प्रतिक्रिया

  2. Dr Prabhat Tandon
    अप्रैल 27, 2013 @ 09:33:59

    यह पुस्तक आप ने कहाँ से खरीदी ? कृपया पता अथवा लिंक दें । एक pdf जो मुझे शान्तिदेव की बोधिचर्यावतार की मिली है वह अंग्रेजी मे है http://tinyurl.com/3yvzars अहर कोई हिंदी लिंक भी हो तो बतायें ।

    प्रतिक्रिया

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