संस्कृत छंदों के उल्लेख करने में त्रुटियां – एक दृष्टांत: “मंगलम् भगवान …”

हिंदू परिवारों के धार्मिक कर्मकांडों के निमंत्रणपत्रों पर अक्सर देव-वंदना के छंद मुद्रित देखने को मिलते हैं । कम से कम उत्तर भारतीयों में तो यह परंपरा प्रचलित है ही । चूंकि शुभकार्यों का आरंभ गणेश-पूजन से होता है, अतः गणेश-वंदना के छंदों का प्रयोग सर्वाधिक मिलता है । कतिपय छंदों के उल्लेख के साथ इस विषय की चर्चा मैंने अपने हाल के ब्लाग-प्रविष्टियों (क्लिक करें) में की है । मुझे मिलने वाले निमंत्रणपत्रों पर यदाकदा विष्णु-वंदना के श्लोक भी पढ़ने को मिलते हैं । एक श्लोक, जिसका उल्लेख संभवतः सर्वाधिक किया जाता है, को इस लेख के आंरभ में चित्र में दिया गया है, जिसे मैंने किसी निमंत्रणपत्र से ही स्कैन किया है । मैं इसको दुबारा सामान्य पाठ के रूप में यथावत् (प्रस्तुत चित्र में जैसा है) आगे लिख रहा हूं:

मंगलम् भगवान विष्णुः, मंगलम् गरूणध्वजः ।

मंगलम् पुण्डरी काक्षः, मंगलाय तनो हरिः ॥

इस स्थल पर मेरा मुख्य उद्येश्य इस छंद की व्याख्या करना अथवा इसकी उपयोगिता/अर्थवत्ता स्पष्ट करना नहीं है । मैं यह बताना चाहता हूं कि कई बार लोग संस्कृत मंत्रों/छंदों का दोषपूर्ण पाठ लिखते हैं और वैसा ही दोषपूर्ण उच्चारण करते हैं । आगे कुछ कहूं इसके पहले इस श्लोक को लिखने में कौन-कौन-सी त्रुटियां मेरी दृष्टि में आई हैं उन्हें बता दूं । एक त्रुटि तो यह है कि गरुण शब्द के बदले गरुड होना चाहिए । इसे मैं टाइप करने में गलती मान लेता हूं । इसके अतिरिक्त मैं दो प्रकार की त्रुटियां देखता हूं: पहले वे जो गंभीर हैं और अर्थ का अनर्थ कर सकती हैं, या श्लोक को निरर्थक बना देती हैं । दूसरे वे जो संस्कृत के छंदों को लिपिबद्ध करने के नियमों अथवा परंपराओं के अनुसार नहीं हैं ।

पहले प्रकार के दोष स्पष्ट कर दूं । उक्त श्लोक के तीसरे चरण में ‘पुण्डरी काक्षः’ लिख गया है । ऐसा लगता है कि मानो ‘पुण्डरी’ एवं ‘काक्षः’ दो शब्द हैं । क्या अर्थ हैं इन शब्दों के ? सही शब्द (वस्तुतः पदबंध) ‘पुण्डरीकाक्षः’ है, जो दरअसल दो शब्दों के संयोग और संधि (दीर्घसंधि) से बना है:

पुण्डरीकाक्षः = पुण्डरीक+अक्षः

‘पुण्डरीक’ का अर्थ है ‘श्वेत कमल’ और अक्ष का अर्थ है इंद्रिय; यह बहुधा नेत्र के अर्थ में प्रयुक्त होता है । बहुब्रीहि समास के अंतर्गत रचे गये इस संयुक्त शब्द का अर्थ है ‘श्वेत कमल के समान नेत्र वाला’ । संस्कृत साहित्य में उपमा देने के अपने तरीके हैं । कमलनयन या कमलनेत्र जैसे शब्दों का प्रयोग सौंदर्य-वर्णन में आम रहा है । वही यहां पर किया गया है । लेकिन अगर आप ‘पुण्डरी काक्षः’ लिखते हैं, तो ये शब्द अर्थहीन हो जाते हैं ।

दूसरा दोष है ‘मंगलाय तनो’ में । यह शब्द भी वस्तुतः एक सामासिक संयुक्त पदबंध है । वस्तुतः यह ‘मंगलायतनः’ है जिसका ‘नः’ संधि के नियमों के तहत श्लोक में आगे ‘हरिः’ शब्द की मौजूदगी के कारण ‘नो’ लिखा जाता है । अतः ‘नो’ लिखा जाना तो सही है, किंतु इसे दो हिस्सों में तोड़ कर नहीं लिखा जा सकता है । कहने का अर्थ यह है कि ‘मंगलायतनो’ के स्थान पर ‘मंगलाय’ + ‘तनो’ लिखने पर उसका वांछित अर्थ समाप्त हो जाता है । अगर इसे टुकड़ों में लिखा ही जाना हो (जिसकी श्लोक-लेखन में अनुमति नहीं) तब इसे ‘मंगल आयतनो’ लिखा जा सकता था । वास्तव में

मंगलायतनः = मंगल+आयतनः

मंगल का अर्थ है शुभ फल और आयतन का अर्थ है आश्रय, शरणस्थली अथवा रहने का स्थान, आदि । अतः ‘मंगलायतनः’ का तात्पर्य है शुभ फलों का घर, भंडार या प्राप्तिस्थल

अब मैं उक्त श्लोक में विद्यमान उन त्रुटियों की ओर इशारा करता हूं जो श्लोक के अर्थ को प्रभावित तो नहीं करते, परंतु संस्कृत छंदों के लेखन में प्रचलित नियमों के अनुरूप नहीं हैं । संस्कृत के ज्ञाता इस प्रकार की त्रुटियों से बचने का प्रयास अवश्य करते होंगे । मेरी नजर में आई त्रुटियां ये हैं:

1. श्लोक में सर्वत्र ‘मंगल’ के स्थान पर ‘मङ्गल’ लिखा जाना चाहिए । संस्कृत में किसी शब्द के अंतर्गत वर्णमाला के कवर्ग से पवर्ग तक के वर्णों (अर्थात् ‘क’ से ‘म’ तक के वर्ण) के पूर्व अनुस्वार नहीं लिखा जाता है, बल्कि उसके स्थान पर संबंधित वर्ग का पांचवां वर्ण लिखा जाता है, जैसे कङ्कण (कड़ा या चूड़ी), कञ्चन (स्वर्ण), कण्टक (कांटा), कन्दर (गुफा), कम्पन (कांपना), आदि । शब्दों के अंतर्गत अनुस्वार का प्रयोग य से ह तक के वर्णों के पूर्व किया जाता है, यथा कंस, दंश, संयम, आदि ।

2. यद्यपि ‘मङ्गलम्’ स्वयं में सही है और गद्य में इसे लिखा भी जाता है, किंतु संस्कृत व्याकरण के संधि के नियमों के अनुसार उक्त श्लोक में इसे ‘मङ्गलं’ लिखा जाना चाहिए । नियम यह है कि यदि छंदों के किसी पद के अंत में ‘म्’ हो और उसके पश्चात् व्यंजन से आरंभ होने वाला पद हो तो ‘म्’ को अनुस्वार लिख जाना चाहिए । और यदि इसके पश्चात् स्वर वर्ण हो तो ‘म्’ ही लिखा जाना चाहिए । ध्यान दें कि उक्त श्लोक में ‘म्’ के आगे तीनों स्थलों पर क्रमशः ‘भ’, ‘ग’, एवं ‘पु’ (व्यंजन) विद्यमान हैं ।

3. संस्कृत में ‘भगवान्’ (हलंत ‘न’) शब्द है न कि ‘भगवान’ । यह संज्ञाशब्द ‘भगवत्’ का प्रथमा विभक्ति (कर्ता कारक, nominative case) का एकबचन में विभक्ति रूप है । अतः श्लोक में यही लिखा होना चाहिए ।

4. अंत में यह भी बताना भी आवश्यक है कि संस्कृत में विरामचिह्न कॉमा के प्रयोग की परंपरा नहीं है । अब कुछ लोग उसका प्रयोग करने लगे हैं । स्पष्टता के लिए गद्य-लेखन में इसका प्रयोग अब होने लगा है । लेकिन प्राचीन रचनाओं की मौलिकता को यथासंभव बनाए रखा जाना चाहिए । तदनुसार उक्त श्लोक में इसका प्रयोग न करना समीचीन होगा ।

ये चार त्रुटियां गंभीर नहीं हैं, किंतु छंद की शुद्धता के लिए इनसे बचा जाना चाहिए । किंतु पहले जिन त्रुटियों की बात की है, वे निःसंदेह गंभीर एवं अक्षम्य हैं । इन बातों को ध्यान में रखते हुए श्लोक यों लिखा जाना चाहिए:

मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरूडध्वजः ।

मङ्गलं पुण्डरीकाक्षः मंगलायतनो हरिः ॥

(भगवान् विष्णु मंगल हैं, गरुड वाहन वाले मंगल हैं, कमल के समान नेत्र वाले मंगल हैं, हरि मंगल के भंडार हैं । मंगल अर्थात् जो मंगलमय हैं, शुभ हैं, कल्याणप्रद हैं,  जैसे समझ लें ।)

अपनी बात समाप्त करने से पहले एक टिप्पणी करनी है । लोगों का संस्कृत-ज्ञान आम तौर पर शून्य या कम रहता है । ज्ञान न होना कोई अनुचित बात नहीं है । किंतु जब किसी अवसर पर संस्कृत का प्रयोग किया जा रहा हो तो इतना जानने की उत्कंठा तो होनी ही चाहिए कि लिखित पाठ का अर्थ क्या है और वह शुद्ध लिखा जा रहा है कि नहीं । मुझे लगता है कि लोग इस मामले में लापरवाह होते हैं । अधिक चिंताजनक पक्ष यह है कि पुरोहितगण भी इन बातों पर गौर नहीं करते है । मुझे तो इस बात की शंका रहती है कि उन लोगों को संस्कृत का समुचित ज्ञान होता भी है कि नहीं । बहुत संभव है कि उनमें से अधिकतर रट-रटाकर और स्थापित पुरोहितों की नकल करके इस कार्य में जुटते हैं । अवश्य ही सही सीखने में मेहनत तथा वक्त लगते हैं, कोई सीखा-सिखासा पैदा नहीं होता है । फिर भी उस दिशा में आगे बढ़ने का विचार तो मन में उठना ही चाहिए । – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Aditya Ranjan Pathak
    अप्रैल 14, 2011 @ 16:44:37

    मान्यवर,
    मैं आपकी हर बात से पूर्णतया सहमत हूँ | सिर्फ एक बात खटकी – “गरुड़” की जगह “गरुण” का प्रयोग बारम्बार क्यों किया गया है ?

    प्रत्युत्तर में –
    अवश्य ही गरुण के स्थान पर गरुड होना चाहिए था । आरंभिक त्रुटिपूर्ण श्लोक में गरुण था, जो सही नहीं था, और उसी की कापी का प्रयोग बाद के पाठ में किया गया, अतः उसी के कारण कदाचित्‌ यह त्रुटि रह गयी, जिसे अब ठीक कर दिया है । ध्यान दिला दूं कि संस्कृत में केवल ड है ड़ (नुक्ते के साथ ड) नहीं । – योगेन्द्र जोशी

    प्रतिक्रिया

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